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आनंद मोहन की बगावत से JDU में खलबली; क्या है इसका शिवहर कनेक्शन?

टिकट, मंत्री पद और ‘थैली’ के आरोपों से गरमाई JDU की राजनीति. आनंद मोहन की नाराजगी के पीछे छिपा है शिवहर का पूरा समीकरण

Anand Mohan in Shivhar
सीतामढ़ी के एक कार्यक्रम में आनंद मोहन
अपडेटेड 21 मई , 2026

बिहार के सबसे छोटे जिलों में से एक शिवहर, प्रति व्यक्ति आय के मामले में भी बिहार का सबसे पिछड़ा जिला है और प्रगति के मामले में भी काफी पीछे है. इन दिनों यह जिला बिहार की राजनीति में मचे बवाल के केंद्र में आ गया है. इसकी वजह यहां की सांसद लवली आनंद के पति और अपने जमाने के बड़े बाहुबली नेता आनंद मोहन हैं. 

आनंद मोहन ने कभी ‘बिहार पीपुल्स पार्टी’ बनाई थी. वे एक आईएएस अधिकारी की हत्या के मामले में जेल की सजा काट चुके हैं. पिछली विधानसभा में उनके बेटे चेतन आनंद शिवहर विधानसभा से विधायक थे. उनकी पत्नी और बेटे दोनों JDU में हैं.

मगर हाल ही में उन्होंने JDU को लेकर ऐसा भड़काऊ बयान दे डाला है कि पार्टी में उथल-पुथल मची है. उस बयान से पार्टी के भीतर का जो विवाद सतह पर आया है, उस पर पार्टी के प्रवक्ता और नेता पर्दा डालने और आनंद मोहन को खारिज करने में जुट गए हैं. इन सबके केंद्र में वही छोटा-सा जिला शिवहर है.

पूरी कहानी क्या है, यह समझने से पहले आनंद मोहन के उस बयान को देख लेते हैं जो सारे विवाद की जड़ है. कहानी शिवहर के पड़ोसी जिले सीतामढ़ी की है. 17 मई को वहां आयोजित एक कार्यक्रम में आनंद मोहन ने कुछ विस्फोटक टिप्पणियां कीं. वे ये हैं :

"नीतीश कुमार की मजबूरी का लाभ लेकर JDU में थैली की राजनीति चल रही है. जब वे सचेत थे तो किसी का टिकट सीतामढ़ी में वापस करना पड़ा था. आज कौन लोग हैं, जो चेतन आनंद को नबीनगर भेजते हैं."

"अगर चेतन आनंद सरकार बचाएगा तो सरकार भी चेतन आनंद चलाएगा. मगर JDU में टिकट ही नहीं बिक रहा, करोड़ों में मंत्री पद भी बिक रहा है."

"आज आप जाकर देखिए, नीतीश कुमार को जिंदा दफन कर दिया गया है. कहीं पर भी नीतीश का चेहरा नहीं दिखता. मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान 85 एमएलए के नेता की कहीं तस्वीर नहीं थी."

"मैं बीजेपी को दोष नहीं दूंगा. मगर नीतीश के साथ मंत्रणा करने वाले क्या कर रहे हैं, क्यों नहीं आवाज उठाते. ये तीन तिलंगे नहीं, चंडाल चौकड़ी है, जिसने JDU के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा कर दिया है."

"यह नीतीश कुमार का सफाया नहीं है, पिछड़ों के राज का सफाया है. स्वास्थ्य मंत्रालय इसलिए दिया गया कि बाप-बेटे को डॉक्टर की जरूरत है."

"एक चुनाव हुआ, बक्सर और आरा में थैली को करारा तमाचा मिला, एमएलसी चुनाव में. दूसरा चुनाव फिर होने वाला है, देखते रहिएगा."

आनंद मोहन सीतामढ़ी में महाराणा प्रताप, भामाशाह और महाराणा प्रताप के सेनापति हमीद खां सूरी की प्रतिमा का अनावरण करने आए थे. वे विधानसभा चुनाव से पहले ही इन प्रतिमाओं का अनावरण करने वाले थे मगर तब उनके बेटे चेतन आनंद को शिवहर के बदले नबीनगर विधानसभा का टिकट दिया गया. इसलिए उन्होंने इस कार्यक्रम को टाल दिया था.

