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SIR से यूपी के मुस्ल‍िम बहुल जिलों में वोटर घटने पर उठे सवाल कितने जायज?

SIR के बाद जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में मुस्लिम बहुल जिलों में मतदाताओं की संख्या घटने को विपक्ष साजिश बता रहा है

SIR in Goa
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 15 जनवरी , 2026

उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के बाद जारी हुई ड्राफ्ट मतदाता सूची ने राज्य की सियासत में एक बार फिर वोट, पहचान और भरोसे की बहस को केंद्र में ला दिया है. खास तौर पर मुस्लिम बहुल जिलों में बड़ी संख्या में वोटरों के नाम हटने के आंकड़े सामने आने के बाद विपक्ष ने इसे राजनीतिक साजिश करार दिया है, जबकि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) और चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची को शुद्ध करने की सामान्य और जरूरी प्रक्रिया बता रहे हैं.

SIR के बाद जारी पहले वोटर लिस्ट के पहले ड्राफ्ट के मुताबिक, पूरे उत्तर प्रदेश में औसतन 18.70 फीसदी वोटरों के नाम सूची से हटाए गए हैं. दिलचस्प बात यह है कि जिन 10 जिलों में मुस्लिम आबादी 33 से 50 फीसदी के बीच है, वहां भी वोट कटने की औसत दर 18.75 फीसदी दर्ज की गई है. यानी मुस्लिम बहुल इलाकों और राज्य के बाकी हिस्सों के आंकड़ों में सतही तौर पर कोई बड़ा फर्क नजर नहीं आता. इसके बावजूद राजनीतिक बहस तेज है, क्योंकि यह सवाल उठ रहा है कि इतनी बड़ी संख्या में वोटरों के नाम एक साथ क्यों कटे और इसका असर किन समुदायों पर ज्यादा पड़ेगा.

प्रदेश में मुसलमानों की आबादी करीब 19.26 फीसदी मानी जाती है. रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, अमरोहा, बलरामपुर, बरेली, मेरठ और बहराइच जैसे जिलों में मुस्लिम आबादी 33 से 50 फीसदी के बीच है. ड्राफ्ट सूची के मुताबिक, बलरामपुर में सबसे ज्यादा 25.98 फीसदी वोटरों के नाम हटाए गए. इसके बाद मेरठ में 24.65, बरेली में 20.99, बहराइच में 20.44, रामपुर में 18.29, मुरादाबाद में 15.76 और बिजनौर में 15.53 फीसदी नाम कटे हैं. 

चुनाव आयोग का कहना है कि वोटरों के नाम हटने की मुख्य वजहें साफ हैं. इनमें मृत मतदाता, स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके लोग, दो जगहों पर नाम दर्ज होना और एन्यूमरेशन फॉर्म जमा न करना शामिल है. आयोग के अधिकारियों का तर्क है कि यह एक ड्राफ्ट सूची है और शिकायत व निवारण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद बड़ी संख्या में नाम दोबारा जोड़े भी जाएंगे. आयोग के एक अधिकारी के मुताबिक, SIR का मकसद किसी समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि वोटर लिस्ट को अपडेट और भरोसेमंद बनाना है.

लेकिन विपक्ष इस दलील से संतुष्ट नहीं है. समाजवादी पार्टी ने SIR के आंकड़ों को लेकर BJP, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और चुनाव आयोग पर सीधे तौर पर निशाना साधा है. सपा नेताओं का दावा है कि प्रदेश से करीब 50 लाख से ज्यादा लोग देश और विदेश में काम कर रहे हैं, जिनके फॉर्म समय पर जमा नहीं हो पाए. सपा का कहना है कि ऐसे लोगों को मौका दिए बिना उनके नाम काट देना लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है. 

पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया है कि BJP और RSS अल्पसंख्यक वोटरों को मताधिकार से वंचित करने की कोशिश कर रहे हैं. सपा ने यहां तक कहा है कि अगर कहीं भी फर्जी तरीके से वोट कटने की पुष्टि होती है, तो पार्टी कार्यकर्ता तत्काल एफआईआर दर्ज कराएंगे. कांग्रेस भी इस मुद्दे पर सपा के सुर में सुर मिलाती दिखी है. कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत कहते हैं, “जिस तरह से BJP के नेता लगातार हिंदू-मुस्लिम की राजनीति कर रहे हैं और अल्पसंख्यक इलाकों में बड़ी संख्या में वोट कटने के बाद उन मतदाताओं को बिना ठोस सबूत के फर्जी बताया जा रहा है, वह बेहद गंभीर मामला है.” कांग्रेस का आरोप है कि BJP और चुनाव आयोग मिलकर लोकतांत्रिक ढांचे और संविधान को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं. पार्टी ने साफ कहा है कि इंडिया गठबंधन इस मुद्दे पर पूरी ताकत से विरोध करेगा. 

BJP ने विपक्ष के इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है. पार्टी प्रवक्ता अवनीश त्यागी कहते हैं, “SIR लोकतंत्र के लिए जरूरी और पवित्र प्रक्रिया है. जब तक गलत, फर्जी और अधूरे रिकॉर्ड वाले मतदाता सूची से नहीं हटेंगे, तब तक निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है.” BJP का कहना है कि विपक्ष के पास कोई ठोस मुद्दा नहीं बचा इसलिए वह वोटर लिस्ट जैसे संवेदनशील विषय पर भी राजनीति कर रहा है.

