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अखिलेश ने दिखाया BJP से मुकाबले का 'ट्रेलर', 2026 में क्या है सपा की तैयारी?

नए साल के पहले दिन समाजवादी पार्टी के मुख्यालय से अखिलेश यादव ने 2027 के विधानसभा चुनाव का एजेंडा और रणनीति साफ कर दी है

Akhilesh Yadav at party headquarter on 1st january 2026
नए साल के पहले दिन सपा मुख्यालय में अखिलेश यादव
अपडेटेड 5 जनवरी , 2026

उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल का पहला दिन अक्सर औपचारिक शुभकामनाओं और प्रतीकात्मक संदेशों तक सीमित रहता है, लेकिन 1 जनवरी 2026 को लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग स्थित समाजवादी पार्टी मुख्यालय में जो दृश्य दिखा, वह कहीं ज्यादा सियासी संकेत दे रहा था. पार्टी कार्यकर्ताओं ने बाटी-चोखा का आयोजन किया था जिसके बहाने बड़ी संख्या में लोग जुटे थे. 

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने नए साल का पहला दिन पार्टी विधायकों, सांसदों और कार्यकर्ताओं के साथ बिताकर साफ कर दिया कि 2027 का विधानसभा चुनाव अब उनके एजेंडे के केंद्र में है. यह केवल उत्सव का अवसर नहीं था, बल्कि आने वाले डेढ़ साल की रणनीति का सार्वजनिक ट्रेलर था.

इस मौके पर अखिलेश यादव ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए जहां एक ओर बीआर आंबेडकर, राममनोहर लोहिया और मुलायम सिंह यादव के विचारों का स्मरण कराया, वहीं दूसरी ओर BJP सरकार पर तीखे हमलों से यह संकेत भी दिया कि 2027 की लड़ाई किस नैरेटिव पर लड़ी जाएगी. महंगाई, बेरोजगारी, कानून व्यवस्था, आरक्षण, किसानों की बदहाली और सार्वजनिक सेवाओं की कथित विफलताओं का जिक्र करते हुए उन्होंने BJP शासन को “नकारात्मक, दमनकारी और भ्रष्ट” बताया. 

इसके साथ ही अखिलेश ने यह ऐलान भी किया कि 2027 में BJP सत्ता से बाहर होगी. लेकिन इस भाषण का महत्व केवल आरोपों और वादों में नहीं था. असल बात यह थी कि अखिलेश यादव ने नए साल के पहले ही दिन यह दिखा दिया कि समाजवादी पार्टी अब सिर्फ विरोध की राजनीति नहीं करेगी, बल्कि एक संगठित, कैडर-आधारित चुनावी मशीनरी के तौर पर मैदान में उतरेगी. यही वह बिंदु है जहां से 2027 की रणनीति को समझा जाना चाहिए.

दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर

उत्तर प्रदेश की अहमियत किसी भी राष्ट्रीय दल या क्षेत्रीय पार्टी से छिपी नहीं है. लोकसभा में 80 सांसद भेजने वाला यह राज्य न सिर्फ केंद्र की सत्ता का रास्ता तय करता है, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय करता है. हालांकि विधानसभा चुनाव 2027 की शुरुआत में होने की संभावना है, लेकिन इसकी तैयारी काफी पहले शुरू हो चुकी है. BJP जहां अपनी सरकार की उपलब्धियों और योगी आदित्यनाथ की छवि के सहारे चुनावी मोर्चा मजबूत करना चाहती है, वहीं समाजवादी पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद ही यह मान लिया था कि अगर उसे 2027 में सत्ता के करीब पहुंचना है, तो पार्टी के चरित्र और संगठन में बुनियादी बदलाव जरूरी हैं. 

2024 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश से 37 सांसद मिले. यह प्रदर्शन न सिर्फ पार्टी के लिए संख्यात्मक सफलता था, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक बढ़त भी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह नतीजा अखिलेश यादव द्वारा पिछले तीन-चार वर्षों में अपनाई गई नई संगठनात्मक रणनीति का परिणाम था.

समाजवादी नेता और राजनीतिक विश्लेषक सुधीर पंवार कहते हैं, “2024 के नतीजों ने यह साबित किया कि अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी को एक पारंपरिक मास-बेस्ड पार्टी से आगे ले जाना चाहते हैं. उन्होंने इसे एक क्वासी-कैडर पार्टी का रूप देने की कोशिश की, और लोकसभा चुनाव में उसका पहला नतीजा दिखा.”

PDA फॉर्मूला : सामाजिक गणित का नया संस्करण

अखिलेश यादव की 2027 रणनीति का सबसे केंद्रीय तत्व है PDA फॉर्मूला. PDA यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक. यह कोई नया सामाजिक गठबंधन नहीं है, लेकिन अखिलेश ने इसे नए सिरे से परिभाषित किया है. पहले जहां समाजवादी पार्टी पर ‘यादव-केंद्रित राजनीति’ का आरोप लगता रहा, वहीं अब पार्टी खुद को व्यापक सामाजिक न्याय के मंच के रूप में पेश करना चाहती है. 

