पश्चिम बंगाल में BJP चुनावी लड़ाई को गली-गली और गांव-गांव तक पहुंचाने की कवायद में जुटी है. साथ ही स्थानीय स्तर पर तृणमूल के विवादित नेताओं को निशाना बना रही है. ऐसा लगता है कि सत्ताधारी पार्टी ने भी BJP की इस रणनीति के खतरों को भांप लिया है.
यही कारण है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हमेशा की तरह फिर कह रही हैं कि TMC के हर उम्मीदवारों का चेहरा और ताकत वही हैं. BJP की नई रणनीति उनके इसी दावे की हवा निकालना है. BJP मतदाताओं को याद दिला रही है कि जमीनी स्तर पर सत्ता स्थानीय प्रभावशाली नेताओं के हाथों में है.
हालांकि, ये रणनीति पूरी तरह अमल में आने से पहले ही TMC के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने 21 जनवरी को पुरुलिया में एक सुनियोजित संदेश दिया. इसमें उन्होंने मतदाताओं से नेताओं के व्यक्तिगत कार्यों और व्यवहार के लिए TMC पार्टी को दंडित न करने का आग्रह किया. साथ ही वादा किया कि अगर उन्हें किसी तरह का दुर्व्यवहार झेलना पड़ा है तो वह खुद इस मामले को देखेंगे.
BJP की योजना मुख्यत: इस पर केंद्रित है कि हर निर्वाचन क्षेत्र में TMC के उन नेताओं की पहचान की जाए जिन पर भ्रष्टाचार, धमकाने या सत्ता के दुरुपयोग करने के आरोप हैं. BJP विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान इन नेताओं की खामियां गिनाना चाहती है और लोगों को यह बताना चाहती है कि TMC की सत्ता में वापसी न केवल ममता बनर्जी को मजबूत करेगी बल्कि इन स्थानीय बाहुबलियों को भी अगले पांच तक बढ़ावा मिलेगा.
एक वरिष्ठ BJP नेता ने कहा, “हम ममता के केंद्रीकृत अभियान को देखते हुए TMC के खिलाफ एक स्थानीय अभियान चलाना चाहते हैं.” उन्होंने TMC के 'व्यक्ति-केंद्रित' चुनावी मॉडल को ध्वस्त करने के अपने इरादे को भी रेखांकित किया.
एक अन्य BJP नेता ने कहा, “ममता बनर्जी जहां अपने नाम पर वोट मांग रही हैं, वहीं हम लोगों को यह याद दिलाना चाहते हैं कि TMC को वोट देने का मतलब स्थानीय गुंडों को वोट देना होगा और इस तरह स्थानीय सत्ता-विरोधी लहर को और भड़काया जाएगा.”
यह रणनीतिक बदलाव ऐसे समय में आया है जब TMC खुद कई जिलों में आंतरिक चुनौतियों से जूझ रही है. BJP के रणनीतिकार मानते हैं कि अगर राज्यव्यापी मुद्दों के बजाय स्थानीय वास्तविकताओं पर दृढ़ता से ध्यान केंद्रित किया जाए तो TMC के भीतर कायम असंतोष को एक निर्णायक चुनावी हथियार बनाया जा सकता है.
पिछले एक दशक में ममता का चुनावी अभियान सरल लेकिन सशक्त संदेश पर केंद्रित रहा है—पश्चिम बंगाल में शासन, कल्याण और स्थिरता की एकमात्र गारंटी वही हैं. 2016 और 2021 दोनों विधानसभा चुनावों में ममता ने मतदाताओं से बार-बार कहा कि वह प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में स्वयं उम्मीदवार हैं. ऐसे में लोग व्यक्तिगत उम्मीदवारों को नजरअंदाज करके उनके नेतृत्व पर भरोसा जताते हुए मतदान करें.
माना जाता है कि इस रणनीति ने TMC को गुटबाजी और उम्मीदवार चयन को लेकर असंतोष की भावना से उबरने में मदद की, जिससे पार्टी को स्थानीय स्तर पर नाराजगी के बावजूद बड़ी जीत हासिल करने में मदद मिली. BJP का मानना है कि राजनीतिक माहौल इतना बदल गया है कि वह इस रणनीति को चुनौती दे सकती है और मतदाताओं को ममता के नाम पर स्थानीय नेताओं को सशक्त बनाने के नतीजों को लेकर आगाह कर सकती है.
BJP नेताओं के मुताबिक, पार्टी के जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को हर विधानसभा क्षेत्र में विवादास्पद तृणमूल नेताओं पर फाइलें तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया है, जिसमें कथित जबरन वसूली, भूमि विवाद और राजनीतिक विरोधियों को धमकाने जैसी गतिविधियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.
