पश्चिम बंगाल में मतदान सिर्फ दो हफ्ते दूर है. यहां चुनावी लड़ाई अब सिर्फ जमीन पर नहीं, बल्कि सुनियोजित रणनीतियों के माध्यम से भी लड़ी जा रही है. या यूं कहें कि सावधानी से तैयार की गई छवि के जरिए भी लड़ी जा रही है.
2 अप्रैल को सुवेंदु अधिकारी के नामांकन रैली से पहले अमित शाह ने साफ संकेत दे दिया कि वे बंगाल में लंबे समय तक रहेंगे. यह संकेत चुनावी कैंपेन पर पूरी पकड़ और जोरदार रफ्तार दोनों दिखाने के लिए था.
इससे BJP कार्यकर्ताओं और आमलोगों के बीच एक मैसेज जाएगा कि इतना बड़ा नेता बंगाल में डेरा डाल रहा है. यह बात अपने आप में काफी वजन रखती है, क्योंकि BJP इस चुनाव को अपनी पूर्वी भारत की किस्मत बदलने वाला बताती है.
हालांकि, जैसे-जैसे यह खबर तेजी से फैली BJP ने खुद अपनी उम्मीदों को थोड़ा कम कर दिया. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने साफ किया कि अमित शाह के 15 दिन लगातार बंगाल में डेरा डालने वाली खबर को ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है.
एक BJP नेता ने कहा, "अमित शाह 15 दिन लगातार बंगाल में नहीं रह रहे हैं, जैसा मीडिया में दिखाया जा रहा है. असल में वे कई रैलियों के लिए आएंगे. जब भी आएंगे, एक दिन पहले पहुंचकर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगे. कुल मिलाकर यह 15 दिन या उससे ज्यादा हो सकता है.” यह स्पष्टीकरण काफी कुछ बता रहा है.
इससे साफ होता है कि BJP अमित शाह के लंबे समय तक रहने की लॉजिस्टिक और राजनीतिक जटिलताओं से बचना चाहती है, लेकिन फिर भी बंगाल को लेकर शाह के पूरी तरह कमिटेड होने वाली छवि बनाए रखना चाहती है. यही कारण है कि इस तरह अमित शाह के दौरा को प्रोजेक्ट किया जा रहा है, जैसे वह यहां 15 दिनों तक रहेंगे. यह अब एक चुनावी रणनीति बन गया है.
मकसद बिल्कुल साफ है. अमित शाह के बार-बार बंगाल आने का उद्देश्य पार्टी के कार्यकर्ताओं में जोश भरना, बूथ स्तर का प्रबंधन मजबूत करना और यह संदेश देना है कि बंगाल BJP की केंद्रीय नेतृत्व के लिए अभी भी टॉप प्राथमिकता है. शाह ने अपनी पार्टी के लिए 294 में से 170 विधानसभा सीटें जीतने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है.
उनकी इस सक्रिय भागीदारी का मकसद कार्यकर्ताओं को यह विश्वास दिलाना है कि पार्टी की पूरी लीडरशिप इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जी-जान से लगी हुई है. हालांकि, BJP के खिलाफ ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस (TMC) का जवाब तेज और तीखा रहा है.
बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने व्यंग्य और आत्मविश्वास के साथ कहा कि अमित शाह चाहें तो 365 दिन भी बंगाल में रह सकते हैं, लेकिन इससे BJP की चुनावी किस्मत नहीं बदलेगी. यह एक लाइन TMC की पूरी रणनीति को अच्छे से बयान करती है. TMC घबराई हुई दिखने के बजाय, BJP की ताकत के प्रदर्शन को ही अपना हथियार बना रही है. उसका तर्क यह है कि बंगाल को दिल्ली से आने वाले नेताओं के समय-समय पर दौरे से नहीं संभाला जा सकता, बल्कि ऐसी दखलंदाजी से बंगाल में BJP की 'बाहरी ताकत' के तौर पर इमेज बन रही है. इससे लोगों को लगता है कि यह पार्टी पूरी तरह से दिल्ली पर निर्भर है, न कि स्थानीय स्तर पर.
तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने लोगों के मन में BJP के खिलाफ इस बात को मजबूती से घर कराने के लिए सांस्कृतिक संकेतों का भी सहारा लिया है. पार्टी के नेता और सोशल मीडिया हैंडल ने अमित शाह के दौरे पर व्यंग्य करते हुए बंगाली मेहमाननवाजी, नॉन-वेज खाना और 'टूरिज्म' का जिक्र किया.
उन्होंने BJP के अभियान को कुछ दिनों का दौरा बताकर पेश किया. इसके पीछे गंभीर राजनीतिक संदेश है, पहचान और अपनत्व का. ये मुद्दे बंगाल में चुनावी नतीजों को बार-बार तय करते आए हैं. नतीजा यह है कि चुनाव अब अलग-अलग नैरेटिव की जटिल लड़ाई बन गया है. BJP के लिए अमित शाह का बार-बार आना अनुशासन, रणनीति और परिवर्तन की लगातार कोशिश का संदेश दे रहा है. वहीं, TMC के लिए यही दौरा राज्य BJP की केंद्रीय नेतृत्व पर अत्यधिक निर्भरता और बंगाल में अपनी जड़ें जमाने में विफल होने के रूप में बता रहे हैं.