अखिलेश यादव अपने भाषणों में लगातार यह कहते रहे हैं कि BJP सरकार पिछड़ा विरोधी, दलित विरोधी और अल्पसंख्यक विरोधी है. उन्होंने आरोप लगाया कि BJP शासन में PDA वर्ग को न तो पर्याप्त नौकरियां मिलीं और न ही आरक्षण का सही लाभ. नए साल के दिन उन्होंने यहां तक दावा किया कि 30 हजार PDA नौकरियां वापस ले ली गई हैं.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि PDA केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक चुनावी ढांचा है. एक डिग्री कॉलेज में शिक्षक मनोज यादव के मुताबिक, “अखिलेश यादव ने PDA को एक भावनात्मक अपील के साथ-साथ आंकड़ों और तथ्यों से जोड़ने की कोशिश की है. बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक असुरक्षा जैसे मुद्दों को वे सीधे PDA वर्ग से जोड़ते हैं.”

“मास पार्टी” से “क्वासी-कैडर” पार्टी तक का सफर

समाजवादी पार्टी लंबे समय तक एक करिश्माई नेतृत्व और जातीय समर्थन पर आधारित पार्टी रही है. लेकिन BJP की कैडर-आधारित राजनीति के सामने यह मॉडल कमजोर पड़ने लगा था. इसे समझते हुए अखिलेश यादव ने 2023 के आसपास पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बड़े बदलाव शुरू किए. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, पिछले तीन वर्षों में समाजवादी पार्टी ने पूरे उत्तर प्रदेश में कार्यकर्ताओं के लिए कई प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए. इन शिविरों में PDA विचारधारा को समझाने के साथ-साथ BJP के खिलाफ तर्क, आंकड़े और स्थानीय मुद्दों पर बात करने की ट्रेनिंग दी गई. इसका मकसद था कि हर कार्यकर्ता सिर्फ नारा लगाने वाला नहीं, बल्कि बहस करने और मतदाताओं को समझाने में सक्षम हो. 

बूथ स्तर पर समितियों का पुनर्गठन किया गया. निष्क्रिय कार्यकर्ताओं को हटाया गया और नए, युवा चेहरों को जोड़ा गया. पार्टी ने एक डिजिटल प्लेटफॉर्म भी विकसित किया, जिसके जरिए केंद्रीय कार्यालय से संगठन की स्थिति की रियल-टाइम समीक्षा की जा सकती है. प्रोफेसर सुधीर पंवार कहते हैं, “विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया के दौरान यह बदलाव साफ दिखा. समाजवादी पार्टी अब किसी भी मुद्दे पर घंटों के भीतर मिर्जापुर से कैराना तक अपने कैडर को सक्रिय कर सकती है. यह क्षमता पहले पार्टी के पास नहीं थी.”

BJP के एजेंडे का मुकाबला कैसे

2027 में समाजवादी पार्टी का सीधा मुकाबला सत्तारूढ़ BJP से है, जो हिंदुत्व, विकास और कानून व्यवस्था के नैरेटिव पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी BJP को एक मजबूत बढ़त देती है. अखिलेश यादव इस चुनौती को लेकर भ्रम में नहीं हैं. पार्टी के अंदरूनी बैठकों में यह साफ कहा जा चुका है कि केवल सरकार विरोधी लहर के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता. इसलिए रणनीति यह है कि PDA नैरेटिव को विकास के सवाल से जोड़ा जाए. 

अखिलेश लगातार 2012 से 2017 के बीच समाजवादी सरकार के कामकाज का जिक्र करते हैं. लैपटॉप वितरण, एक्सप्रेसवे, समाजवादी पेंशन, एंबुलेंस सेवा और पुलिस सुधार जैसे मुद्दों को वे उदाहरण के तौर पर सामने रखते हैं. उनका तर्क है कि समाजवादी पार्टी ने विकास और सामाजिक न्याय को साथ लेकर चलने की कोशिश की थी. सपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, 2026 का साल पार्टी के लिए बेहद अहम होगा. इस साल उन विधानसभा सीटों की पहचान की जाएगी जहां समाजवादी पार्टी की जीत की संभावना ज्यादा है. कमजोर और मजबूत दोनों तरह की सीटों पर अलग-अलग रणनीति बनाई जाएगी. इसके साथ ही, उम्मीदवारों के चयन में भी बदलाव के संकेत हैं. पार्टी नेतृत्व अब केवल जातीय समीकरण या पुराने चेहरों पर निर्भर नहीं रहना चाहता. जमीनी पकड़, संगठनात्मक सक्रियता और सामाजिक प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी जा रही है.

सरकार पर हमले और वैकल्पिक वादे

नए साल के भाषण में अखिलेश यादव ने BJP सरकार पर कानून व्यवस्था, साइबर अपराध, आपातकालीन सेवाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को लेकर कई आरोप लगाए. डायल 100 और 1090 जैसी सेवाओं के कथित बिगड़े हाल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा से समझौता किया गया है. उन्होंने पर्यावरण और भूमि अधिग्रहण का मुद्दा भी उठाया. अरावली पहाड़ियों, नदियों के प्रदूषण और सार्वजनिक जमीनों पर अतिक्रमण के आरोपों के जरिए उन्होंने BJP के विकास मॉडल पर सवाल खड़े किए. इसके समानांतर, अखिलेश ने वैकल्पिक वादों की झलक भी दी. महिलाओं को सालाना 40 हजार रुपये, किसानों को फसलों का उचित मूल्य और पारदर्शी पब्लिक सर्विस सिस्टम जैसे वादे इस बात का संकेत हैं कि 2027 में समाजवादी पार्टी एक स्पष्ट रोडमैप के साथ जनता के बीच जाएगी.

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