चेतन आनंद निशांत के करीबी हैं
चेतन आनंद निशांत के करीबी हैं

तकनीकी रूप से आनंद मोहन किसी पार्टी में नहीं हैं. मगर चूंकि वे एक राजनीतिक व्यक्ति हैं और उनकी पत्नी तथा बेटे दोनों राजनीति में हैं इसलिए राजनीति में किसी पद पर न रहने के बावजूद उनका कद दोनों से बड़ा है. इसी वजह से उनके इन बयानों से बवाल मचा है. पहले JDU के प्रवक्ताओं ने मिलकर इस बयान के खिलाफ टिप्पणी की.  JDU प्रवक्ता निहोरा यादव ने कहा, “अगर नीतीश कुमार नहीं होते तो आनंद मोहन जेल से बाहर नहीं आते. उन्हें नीतीश कुमार का आभारी होना चाहिए. JDU ने उनकी पत्नी को सांसद बनाया, बेटे को एमएलए बनाया. तब पार्टी अच्छी थी, अब बेटे को मंत्री नहीं बनाया तो पार्टी बुरी हो गई!”

इसके बाद JDU के राजपूत नेता संजय सिंह और लेसी सिंह ने आनंद मोहन का विरोध करना शुरू कर दिया. संजय सिंह के तीखे बयान के बाद नीतीश कुमार खुद उनके घर जाकर संजय सिंह से मिले. इससे ऐसा लगा कि नीतीश कुमार का भी इस विरोध को मौन समर्थन है. इसके बावजूद आनंद मोहन के उठाए सवालों से शुरू हुआ विवाद थम नहीं रहा है.

इन विवादों का शिवहर कनेक्शन क्या है?

उनके बयान की पहली दो पंक्तियों को देखें तो समझ आ जाता है कि इस विवाद की असल जड़ उस शिवहर में है, जहां से पिछले विधानसभा चुनाव में उनके पुत्र चेतन आनंद विधायक थे. इसकी कहानी शिवहर के वरिष्ठ पत्रकार हरिकांत सिंह बताते हैं, “शिवहर लोकसभा और शिवहर विधानसभा दोनों की एक पहचान राजपूत बहुल चुनाव क्षेत्र के रूप में रही है. ऐसे में 1993 में जब आनंद मोहन ने बिहार पीपुल्स पार्टी बनाई तो यहां के कुछ राजपूत नेताओं ने उन्हें यहां आकर चुनाव लड़ने का ऑफर दिया. 1995 के विधानसभा चुनाव में वे लड़े भी मगर जीत नहीं सके.

हालांकि अगले ही साल 1996 में वे शिवहर लोकसभा से चुनाव जीतकर सांसद बन गए. फिर 1998 के लोकसभा चुनाव में भी वे जीते. बाद में उनकी पत्नी लवली आनंद यहां से चुनाव लड़ने लगीं मगर लंबे समय तक वे जीत नहीं पाईं. उन्हें 2024 में तब जीत मिली जब उनके बेटे 2020 के चुनाव में शिवहर विधानसभा से जीते और 2023 में उनके पति आनंद मोहन को जेल से रिहाई मिली.”

ऐसे में 2024 से 2025 के बीच ऐसा वक्त आ गया, जब लवली आनंद शिवहर की सांसद थीं और चेतन आनंद शिवहर के विधायक. यह स्थिति कई लोगों को खटक रही थी. ऐसे में जब चेतन आनंद को शिवहर के बदले औरंगाबाद के नबीनगर का टिकट दिया गया तो आनंद मोहन परिवार को बहुत परेशानी नहीं हुई. एक JDU नेता बताते हैं कि तब शिवहर के राजपूत नेता चेतन आनंद के आवास पर धरना दे रहे थे कि उन्हें शिवहर से ही चुनाव लड़ना चाहिए. मगर तब आनंद मोहन ने यह कह कर मामले को टाल दिया कि नबीनगर भी कोई बुरी सीट नहीं है. इसके बाद चेतन आनंद नबीनगर से जीत भी गए.

