पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का मतदान 29 मई को पूरा हो चुका है. चुनाव के दौरान फालता विधानसभा सीट से सामने आया विवाद इस बार की चुनावी राजनीति के उस चेहरे को उजागर करता है, जहां सियासी आरोप-प्रत्यारोप और प्रशासनिक सख्ती आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं.
तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर खान और चुनाव आयोग द्वारा तैनात पुलिस ऑब्जर्वर अजय पाल शर्मा के बीच टकराव अब सिर्फ एक बयान या घटना भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक बड़े विमर्श का हिस्सा बन चुका है- क्या चुनावी प्रक्रिया के दौरान प्रशासन पूरी तरह निष्पक्ष रह पाता है या फिर राजनीतिक अविश्वास उसे घेरे रहता है?
29 अप्रैल को मतदान के दिन यह विवाद उस समय चरम पर पहुंच गया, जब जहांगीर खान ने मीडिया के सामने अजय पाल शर्मा को लेकर बेहद तीखी और व्यक्तिगत टिप्पणी कर दी. उन्होंने कहा, “वह यहां दबंग की तरह आए हैं, लेकिन 4 मई के बाद डॉग की तरह लौटेंगे.” इस बयान ने तुरंत राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में हलचल पैदा कर दी. चुनाव जैसे संवेदनशील माहौल में इस तरह की भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक मर्यादाओं के लिए एक चुनौती माना गया.
जहांगीर खान ने अपने आरोपों को यहीं नहीं रोका. उन्होंने केंद्रीय बलों की तैनाती पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस बार चुनाव में “जुल्म की सारी हदें पार कर दी गई हैं.” उन्होंने चुनावी माहौल को “युद्ध जैसा” बताते हुए दावा किया कि मतदाताओं को डराने और दबाने की कोशिश हो रही है. अपनी बात को ज्यादा असरदार बनाने के लिए उन्होंने पुष्पा: द राइज़ का चर्चित डायलॉग “पुष्पा झुकेगा नहीं” दोहराया, जो उनके राजनीतिक तेवर और आक्रामक रुख को दर्शाता है. इसके साथ ही उन्होंने सिंघम का जिक्र करते हुए संकेत दिया कि पुलिस की सख्ती को वे राजनीतिक तौर पर प्रेरित मानते हैं.
इस पूरे विवाद की जड़ 28 अप्रैल को सामने आए एक वीडियो में दिखाई देती है, जिसमें अजय पाल शर्मा फालता क्षेत्र में चेतावनी देते नजर आए थे. चुनाव आयोग को मिली शिकायतों के आधार पर उन्होंने इलाके का दौरा किया था. आरोप था कि कुछ स्थानीय तत्व मतदाताओं से वोटर आईडी कार्ड जमा करा रहे हैं और उन्हें धमका रहे हैं. इस पर शर्मा ने स्पष्ट कहा कि किसी को भी मतदाताओं को प्रभावित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी.
यहीं से राजनीतिक और प्रशासनिक टकराव खुलकर सामने आ गया. जहांगीर खान ने इस कार्रवाई को “दमनकारी” बताते हुए आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के जरिए BJP अपने हित साधने की कोशिश कर रही है. यह आरोप नया नहीं है, लेकिन जिस तीखे अंदाज में इसे व्यक्त किया गया, उसने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया.
दिलचस्प बात रही कि इस मामले में चुनाव आयोग ने फालता के बीडीओ सौरव हाजरा पर कार्रवाई की और उन्हें पद से निलंबित कर दिया. हाजरा पर आरोप है कि उन्होंने पुलिस ऑब्जर्वर के साथ सहयोग नहीं किया और उनका रवैया पक्षपातपूर्ण था.
इस पूरे विवाद के केंद्र में रहे अजय पाल शर्मा 2011 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं. पंजाब के लुधियाना से ताल्लुक रखने वाले शर्मा ने अपने करियर की शुरुआत सहारनपुर से की थी, लेकिन उन्हें पहचान मिली अपनी आक्रामक और सख्त पुलिसिंग शैली के कारण. रामपुर में उनकी पोस्टिंग उनके करियर का सबसे चर्चित अध्याय मानी जाती है. 2019 में जब वे वहां पुलिस अधीक्षक थे, तब समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई हुई.
