यूपी विधानसभा के बजट सत्र के दौरान 6 फरवरी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिवपाल यादव को लेकर सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अखिलेश यादव पर तंज कसा था. योगी का कहना था, ''सपा के लिए पीडीए का मतलब परिवार विकास प्राधिकरण है. लेकिन उसमें चाचू (शिवपाल यादव) के साथ अन्याय हुआ... अगर उन्हें (अखिलेश को) राम पर विश्वास होता तो वह चाचू को किनारे नहीं करते. क्या चाचा पीडीए का हिस्सा नहीं हैं?”
इस बयान के जरिए योगी आदित्यनाथ ने सपा के लोकसभा उम्मीदवारों की उस सूची पर सवाल उठाए थे जिसमें मुलायम सिंह यादव परिवार के तीन सदस्यों को उम्मीदवार बनाया गया था लेकिन शिवपाल यादव को नहीं. हालांकि, अगले दिन सदन में अपने भाषण के दौरान शिवपाल सिंह यादव ने योगी के बयान का जवाब दिया.
शिवपाल ने कहा, "सदन के नेता (सीएम) अक्सर 'चाचा' पर चर्चा शुरू करते हैं. यह सार्वजनिक मुद्दों पर बहस के दौरान विधानसभा में 'चाचा पर चर्चा' कार्यक्रम जैसा लगता है. उन्हें पता होना चाहिए कि 'चाचा' पीडीए में थे और पीडीए में ही रहेंगे. मैं समाजवादी हूं और समाजवादी विचारधारा पर चलता रहूंगा. मैं अखिलेश यादव का चाचा हूं और चाचा ही रहूंगा.”
करीब दो हफ्ते बाद 20 फरवरी की शाम जब सपा ने 8 लोकसभा सीटों के लिए पार्टी के उम्मीदवारों की तीसरी लिस्ट जारी की तो चाचा यानी शिवपाल यादव एक बार फिर चर्चा में आ गए. सपा ने शिवपाल को बदायूं लोकसभा सीट से उम्मीदवार घोषित किया जहां से अखिलेश यादव के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को सपा की पहली सूची में उम्मीवार घोषित किया गया था. बदायूं लोकसभा सीट से दो बार जीत चुके पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव की तैयारी और दावेदारी पर कोई संदेह नहीं था.
लेकिन अब अचानक धर्मेंद यादव का टिकट काट कर बदायूं लोकसभा सीट से शिवपाल यादव को सपा उम्मीदवार बनाना अखिलेश यादव की बदली रणनीति का संकेत दे रहा है. धर्मेंद्र यादव ने अपने कार्यकाल में जिले को राजकीय मेडिकल कालेज, बरेली-बदायूं फोरलेन और ओवरब्रिज जैसे बड़े काम कराए थे, जिसकी वजह से उन्हें याद किया जाता है. उन्हें फिलहाल आजमगढ़ और कन्नौज लोकसभा सीट का प्रभारी बनाया गया है, माना जा रहा है कि वे जल्द ही सपा के ‘सुरक्षित घर’ में प्रत्याशी भी बना दिए जाएंगे.
अखिलेश यादव ने सपा के गढ़ रही बदायूं लोकसभा सीट से धर्मेंद यादव की जगह शिवपाल यादव को उतार कर पार्टी के परंपरागत यादव-मुस्लिम वोटबैंक पर पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है. बदायूं के राजकीय इंटर कालेज के पूर्व शिक्षक रहे रामअवतार गौतम बताते हैं, “सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने जब गुन्नौर और संभल से चुनाव लड़ा था उस समय उनके चुनाव की कमान छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने ही संभाली थी. शिवपाल ने घर-घर जाकर मुलायम सिंह यादव के लिए वोट मांगे थे. बदायूं लोकसभा सीट में संभल जिले की गुन्नौर विधानसभा अब भी शामिल है. बिसौली विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं में भी शिवपाल यादव की बहुत अच्छी पकड़ है. इस लिहाज से भी वे बदायूं सीट पर सपा के मजबूत उम्मीदवार साबित हो सकते हैं.”
सपा के राज्य सभा उम्मीदवारों की सूची के बाद पार्टी के भीतर जिस तरह विवाद की स्थिति बनी उससे बदायूं के स्थानीय राजनीतिक समीकरण भी गड़बड़ा गए. स्वामी प्रसाद मौर्य सपा के राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा देकर विरोधी तेवर दिखा चुके थे, बाद में पार्टी से भी किनारा कर लिया. उनकी बेटी संघमित्रा मौर्य बदायूं से भाजपा से सांसद हैं, जो कि इस बार भी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही हैं.
