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मुलायम की राह पर अखिलेश; महिला आरक्षण पर सपा ने क्यों चला ‘कोटे में कोटा’ दांव

महिला आरक्षण पर सपा के ‘कोटे में कोटा’ का मुद्दा उठाते ही मुस्लिम और पिछड़ी महिलाओं के प्रतिनिधित्व बनाम संविधान की सीमाओं पर तेज हुई सियासी बहस

Akhilesh Yadav
लोकसभा में महिला आरक्षण पर बहस के दौरान अखिलेश यादव
अपडेटेड 17 अप्रैल , 2026

लोकसभा में 16 अप्रैल को महिला आरक्षण से जुड़े विधेयकों पर बहस के दौरान जब अखिलेश यादव बोलने के लिए खड़े हुए, तो उन्होंने शुरुआत में ही साफ कर दिया कि समाजवादी पार्टी महिलाओं के लिए आरक्षण के खिलाफ नहीं है. लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने एक ऐसा सवाल उठाया जिसने पूरे सदन का माहौल बदल दिया- “क्या मुस्लिम महिलाएं ‘आधी आबादी’ का हिस्सा नहीं हैं?”

इसी सवाल के साथ सपा ने महिला आरक्षण के भीतर ‘कोटे के भीतर कोटा’ की अपनी पुरानी मांग को नए राजनीतिक संदर्भ में फिर से सामने रख दिया. अखिलेश यादव का यह रुख अचानक नहीं था. यह दरअसल उनके पिता और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव की उस राजनीतिक लाइन का विस्तार था, जो उन्होंने 1999 में महिला आरक्षण विधेयक पहली बार संसद में पेश होने पर अपनाई थी.

तब मुलायम ने इस बिल का विरोध करते हुए कहा था कि यह “मुसलमानों, दलितों और पिछड़ों के खिलाफ साजिश” है, क्योंकि इसमें ‘कोटे के भीतर कोटा’ का प्रावधान नहीं है.

सपा की रणनीति : सामाजिक न्याय या राजनीतिक संदेश?

अखिलेश के इस बयान के बाद सपा के आज़मगढ़ सांसद धर्मेंद्र यादव ने और स्पष्ट करते हुए कहा कि जब तक पिछड़े वर्ग और मुस्लिम समुदाय की महिलाओं के लिए अलग प्रावधान नहीं किया जाएगा, तब तक पार्टी इस बिल का समर्थन नहीं करेगी. इसके बाद सत्ता पक्ष की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तंज कसते हुए कहा कि सपा चाहे तो अपने सभी टिकट मुस्लिम महिलाओं को दे सकती है. वहीं संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने साफ कहा कि संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता.

यहां से बहस सिर्फ महिला आरक्षण तक सीमित नहीं रही, बल्कि संविधान की व्याख्या और राजनीतिक मंशा के सवालों तक पहुंच गई. सपा के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर जो समझ है, वह दिलचस्प है. पार्टी के नेताओं का मानना है कि यह सिर्फ विधायी बहस नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है- खासतौर पर उत्तर प्रदेश के मुसलमानों और पिछड़े वर्गों के लिए. पार्टी के राज्यसभा सांसद जावेद अली खान ने कहा कि सपा हमेशा से OBC और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए आरक्षण की वकालत करती रही है. उनके मुताबिक, “यह कोई नई मांग नहीं है, बल्कि नेताजी के समय से चली आ रही विचारधारा का हिस्सा है.”

वहीं पार्टी के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने इस बात को थोड़ा अलग तरीके से रखा. उनके मुताबिक पार्टी धार्मिक आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण चाहती है. उनका तर्क था कि मुस्लिम महिलाएं भी बड़ी संख्या में पिछड़े वर्गों का हिस्सा हैं, इसलिए उन्हें अलग से सुनिश्चित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए.

‘कोटे के भीतर कोटा’: पुरानी बहस, नया संदर्भ

सपा का मूल तर्क ‘कोटे के भीतर कोटा’ है. इसका मतलब है कि महिला आरक्षण के कुल 33 फीसदी हिस्से के भीतर अलग-अलग सामाजिक समूहों- जैसे OBC, दलित और अल्पसंख्यक के लिए उप-कोटा तय किया जाए. सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव का मानना था कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो आरक्षण का लाभ मुख्य रूप से शहरी, उच्च जाति और संसाधन-संपन्न महिलाओं को मिलेगा. ग्रामीण और वंचित वर्ग की महिलाएं पीछे रह जाएंगी.

यही तर्क अब अखिलेश यादव दोहरा रहे हैं, लेकिन बदलते राजनीतिक माहौल में इसे नए तरीके से पेश किया जा रहा है. सत्ता पक्ष का तर्क सीधा है- अनुच्छेद 15 और 16, धर्म के आधार पर भेदभाव को रोकते हैं, इसलिए मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग कोटा असंवैधानिक होगा. लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों की राय थोड़ी जटिल है. कानून के जानकारों के अनुसार, अनुच्छेद 15 और 16 में सबसे अहम शब्द "केवल" है; इसका मतलब यह है कि अगर कोई धार्मिक, नस्लीय या जातिगत समूह अनुच्छेद 46 के तहत "कमज़ोर वर्ग" में आता है, या पिछड़े वर्ग में आता है, तो उसे अपनी तरक्की के लिए विशेष प्रावधानों का हक़ होगा.