प्रशासन ने आजम खान को “भू-माफिया” घोषित किया और उनके खिलाफ करीब 80 मामले दर्ज किए गए. जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े अतिक्रमणों पर बुलडोजर चलाए गए और लगातार छापेमारी की गई. इसके बाद से अजय पाल शर्मा आजम खान और समाजवादी पार्टी के दूसरे नेताओं के निशाने पर आ गए थे. सपा नेताओं ने अजय पाल शर्मा पर BJP से मिलकर काम करने का आरोप लगाया था. अखिलेश यादव ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया था और आरोप लगाया था कि प्रशासन का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है.
हालांकि, BJP समर्थकों ने इसे कानून के राज की स्थापना के रूप में पेश किया. रामपुर के बाद नोएडा और एनसीआर में उनकी तैनाती ने उनकी “एनकाउंटर स्पेशलिस्ट” वाली छवि को और मजबूत किया. अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई, दर्जनों पुलिस एनकाउंटर और गैंगस्टर्स के खिलाफ अभियान वे काफी चर्चा में रहे तो दूसरी तरफ मानवाधिकार संगठनों के निशाने पर भी ला दिया. उत्तर प्रदेश में “एनकाउंटर संस्कृति” को लेकर उठने वाले सवालों के केंद्र में अजय पाल शर्मा का नाम अक्सर शामिल रहा है.
अजय पाल शर्मा के करियर में निजी विवाद भी कम नहीं रहे. हाल ही में कुछ अप्रमाणित वीडियो भी सामने आए. इसमें कुछ लोग एक गाती-नाचती लड़की के साथ नाचते दिख रहे हैं. दावा किया जा रहा है कि इसमें अजय पाल शर्मा हैं. इसके अलावा पहले उनके एक महिला के साथ संबंधों को लेकर भी विवाद उठा, हालांकि इन मामलों में कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया. वर्ष 2022 में कानपुर की नई सड़क हिंसा के दौरान उनकी भूमिका फिर चर्चा में आई. उस समय प्रशासन ने हालात काबू में करने के लिए उन्हें विशेष रूप से बुलाया था. हिंसा के मुख्य आरोपी माने गए हयात जफर हाशमी के नेटवर्क पर कार्रवाई की गई और पुलिस ने सख्ती दिखाते हुए स्थिति को नियंत्रित किया.
इसी पृष्ठभूमि के साथ जब अजय पाल शर्मा को पश्चिम बंगाल चुनाव में पुलिस ऑब्जर्वर के रूप में तैनात किया गया, तो विवाद की संभावनाएं पहले से ही मौजूद थीं. विपक्षी दलों ने उनकी नियुक्ति पर सवाल उठाए और कहा कि जिस अधिकारी का अतीत इतना राजनीतिक विवादों से जुड़ा रहा हो, वह निष्पक्ष कैसे रह सकता है. इस मामले में अभिषेक बनर्जी और महुआ मोइत्रा जैसे नेताओं ने भी खुलकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई. उनका तर्क है कि चुनाव के दौरान ऐसे अधिकारियों की तैनाती से निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं.
हालांकि, इस बहस का दूसरा पक्ष भी उतना ही मजबूत है. पुलिस-प्रशासन के समर्थकों को कहना है कि चुनाव के दौरान सख्ती जरूरी होती है और अगर किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका हो, तो प्रशासन को कड़ा रुख अपनाना ही चाहिए. बंगाल चुनाव के प्रकरण में उम्मीदवार जहांगीर खान का बयान निश्चित रूप से मर्यादा की सीमा को पार करता है और इसे लोकतांत्रिक संवाद के लिहाज से उचित नहीं ठहराया जा सकता. लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि प्रशासनिक कार्रवाईयों को लेकर उठ रहे सवालों को गंभीरता से लिया जाए.