20 फरवरी की दोपहर स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा से इस्तीफे के बाद यह तय हो गया कि अगर संघमित्रा मौर्य को फिर से भाजपा का टिकट मिलता है तो बदायूं के जातिगत समीकरण अपेक्षाकृत उनके पक्ष में ज्यादा रहेंगे. यानी परिस्थितियां वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के जैसी बनती जा रही हैं. रामअवतार बताते हैं, “समाजवादी पार्टी में रहते हुए स्वामी प्रसाद मौर्य भारतीय जनता पार्टी को कम से कम बदायूं में अपनी राजनीति से बड़ा नुकसान पहुंचाते दिख रहे रहे थे. अब वे अपनी अलग पार्टी से राजनीति करेंगे. इससे वे उस स्तर का नुकसान नहीं पहुंचा पाएंगे. ऐसे में संघमित्रा मौर्य के लिए भाजपा में टिकट की एक बार फिर दावेदारी कमजोर नहीं होगी. भाजपा भी एक बार फिर समाजवादी किले में सेंधमारी की कोशिश उनके जरिए करती दिख सकती है.”
बदायूं लोकसभा सीट पर सपा को दूसरी चुनौती सलीम इकबाल शेरवानी से मिली, जिन्होंने सपा महासचिव पद से इस्तीफा दिया है. उन्होंने आरोप लगाया है कि पार्टी ने मुस्लिमों का भला नहीं किया. शेरवानी सपा से बदायूं या आंवला लोकसभा क्षेत्र से टिकट चाह रहे थे. उसमें सफलता नहीं मिलती देख राज्यसभा जाने की इच्छा जताई, उसे भी सपा ने स्वीकार नहीं किया. इसके बाद वे खुले तौर पर विरोध में आ गए. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में बदायूं से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में सलीम शेरवानी ने 50 हजार वोट पाकर धर्मेंद्र यादव की हार में बड़ी भूमिका निभाई थी. धर्मेंद्र यादव भाजपा उम्मीदवार संघमित्रा मौर्य से 18 हजार वोटों से हारे थे.
सलीम के विरोध को सपा के प्रदेश सचिव आबिद रजा ने भी आवाज दी क्योंकि वे आंवला से दावेदारी कर रहे थे. मुस्लिम नेता अगर सपा के विरोध में आए तो कुछ स्थानीय यादव नेता अंदरखाने धर्मेंद्र यादव के नाम पर नाराज भी थे. बदली परिस्थिति का आकलन करके 20 फरवरी की शाम अखिलेश यादव ने बदायूं लोकसभा सीट से सपा उम्मीवार में बड़ा बदलाव कर शिवपाल सिंह यादव को प्रत्याशी बना दिया. रामअवतार बताते हैं, “सपा नेतृत्व ने उम्मीदवार बदलकर बदायूं लोकसभा सीट पर एक तीर से दो निशाने लगाए हैं. बदायूं में मुलायम सिंह के साथ पार्टी सींचने वाले शिवपाल के सहारे पुराने गढ़ की जमीन दोबारा उपजाऊ बनाने का प्रयास होगा. मुस्लिम मदताताओं में पनप रहे असंतोष को देखते हुए सपा ने यहां अपने वरिष्ठतम नेता को चुनावी समर में उतारकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की है.”
मथुरा के जयगुरुदेव आश्रम से शिवपाल सिंह यादव का गहरा जुड़ाव है. इस आश्रम से बड़ी संख्या में यादव जाति के अनुयायी जुड़े हुए हैं. पिछले कुछ महीनो से संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष संत पंकज महाराज ने बदायूं में शाकाहार, सदाचार, मद्यनिषेध, आध्यात्मिक-वैचारिक जन जागरण यात्रा की थी. बाबा जय गुरुदेव के अनुयायियों को संगठित किया था. आश्रम से शिवपाल सिंह यादव का जुड़ाव भी उन्हें बदायूं लोकसभा सीट पर चुनाव में मजबूती दे सकता है. शिवपाल सिंह यादव के बदायूं से चुनाव मैदान में उतरने से अब सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा के सामने भी चुनौती बढ़ गई है. निश्चित रूप से अब इस सीट पर चुनावी मुकाबला कांटे का होता दिखने लगा है.