आनंद मोहन अपनी पत्नी के साथ नीतीश कुमार से मुलाकात करते हुए
आनंद मोहन अपनी पत्नी के साथ नीतीश कुमार से मुलाकात करते हुए

मगर इस बीच चेतन आनंद को उम्मीद थी कि उन्हें नई सरकार में मंत्री का पद मिलेगा. उनकी नजदीकियां नीतीश कुमार के पुत्र निशांत से बढ़ रही थीं. वे निशांत कुमार के लिए खुलकर सीएम पद की मांग करते थे. उन्हें लगता था कि निशांत को बड़ा पद मिलेगा और उन्हें मंत्री बनाया जाएगा. मगर उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया. उनकी जगह पर शिवहर से चुनाव लड़ने और पहली बार जीतकर विधायक बनने वाली डॉ. श्वेता गुप्ता को मंत्री बना दिया गया.

इस फैसले ने आनंद मोहन के परिवार को परेशान कर दिया. उन्हें लगा कि उनकी पकड़ नीतीश कुमार और JDU पर कमजोर होने लगी है. इसी वजह से आनंद मोहन ने यह विस्फोटक बयान दिया.

‘थैली’ वाले आरोप का क्या मतलब है?

जानकार बताते हैं कि आनंद मोहन ने दरअसल करोड़ों रुपए लेकर मंत्री बनाने का आरोप डॉ. श्वेता गुप्ता के मामले में ही लगाया है. वे दावा करते हैं कि जब नीतीश कुमार सचेत थे तो सीतामढ़ी में टिकट वापस कराया गया था. यह संदर्भ भी श्वेता गुप्ता के पति डॉ. वरुण के मामले को लेकर है. दरअसल डॉ. वरुण और डॉ. श्वेता गुप्ता दोनों सीतामढ़ी में चिकित्सक हैं. डॉ. वरुण को काफी लोकप्रिय बताया जाता है. ऐसा कहा जाता है कि हाल के दिनों में उन्होंने दावा किया है कि वे एक हजार से अधिक गोलियों को सर्जरी से निकाल चुके हैं. ऐसे में उन्हें ऐसा डॉक्टर माना जाता है जो गोली लगने वाले मरीजों की सर्जरी करने में सिद्धहस्त हैं. इसके कई और मायने निकाले जाते हैं.

डॉ. वरुण को 2019 के लोकसभा चुनाव में JDU से टिकट मिल गया था. मगर तभी JDU के सीनियर नेता और नीतीश कुमार के बेहद करीबी देवेश चंद्र ठाकुर ने मीडिया में आकर बयान दिया कि यह टिकट पैसों से खरीदा गया है. ऐसे में आखिरी वक्त पर उनका टिकट वापस हुआ और उनकी जगह सुनील कुमार पिंटू को टिकट मिला.

आनंद मोहन परोक्ष रूप से उसी घटना का जिक्र करते हुए आरोप लगाते हैं कि डॉ. श्वेता गुप्ता को भी इसी तरह टिकट और बाद में मंत्री पद मिला है. हालांकि पार्टी मानती है कि चूंकि शिवहर में वैश्य वोटरों का भी अच्छा दबदबा है, इसलिए वैश्य बिरादरी से आने वाली श्वेता गुप्ता को बढ़ावा दिया जा रहा है.

डॉ. श्वेता गुप्ता को कौन बढ़ावा दे रहा है?

