भाजपा–शिवसेना गठबंधन की जीत ने देश की सबसे अमीर नगर निकाय, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में सत्ता की तस्वीर साफ कर दी है.
इसके साथ ही जीत ने शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) को जोरदार झटका दिया है.
साथ ही, ठाकरे चचेरे भाइयों के बीच हाल ही में हुई सियासी नजदीकी पर भी सवालिया निशान लगा दिया है. पेश है चुनावी नतीजों से निकले पांच बड़े संकेतः
ठाकरे ब्रांड को गहरी चोट
दशकों तक ‘आवाज कुणाचा. शिवसेनेचा’ का नारा मुंबई की सियासत में ठाकरे परिवार और अविभाजित शिवसेना की पकड़ का प्रतीक रहा. लेकिन बीएमसी चुनाव में उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की एमएनएस की हार ने महाराष्ट्र की राजनीति में ‘ठाकरे’ ब्रांड के भविष्य पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं.
दोनों चचेरे भाई करीब दो दशक बाद एक साथ आए थे. इसकी पृष्ठभूमि थी 2024 के आखिर में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव, जिसमें उनकी पार्टियों को करारी शिकस्त मिली थी. उद्धव ठाकरे की शिवसेना को वहां सिर्फ 20 सीटें मिल पाईं, जबकि एमएनएस का खाता तक नहीं खुल सका. हालात इतने खराब रहे कि राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे भी मुंबई की माहिम सीट से शिवसेना उम्मीदवार महेश सावंत से चुनाव हार गए.
इसी वजह से बीएमसी चुनाव में जीत बेहद अहम मानी जा रही थी. यह देश की सबसे अमीर नगर निकाय है, जिसका बजट करीब 74,500 करोड़ रुपए का है. बीएमएसी की सत्ता पर काबिज रहना शिवसेना के लिए हमेशा फायदेमंद रहा है. इससे पार्टी अपनी ‘रिवॉर्ड इकोनॉमी’ चला पाती थी, यानी पद, ठेके और सुविधाओं के जरिए अपने लोगों को साधना और कैडर तक फायदा पहुंचाना आसान होता था.
मुंबई पर पकड़ बनाए रखना ठाकरे की दोनों शिवसेनाओं के लिए बेहद जरूरी है. 1966 में अविभाजित शिवसेना का जन्म इसी शहर में हुआ था और यही शहर उसकी मराठी अस्मिता वाली राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक रहा है. आज हालात यह हैं कि शिवसेना के 20 विधायकों में से 10 मुंबई से हैं. इसका मतलब साफ है कि पार्टी अब सिमटकर लगभग मुंबई केंद्रित रह गई है.
बीएमसी चुनाव में हार उद्धव ठाकरे के लिए इसलिए भी बड़ा झटका है, क्योंकि अविभाजित शिवसेना 1985 से 1992 और फिर 1997 से 2022 तक इस नगर निकाय पर काबिज रही थी. अब शिवसेना (यूबीटी) के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट बनाए रखने की है. साथ ही यह भी कि कहीं उसके नेता और कार्यकर्ता फिर से भाजपी या उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली शिवसेना की ओर न खिसक जाएं.
ठाकरे परिवार के लिए आगे क्या
ठाकरे परिवार के सामने अब लंबी और शायद अकेली सियासी राह है. पार्टी के भीतर यह राय बन रही है कि दोनों चचेरे भाइयों, उद्धव और राज, को साथ रहकर मराठी वोट बैंक को मजबूत करना होगा. यही दोनों दलों का कोर वोटर है. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो सियासत में बची-खुची साख भी दांव पर लग सकती है. लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है जनसंख्या का बदलता समीकरण. विडंबना यह है कि मुंबई में मराठी आबादी घट रही है और यह सब कुछ उनके ही दौर में हुआ है.
1960 में, जब महाराष्ट्र बना और मुंबई उसकी राजधानी बनी, तब शहर की आबादी में महाराष्ट्रीयनों की हिस्सेदारी करीब 45 फीसद थी. अब यह घटकर लगभग 35 फीसद रह गई है. 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि मुंबई में हिंदी को मातृभाषा बताने वालों की संख्या में 39.35 फीसद की बढ़ोतरी हुई. यह संख्या 2001 में 25.8 लाख थी, जो 2011 में बढ़कर 35.9 लाख हो गई. हालांकि मराठी बोलने वाले अब भी मुंबई का सबसे बड़ा भाषा समूह हैं, उनके बाद हिंदी, उर्दू और गुजराती भाषी आते हैं, लेकिन मराठी भाषियों की संख्या घटी है. 2001 में यह संख्या 45.2 लाख थी, जो 2011 में घटकर 44 लाख रह गई.
इसी अवधि में गुजराती भाषियों की संख्या 14.3 लाख से मामूली घटकर 14.2 लाख हुई. उर्दू बोलने वालों की संख्या भी 15.8 लाख से घटकर 14.5 लाख रह गई. अध्ययनों से यह भी सामने आया है कि जैसे-जैसे दूसरे राज्यों से मुंबई आने वालों की संख्या बढ़ी, वैसे-वैसे महाराष्ट्र के भीतर से मुंबई की ओर होने वाला पलायन कम होता गया.