इसी संदर्भ में अभिषेक ने 21 जनवरी को पुरुलिया में एक 'राणा संकल्प सभा' को संबोधित किया. BJP की स्थानीय रणनीति जमीनी स्तर पर नजर आने से पहले ही दिए गए उनके भाषण को ऐसे ही हमले नाकाम करने के एक पूर्व-नियोजित प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है.
रैली में अभिषेक ने पार्टी और उसमें मौजूद कुछ गलत नेताओं के बीच एक स्पष्ट अंतर रखने की कोशिश की. उन्होंने मतदाताओं से आग्रह किया कि वे कुछ नेताओं के व्यक्तिगत व्यवहार के कारण TMC से मुंह न मोड़ें. उन्होंने वादा किया कि यदि उनके संज्ञान में कोई शिकायत लाई गई तो सीधे हस्तक्षेप करेंगे. उनका संदेश साफ था—स्थानीय नेताओं से नाराजगी का मतलब पार्टी या ममता बनर्जी के नेतृत्व को नकारना नहीं होना चाहिए.
अभिषेक ने TMC के केंद्रीकृत चुनावी नारे को दोहराते हुए कहा कि किसी भी पार्टी उम्मीदवार को दिया गया वोट वास्तव में ममता और उनकी सरकार को मजबूत करेगा. यह विचार सुदृढ़ करके उन्होंने चुनावी मुकाबले को मुख्यमंत्री के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द केंद्रित करने का प्रयास किया, जिसके पीछे एक मंशा स्थानीय आक्रोश को शांत करने की भी रही है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अभिषेक के इस भाषण में BJP की नई रणनीति की परोक्ष स्वीकृति थी. TMC कार्यकर्ताओं की तरफ से किसी भी तरह के उत्पीड़न के स्थिति में मतदाताओं को “अभिषेक को फोन लगाने’ के लिए आमंत्रित करके उन्होंने कहीं न कहीं इस बात को स्वीकारा है कि स्थानीय स्तर पर शिकायतें कायम हैं. हालांकि, उनकी कोशिश है कि इसकी वजह से चुनावों में कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.
बंगाल में पुरुलिया, बांकुड़ा और झाड़ग्राम आदि पश्चिमी जिले प्रमुख चुनावी मैदान बनकर उभरे हैं, जहां BJP का मानना है कि स्थानीय स्तर पर केंद्रित रणनीति से उसके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है. पुरुलिया में TMC की चुनावी पकड़ लगातार चुनावों में कमजोर होती जा रही है. यहां BJP ने विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनावों में महत्वपूर्ण पैठ बनाई है.
अभिषेक ने 21 जनवरी के अपने संबोधन में इस झटके को स्वीकारा और जिले की सभी विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य सामने रखा. उन्होंने राजनीतिक संदेशों के साथ, खासकर काफी समय से लंबित रेल संपर्क जैसे विकास के मुद्दों पर कई वादे किए. उन्होंने क्षेत्र में भाजपा के निर्वाचित प्रतिनिधियों की तरफ से कुछ ठोस काम न किए जाने के आरोप भी लगाए.
हालांकि, BJP इन वादों को लेकर सवाल उठा सकती है कि TMC के 15 वर्षों से सत्ता में होने के बावजूद ये मुद्दे अनसुलझे क्यों हैं. विकास संबंधी खामियों को स्थानीय नेताओं की कमजोरी का नतीजा बताकर पार्टी इस चुनाव को ममता के व्यापक कल्याणकारी वादों के बजाय TMC के जमीनी स्तर के शासन पर केंद्रित कर सकती है.
यह चुनावी मुकाबला मूलत: राजनीतिक जवाबदेही के दो बिल्कुल अलग-अलग दृष्टिकोणों को दर्शाता है. TMC कांग्रेस ममता बनर्जी के नेतृत्व को राज्यव्यापी समर्थन के रूप में प्रचारित करके वोट जुटाना चाहती है. इसमें किसी उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान पूरी तरह गौण हो जाती है.
दूसरी तरफ, BJP इस धारणा को ध्वस्त करने की कोशिश में जुटी है और इस पर जोर दे रही है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता स्थानीय स्तर पर पार्टी के उन प्रभावशाली नेताओं के माध्यम से संचालित होती है. ऐसे नेता जिनके कार्यों का सीधा प्रभाव रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है. इन नेताओं की कमियों को उजागर करके पार्टी यह साबित करना चाहती है कि ममता बनर्जी पर भरोसा जताना तटस्थ कार्य नहीं है, बल्कि इसका खामियाजा लोगों को स्थानीय स्तर पर भुगतना पड़ सकता है.