कुछ मुस्लिम जातियों को आरक्षण इसलिए नहीं दिया गया कि वे मुस्लिम थे, बल्कि इसलिए दिया गया क्योंकि इन जातियों को पिछड़े वर्ग में शामिल किया गया था; और यह आरक्षण SC, ST और OBC के कोटे में कोई कटौती किए बिना, OBC के भीतर ही एक उप-कोटा बनाकर दिया गया था. इसका मतलब यह है कि अगर कोई समुदाय सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा है, तो उसे विशेष प्रावधान मिल सकते हैं, भले ही वह धार्मिक समूह का हिस्सा हो. जानकार बताते हैं कि सीधे “मुस्लिम कोटा” नहीं दिया जा सकता, लेकिन OBC श्रेणी के भीतर आने वाली मुस्लिम जातियों के लिए उप-कोटा संभव है, जैसा कि कई राज्यों में पहले से लागू है.

जमीनी हकीकत : टिकट वितरण में विरोधाभास

सपा की इस मांग के साथ एक बड़ा विरोधाभास भी जुड़ा हुआ है. आंकड़े बताते हैं कि पार्टी ने पिछले चुनावों में मुस्लिम महिलाओं को टिकट देने में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई. 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 56 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें सिर्फ चार महिलाएं थीं. यानी लगभग 7 फीसदी. जीतने वाले 31 मुस्लिम उम्मीदवारों में सिर्फ तीन महिलाएं थीं- मारिया अली (मटेरा), सैयदा खातून (डुमरियागंज) और सुल्तान (पटियाली). 2024 के लोकसभा चुनाव में स्थिति थोड़ी बेहतर दिखी, लेकिन तब भी पार्टी ने सिर्फ एक मुस्लिम महिला उम्मीदवार उतारी- कैराना से इकरा हसन. वे चुनाव जीतीं भी. इससे यह सवाल उठता है कि क्या सपा का मौजूदा रुख वास्तविक प्रतिनिधित्व की चिंता से प्रेरित है या यह एक राजनीतिक पोजिशनिंग है?

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, और सपा अपनी PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति को मजबूत करने की कोशिश कर रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को बड़ी सफलता मिली थी, जब पार्टी 37 सांसदों के साथ लोकसभा में तीसरे नंबर की पार्टी बनी. हालांकि पार्टी के भीतर यह चिंता बनी रही कि मुस्लिम वोट बैंक पूरी तरह संतुष्ट नहीं है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, “2022 में मुसलमानों ने भारी संख्या में सपा को वोट दिया, लेकिन यह धारणा बनी कि पार्टी उनके मुद्दों पर खुलकर नहीं बोलती.” खासतौर पर आज़म खान के खिलाफ कार्रवाई के दौरान अखिलेश यादव की चुप्पी को लेकर सवाल उठे थे. ऐसे में महिला आरक्षण के भीतर मुस्लिम महिलाओं की बात उठाना एक संकेत भी है कि सपा अब खुलकर अल्पसंख्यक मुद्दों पर बोलने को तैयार है.

BJP का काउंटर नैरेटिव

सत्ताधारी BJP इस मुद्दे को अलग नजरिए से देख रही है. पार्टी इसे “तुष्टिकरण” की राजनीति के रूप में पेश कर रही है. पार्टी नेताओं का कहना है कि महिला आरक्षण का उद्देश्य सभी महिलाओं को समान अवसर देना है, न कि उसे धार्मिक आधार पर बांटना. साथ ही, BJP यह भी याद दिला रही है कि उसने “तीन तलाक” जैसे मुद्दों पर मुस्लिम महिलाओं के हित में कानून बनाया. सपा के नेता फखरुल हसन ने इसी पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब सरकार मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग कानून बना सकती है, तो आरक्षण पर आपत्ति क्यों?

इस पूरी बहस का सबसे जटिल पहलू यही है कि सामाजिक न्याय और संवैधानिक सीमाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए. एक तरफ यह तथ्य है कि राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम है, और उनमें भी पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं की हिस्सेदारी और भी कम है. दूसरी तरफ, संविधान की स्पष्ट सीमाएं हैं, जिनके भीतर रहकर ही कोई व्यवस्था बनाई जा सकती है. राजनीतिक विश्लेषक महिला आरक्षण बिल पर सपा के रुख को दो परतों में देख रहे हैं. पहली परत वैचारिक हैजो लोहिया और मुलायम की सामाजिक न्याय की राजनीति से जुड़ी है. दूसरी परत पूरी तरह राजनीतिक है जो 2027 के चुनाव और मुस्लिम-OBC वोट बैंक को साधने की रणनीति से जुड़ी है.

अखिलेश यादव ने सदन में जो सवाल उठाया- “क्या मुस्लिम महिलाएं आधी आबादी का हिस्सा नहीं हैं?” वह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों की राजनीति का संकेत भी है. अब देखना यह है कि यह मुद्दा संसद की बहस तक सीमित रहता है या जमीन पर टिकट वितरण और वास्तविक प्रतिनिधित्व में भी बदलाव लाता है. क्योंकि आखिरकार किसी भी आरक्षण की सफलता का असली पैमाना वही होता है कि क्या वह उन लोगों तक पहुंचा, जिनके लिए वह बनाया गया था.

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