लखनऊ में 21 अप्रैल का सियासी तापमान कुछ अलग ही था. एक तरफ सुबह भारतीय जनता पार्टी ( BJP) महिलाओं के समर्थन में पदयात्रा के जरिए सियासी संदेश गढ़ रही थी, तो दूसरी तरफ कुछ ही घंटों बाद अखिलेश यादव एक ऐसा फैसला ले चुके थे, जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी.
समाजवादी पार्टी ने महिला सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर सीमा राजभर की ताजपोशी कर दी-एक ऐसा नाम, जो अब तक बड़े राजनीतिक मंचों पर बहुत ज्यादा चर्चित नहीं था, लेकिन जिसकी जातीय और क्षेत्रीय पहचान अपने आप में एक बड़ा संदेश समेटे हुए है.
यह फैसला सिर्फ संगठनात्मक फेरबदल नहीं है. यह सीधे-सीधे उस सामाजिक और राजनीतिक समीकरण को साधने की कोशिश है, जो 2027 के विधानसभा चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है. खासकर तब, जब सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर एक बार फिर एनडीए के साथ खड़े हैं और पूर्वांचल में राजभर वोट बैंक पर उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है. सीमा राजभर का चयन दरअसल उसी खाली जगह को भरने की कोशिश है, जो ओम प्रकाश राजभर के एनडीए में जाने के बाद सपा के सामने पैदा हुई.
नया चेहरा और नई रणनीति
कभी सपा के सहयोगी रहे ओम प्रकाश राजभर ने 2022 के चुनाव में पूर्वांचल में सपा को मजबूती दी थी. उनकी पार्टी सुभासपा ने 16 सीटों पर चुनाव लड़कर 6 सीटें जीती थीं और कई जगहों पर BJP को कड़ी टक्कर मिली थी. लेकिन 2023 में उनके एनडीए में लौटते ही सपा के लिए यह स्पष्ट हो गया कि राजभर समाज में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए उसे नया चेहरा और नई रणनीति दोनों चाहिए. सीमा राजभर इसी रणनीति का हिस्सा हैं.
बलिया की रहने वाली सीमा ने अपनी राजनीतिक यात्रा सुभासपा से शुरू की थी और वे कभी ओम प्रकाश राजभर के करीबी मानी जाती थीं. लेकिन 2022 में उन्होंने पार्टी छोड़ दी और बाद में सपा में शामिल हो गईं. दिलचस्प यह है कि सुभासपा छोड़ते वक्त उन्होंने ओम प्रकाश राजभर पर गंभीर आरोप भी लगाए थे. ऐसे में अब सपा उन्हें उसी राजभर राजनीति के खिलाफ खड़ा कर रही है, जिसे ओम प्रकाश राजभर वर्षों से साधते आए हैं. राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष गौतम के मुताबिक यहां सवाल सिर्फ एक पद देने का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक गणित का है जो उत्तर प्रदेश की राजनीति में बेहद अहम भूमिका निभाता है.
सामाजिक न्याय समिति (2001) की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में राजभर (भर) समुदाय की आबादी करीब 2.44 प्रतिशत है. यह आंकड़ा भले छोटा लगे, लेकिन इसका प्रभाव व्यापक है. प्रदेश की 153 विधानसभा सीटों पर इस समुदाय का असर माना जाता है. इनमें 66 सीटें ऐसी हैं जहां 50 हजार से 90 हजार तक राजभर मतदाता हैं, जबकि 87 सीटों पर इनकी संख्या 20 हजार से 50 हजार के बीच है. पूर्वांचल के 24 जिलों में यह प्रभाव और भी स्पष्ट दिखता है- गाजीपुर, बलिया, मऊ, आजमगढ़, वाराणसी, जौनपुर, गोरखपुर से लेकर बस्ती और अंबेडकरनगर तक. इस इलाके में 2022 में सपा और सुभासपा गठबंधन ने BJP को चुनौती दी थी. और यही वह इलाका है जहां 2027 में भी सियासी लड़ाई का केंद्र बनने जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ के कान्यकुब्ज कालेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के प्रोफेसर ब्रजेश मिश्र बताते हैं, “अखिलेश यादव की PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की राजनीति सामाजिक भूगोल पर टिकी है. पिछले कुछ समय से वे लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि सपा अब सिर्फ यादव-मुस्लिम समीकरण तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि व्यापक पिछड़े वर्ग को साथ जोड़ना चाहती है. सीमा राजभर की नियुक्ति इसी विस्तार की कोशिश है.” लेकिन क्या यह दांव उतना असरदार होगा जितना सपा उम्मीद कर रही है? यही इस पूरी रणनीति का सबसे अहम सवाल है.