ऐसा कहा जाता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में सीतामढ़ी के बड़े JDU नेता देवेश चंद्र ठाकुर और आनंद मोहन के बीच रिश्ते बिगड़ने लगे थे. उस वक्त देवेश चंद्र ठाकुर सीतामढ़ी से तो लवली आनंद शिवहर से लोकसभा चुनाव लड़ रही थीं. कहा जाता है कि आनंद मोहन को लग रहा था कि देवेश चंद्र ठाकुर के प्रभाव के कारण शिवहर में ब्राह्मण वोटर लवली आनंद को वोट नहीं कर रहे हैं. कुछ ऐसा ही संदेह देवेश चंद्र ठाकुर को भी अपने क्षेत्र के राजपूत वोटरों के बारे में था. इस वजह से एक ही पार्टी में रहने के बावजूद दोनों के बीच संबंध सहज नहीं रहे. दोनों एक-दूसरे से खतरा महसूस कर रहे थे. इस बीच डॉ. वरुण की नजदीकियां भी देवेश चंद्र ठाकुर से बढ़ने लगीं. कहा जाता है कि डॉ. श्वेता का परिचय JDU के शीर्ष नेताओं से देवेश चंद्र ठाकुर ने ही कराया था. मगर आगे जो हुआ खासकर मंत्री पद दिलाने में, उनकी कोई सीधी भूमिका नहीं है.

शिवहर विधायक श्वेता गुप्ता को नई सरकार में मंत्री बनाया गया है
शिवहर विधायक श्वेता गुप्ता को नई सरकार में मंत्री बनाया गया है

बहरहाल, आनंद मोहन का इशारा नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द रहने वाले JDU के चार सीनियर नेताओं की तरफ है. उनका मानना है कि यही लोग अब पैसे लेकर JDU में टिकट और मंत्री पद बांट रहे हैं. वे बक्सर विधानसभा चुनाव और अभी हाल ही में आरा में हुए विधान परिषद चुनाव का भी जिक्र करते हैं. वे JDU के सबसे सीनियर नेता वशिष्ठ नारायण सिंह के बेटे को टिकट न देने के मसले को उठाते हुए JDU में राजपूतों की उपेक्षा का सवाल उठाते हैं.

ऐसा माना जाता है कि लगातार राजनीति से दूर रहने के बावजूद आनंद मोहन की राजपूत राजनीति में अच्छी पकड़ है. इसी वजह से 2023 में नियम बदलकर नीतीश कुमार ने इन्हें जेल से रिहा करवाया था. मगर अब उन्होंने जिस तरह पार्टी के शीर्ष नेताओं के खिलाफ बयान दे दिया है, यह उनके और उनके परिवार की राजनीति के लिए नुकसानदेह हो सकता है. हालांकि उन्होंने अपने बयानों में सीधे नीतीश कुमार के खिलाफ टिप्पणी नहीं की है मगर ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार खुद इन बयानों से नाराज हैं.

उनकी इस बगावत का क्या असर होगा?

इस मामले पर टिप्पणी करते हुए वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह कहते हैं, “श्वेता गुप्ता को शिवहर का टिकट मिलने के बाद आनंद मोहन के अंदर थोड़ी टीस तो थी. मगर अगर चेतन को मंत्री बना दिया जाता तो यह टीस नहीं रहती. मगर उन्हें मंत्री न बनाकर श्वेता गुप्ता को मंत्री बना दिया गया. श्वेता को मंत्री नहीं बनाया जाता तब भी उनकी नाराजगी इतनी अधिक नहीं होती.”

वे कहते हैं, “नब्बे के दशक में आनंद मोहन पूरे बिहार में सवर्णों के नेता माने जाते थे. मगर आईएएस जी. कृष्णैया मामले में जेल जाने के बाद इनका असर घटता चला गया. अब वे पूरे बिहार के राजपूतों के भी नेता नहीं हैं. कुछ क्षेत्रों में इनका आंशिक असर जरूर है. अभी जो उनकी टिप्पणी है, वह उनकी पॉलिटिक्स ऑफ सर्वाइवल, प्रासंगिकता और मोलभाव का हिस्सा है. ऐसा वे पहले भी करते रहे हैं. नीतीश कुमार से उनका लव और हेट का रिश्ता हमेशा से रहा है. मगर उनके सामने कहीं और जाने का विकल्प भी नहीं है. पत्नी सांसद हैं, बेटा विधायक है और विपक्ष कमजोर है. मगर वे बयान देकर खुद को प्रासंगिक बनाए रखेंगे क्योंकि राजपूत पॉलिटिक्स के लिए यह एक बिकने वाला विषय भी है. मगर वे इससे आगे ऐसा कुछ नहीं करेंगे, जिससे उनकी पत्नी और बेटे की राजनीति पर कोई खतरा आए.”

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