दूसरी तरफ आंकड़ों के गहराई से विश्लेषण पर एक और तस्वीर सामने आती है. जिन जिलों में सबसे ज्यादा वोट कटे हैं, उनमें कई शहरी और औद्योगिक जिले भी शामिल हैं, जहां मुस्लिम आबादी राज्य के औसत से ज्यादा नहीं है. लखनऊ में करीब 30 फीसदी, गाजियाबाद में 28.83, कानपुर में 25.50 , प्रयागराज में 24.64 और गौतम बुद्ध नगर में 23.98 फीसदी वोटरों के नाम हटे हैं. इन जिलों में केवल सहारनपुर और मेरठ ही ऐसे हैं, जहां मुस्लिम आबादी काफी ज्यादा है. इससे चुनाव आयोग और BJP को यह तर्क मजबूत होता है कि वोट कटने की प्रक्रिया किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है.

बलरामपुर का मामला इस पूरी बहस में खास तौर पर चर्चा में है. नेपाल सीमा से सटे इस जिले में SIR से पहले करीब 15.83 लाख वोटर थे. ड्राफ्ट सूची में 25.98 फीसदी नाम हटने के बाद यह संख्या घटकर 11.71 लाख रह गई. चुनाव आयोग के अधिकारियों का कहना है कि यहां बड़ी संख्या में एन्यूमरेशन फॉर्म इकट्ठा नहीं किए जा सके. करीब 10 फीसदी वोटरों को अनुपस्थित या लापता और 8.43 फीसदी को स्थायी रूप से स्थानांतरित की श्रेणी में रखा गया है. अधिकारियों के मुताबिक, जिले की वोटर लिस्ट लंबे समय से ठीक से अपडेट नहीं थी और इसमें बड़ी संख्या में डुप्लीकेट नाम भी थे.

स्थानीय स्तर पर BJP नेताओं का कहना है कि बलरामपुर में बड़ी संख्या में लोग जिले से बाहर काम करने जाते हैं, जिससे वोटिंग हमेशा कम रही है. 2022 के विधानसभा चुनावों में जिले की चारों सीटों पर मतदान राज्य के औसत 61.03 फीसदी से काफी कम रहा था. तुलसीपुर में 52.81 फीसदी, गैंसड़ी में 51.94, उतरौला में 47 और बलरामपुर में 48.3 फीसदी मतदान हुआ था. BJP नेताओं का दावा है कि बड़ी संख्या में महिला वोटरों के फॉर्म भी इसलिए नहीं मिल पाए, क्योंकि उन्होंने अपने मायके के पते से जुड़ी EPIC डिटेल्स नहीं दीं या समय पर फॉर्म जमा नहीं कर सकीं.

हालांकि विपक्ष इन तर्कों को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. समाजवादी पार्टी की लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभि‍षेक यादव कहते हैं, “ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों में प्रशासनिक पहुंच और जागरूकता की कमी का खामियाजा आम मतदाताओं को भुगतना पड़ रहा है.” उनका आरोप है कि SIR की प्रक्रिया को इतनी तेजी से चलाया गया कि लाखों लोग समय पर फॉर्म जमा ही नहीं कर सके.

संभल, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और बिजनौर जैसे जिलों के विधानसभा स्तर के आंकड़े भी राजनीतिक बहस को और तेज करते हैं. संभल जिले में कुल 3.18 लाख वोटरों के नाम कटे हैं, जिनमें चंदौसी सीट से सबसे ज्यादा 99,093 नाम हटे. गुन्नौर से 95,311, संभल सदर से 73,926 और असमोली से 50,271 वोट कटे. मुजफ्फरनगर में 3.44 लाख वोटरों के नाम हटे, जिनमें सदर सीट से 92,460 नाम शामिल हैं. सहारनपुर जिले में 4.32 लाख वोटरों के नाम कटे, जबकि बिजनौर में यह संख्या 4.27 लाख रही. इन आंकड़ों के आधार पर विपक्ष का कहना है कि जिन सीटों पर अल्पसंख्यक और विपक्षी दलों का प्रभाव ज्यादा है, वहां वोट कटने की संख्या भी ज्यादा दिख रही है. BJP इसे महज संयोग और प्रशासनिक प्रक्रिया का नतीजा बताती है.

राजनीतिक तौर पर देखें तो यह पूरा मामला 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले भरोसे और ध्रुवीकरण की लड़ाई का संकेत देता है. विपक्ष इसे अल्पसंख्यक वोट बैंक को कमजोर करने की कोशिश के तौर पर पेश कर रहा है, जबकि BJP इसे सुशासन और पारदर्शिता की प्रक्रिया बता रही है. सच क्या है, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि शिकायत निवारण के बाद कितने वोटर दोबारा सूची में जुड़ते हैं और चुनाव आयोग इस पूरी प्रक्रिया को कितनी पारदर्शिता के साथ पूरा करता है. 

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