राजभर मतों के सामने नया विकल्प
ओम प्रकाश राजभर का राजनीतिक सफर स्थिर नहीं रहा है. 2017 में BJP के साथ गठबंधन कर वे सत्ता में आए, मंत्री बने, फिर सरकार से टकराव हुआ और 2019 में अलग हो गए. 2022 में सपा के साथ आए तो पूर्वांचल में असर दिखा, लेकिन 2023 में फिर BJP के साथ चले गए. इस लगातार बदलते गठबंधन के कारण उनकी जातीय पकड़ भी कुछ कमजोर पड़ी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए के साथ होने के बावजूद उनकी पार्टी को जीत नहीं मिली, लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगा कि उनका प्रभाव खत्म हो गया है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राजभर समाज में उनकी पहचान अब भी एक बड़े नेता की है.
हालांकि वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को राजभर समाज का एकतरफा समर्थन मिलने के पीछे सुभासपा से गठबंधन के अलावा दूसरे प्रभावी नेताओं का साइकिल पर सवार होना भी था. बसपा के संस्थापक सदस्य और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर ने एक भावनात्मक पत्र लिखकर अपने बेटे कमलाकांत राजभर को सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को सौंपा था. आजमगढ़ की दीदारगंज सीट से विधायक बने कमलाकांत राजभर की युवाओं के बीच खासी लोकप्रियता भी सुभासपा नेताओं को खटक रही है. 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा में शामिल होने वाले पूर्व वरिष्ठ बसपा नेता राम अचल राजभर ने भी आंबेडकरनगर और आसपास के जिलों में राजभर मतों को साइकिल की तरफ मोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई थी.
आंबेडकर नगर की अकबरपुर विधानसभा सीट से विधायक राम अचल राजभर को सपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ओम प्रकाश राजभर की प्रभाव वाली गाजीपुर, घोसी, बलिया और आंबेडकर नगर संसदीय सीटों का प्रभारी बनाया है. और ये सभी सीटें सपा की झोली में आई थीं. रामअचल राजभर बताते हैं, “ओम प्रकाश राजभर की खुद में कोई राजनीतिक पकड़ नहीं है. अगर उनके राजनीतिक ग्राफ को देखा जाए तो वे किसी अन्य दल के साथ होकर ही चुनाव में कुछ सीटें जीत पाते हैं. फिर यह बात भी है कि वे केवल सत्ता की राजनीति कर रहे हैं.”
सपा के वरिष्ठ नेता यह मानते हैं कि राजभर मतों में ओम प्रकाश का प्रभाव अब काफी कम हो चुका है. यहीं पर सीमा राजभर की भूमिका दिलचस्प हो जाती है. सपा उन्हें एक 'विकल्प' के तौर पर पेश कर रही है- एक महिला चेहरा, जो उसी समुदाय से आती हैं, जमीनी स्तर पर सक्रिय रही हैं और जिसका सुभासपा से पुराना संबंध भी रहा है. इससे सपा दो संदेश देने की कोशिश कर रही है- वह राजभर समाज में अपनी पैठ बनाना चाहती है; दूसरा, वह महिलाओं और खासकर पिछड़े वर्ग की महिलाओं को नेतृत्व में जगह दे रही है.
इस फैसले का एक और पहलू है. सपा ने जूही सिंह जैसे स्थापित चेहरे को महिला सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाकर एक अपेक्षाकृत कम चर्चित नेता को आगे किया है. जूही सिंह ठाकुर समुदाय से आती हैं और पार्टी में उनकी पहचान मजबूत रही है. ऐसे में यह बदलाव संकेत देता है कि सपा अब सामाजिक प्रतिनिधित्व के नए समीकरण पर जोर दे रही है. पार्टी के भीतर इसे हाशिए पर पड़े समुदायों को आगे बढ़ाने की रणनीति के तौर पर पेश किया जा रहा है. इससे पहले फूलनदेवी की बहन रुक्मिणी देवी निषाद को भी महिला विंग में अहम जिम्मेदारी दी गई थी.
लेकिन राजनीति सिर्फ प्रतीकों से नहीं चलती. जमीन पर असर तभी दिखता है जब संगठन, नेतृत्व और सामाजिक स्वीकृति तीनों साथ हों. सीमा राजभर के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है. उन्हें न सिर्फ अपने समुदाय में पहचान बनानी होगी, बल्कि यह भी साबित करना होगा कि वे ओपी राजभर के प्रभाव को चुनौती दे सकती हैं.