हिंदी पट्टी से बड़ी संख्या में लोगों का मुंबई आना स्लम रिहैबिलिटेशन ऑथरिटी (एसआरए) योजनाओं से भी जोड़ा जाता है, जहां मुफ्त घर का लालच रहा. विडंबना यह है कि एसआरए की शुरुआत उसी दौर में हुई थी, जब शिवसेना और भाजपा की सरकार थी, यानी 1995 से 1999 के बीच.
पुरानी टेक्सटाइल मिलों की जमीनों का पुनर्विकास भी मुंबई की सामाजिक बनावट बदलने की बड़ी वजह बना. इन मिलों में ज्यादातर मराठी बोलने वाले मजदूर काम करते थे. इनके बंद होने के बाद वहां गेटेड सोसाइटी और हाइ-एंड प्रोजेक्ट खड़े हो गए. इससे परेल और लालबाग जैसे मजदूर इलाकों का चरित्र ही बदल गया.
उत्तर आधुनिक दौर में अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक होने और असंगठित सेक्टर के बढ़ने से हिंदी भाषी आबादी, जिन्हें आम बोलचाल में ‘भइया’ कहा जाता है, मुंबई में ज्यादा दिखने लगी और उनकी आर्थिक पकड़ भी मजबूत हुई. सियासी गलियारों में यह चर्चा भी है कि मराठी अस्मिता की राजनीति करने वाले कुछ नेताओं की इन रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में हिस्सेदारी भी हो सकती है.
ठाकरे परिवार पर यह आरोप भी लग रहा है कि उन्होंने चुनाव को मराठी मानूस या आम मुंबईकर की समस्याओं पर केंद्रित करने के बजाए खुद और अपने ब्रांड के इर्द-गिर्द घुमा दिया. अभियान में मुंबई की असहनीय होती रियल एस्टेट कीमतें, पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बदहाल हालात, मिडिल क्लास के लिए शहर का लगातार मुश्किल होता जाना जैसे मुद्दे लगभग गायब रहे. भाजपा की उस दोहरी राजनीति पर भी सवाल नहीं उठाए गए, जिसमें वह ‘एक हैं तो सेफ हैं’ के नारे के जरिए बहुसंख्यक भावनाओं को हवा देती है, जबकि दूसरी तरफ मराठियों को उनके खाने-पीने की पसंद के आधार पर घर तक नहीं मिल पा रहे.
पार्टी से जुड़े सूत्र मानते हैं कि अगर ठाकरे परिवार को अपनी पार्टियों को जिंदा रखना है और वापसी की कोई उम्मीद बचानी है, तो उन्हें ‘मराठी-प्लस’ राजनीति की तरफ बढ़ना होगा और हाशिये की राजनीति को अपनाना होगा. इसमें कामकाजी महाराष्ट्रीयन, गिग वर्कर्स और असंगठित सेक्टर से जुड़े लोगों के मुद्दे उठाना शामिल है. उनका कहना है कि पार्टियों को अपनी विचारधारा को साफ-साफ सामने रखना होगा, ताकि मतदाताओं को यह समझ आए कि वे किस बात के लिए खड़ी हैं. इसके साथ ही युवाओं और आकांक्षी वोटरों को जोड़ना भी जरूरी है. इस हार ने यह धारणा मजबूत कर दी है कि मुंबई की राजनीति पर मराठी मानूस का दबदबा अब खत्म हो रहा है. इससे शहर के सबसे बड़े भाषाई अल्पसंख्यक वर्ग में नई असुरक्षा भी जन्म ले सकती है.
बड़ा विपक्षी गठबंधन कहां है
यह हार एक और बात साफ करती हैः विपक्षी एकता की कमी. शिवसेना (यूबीटी) और एमएनएस के नेता मानते हैं कि अगर कांग्रेस साथ होती, तो मुंबई में सत्ता उनके हाथ में होती. कांग्रेस महाविकास आघाड़ी का हिस्सा होते हुए भी शिवसेना (यूबीटी) से अलग हो गई और प्रकाश आंबेडकर की अगुआई वाली वंचित बहुजन आघाड़ी, राष्ट्रीय समाज पार्टी और डॉ. राजेंद्र गवई के नेतृत्व वाले रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के धड़े के साथ चली गई. इसका नतीजा यह हुआ कि अल्पसंख्यक वोट इस मोर्चे और दोनों शिवसेनाओं के बीच बंट गया. इससे ठाकरे खेमे का एम-प्लस यानी मराठी प्लस मुस्लिम समीकरण कमजोर पड़ गया.
2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोटरों का झुकाव शिवसेना (यूबीटी) और पूरे एमवीए के पक्ष में रहा था. इसी एकजुटता की वजह से गठबंधन 48 में से 32 सीटें जीत पाया. यही अल्पसंख्यक वोट मुंबई में भी शिवसेना यूबीटी और कांग्रेस के काम आए थे, जब दोनों ने 36 में से 13 विधानसभा सीटें जीती थीं.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने दोनों शिवसेनाओं के साथ गठबंधन न करने के फैसले को यह कहकर सही ठहराया कि उन्हें अपने कोर वोटरों को लेकर डर था. खासकर मुस्लिम वोटरों के शिवसेना (यूबीटी) की तरफ खिसकने की आशंका और उत्तर भारतीय वोटरों के नाराज होने का डर. एमएनएस का 2008-09 में हिंदी भाषी प्रवासियों और मुसलमानों के खिलाफ आक्रामक रुख भी कांग्रेस की चिंता की वजह बना. कांग्रेस नेताओं की यह भी शिकायत रही कि उनकी पार्टी का कोर वोट बैंक तो बड़े पैमाने पर शिवसेना (यूबीटी) को वोट देता है, लेकिन मराठी भाषी हिंदू, जिन्हें ठाकरे सेना का समर्थक माना जाता है, उतनी मजबूती से कांग्रेस के साथ नहीं खड़े होते. यही असंतुलन आखिरकार विपक्षी एकता को कमजोर करता चला गया.
महायुति की उलझन
नगर निकाय चुनावों में महायुति की आक्रामक जीत भले बड़ी दिखे, लेकिन इसी जीत के भीतर आगे की परेशानियों के बीज भी छिपे हैं. सत्ता के साझेदारों के बीच बढ़ती खटास इसकी वजह है. 29 में से ज्यादातर नगर निगमों में भाजपा, शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी ने अलग-अलग चुनाव लड़ा. मुंबई में इसका साफ उदाहरण दिखा, जहां एनसीपी हाशिये पर रहते हुए भी अकेले मैदान में उतरी. पुणे और पिंपरी चिंचवाड़ में एनसीपी ने भाजपा को चुनौती देने की कोशिश की, लेकिन नाकाम रही. इस दौरान अजित पवार और भाजपा नेताओं के बीच जुबानी जंग अपने चरम पर पहुंच गई.
पिछले साल के आखिर में, नगर निकाय चुनाव से पहले, शिंदे की शिवसेना के मंत्रियों ने एक अभूतपूर्व कदम उठाया. उन्होंने राज्य कैबिनेट की बैठक का बहिष्कार कर दिया. इसकी वजह थी भाजपा का शिंदे के गढ़ माने जाने वाले ठाणे और पालघर में शिवसेना के नेताओं और पूर्व नगरसेवकों को तोड़ना. इतना ही नहीं, भजपा ने उन उम्मीदवारों को भी अपने पाले में ले लिया, जो पहले शिवसेना के मंत्रियों और नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ चुके थे. नवी मुंबई में भी हालात तल्ख हो गए, जहां भाजपा और शिवसेना आमने-सामने आ गईं. वन मंत्री और भाजपा नेता गणेश नाइक, जो कभी शिंदे से शिवसेना में सीनियर रहे हैं, उन्होंने उन पर तीखे और निजी हमले किए.
भाजपा के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं दिख रहा. पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री सुधीर मुनगंटीवार जैसे नेता सार्वजनिक तौर पर पार्टी की मौजूदा स्थिति को लेकर असहजता जता चुके हैं. इसे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के लिए एक बड़ी चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है. अंदरखाने चर्चा है कि पार्टी के पुराने नेता और कार्यकर्ता इस बात से खुश नहीं हैं कि सत्ता के समीकरण में नए चेहरों को ज्यादा तवज्जो मिल रही है. जैसा कि एमएनएस के एक नेता ने तंज में कहा, जब बाहरी दुश्मन हार जाते हैं, तो जीतने वाली फौज के भीतर ही आपसी लड़ाई शुरू हो जाती है.
असहज करने वाला अनदेखा सच
महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में गड़बड़ियों की शिकायतें और सत्ता व पैसे के खुले इस्तेमाल के आरोप जमकर लगे. महायुति के एक सूत्र ने तंज में कहा, “जिसकी लाठी, उसकी भैंस.” यानी सत्ता में जो है, वही सब कुछ समेट ले जाता है.
आरोपों की फेहरिस्त लंबी है. 68 सीटों पर उम्मीदवारों का नामांकन वापस लेना, ताकि महायुति के प्रत्याशी निर्विरोध जीत जाएं. विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर पर यह आरोप कि उन्होंने कोलाबा विधानसभा क्षेत्र में रिटर्निंग ऑफिसर और पुलिस पर दबाव डालकर विरोधी उम्मीदवारों के नामांकन स्वीकार नहीं होने दिए. इतना ही नहीं, एक वीडियो भी सामने आया, जिसमें नार्वेकर पर पूर्व सांसद और पूर्व एमएलसी हरिभाऊ राठौड़ को धमकाने का आरोप लगाया गया.
मामला यहीं नहीं रुका. मतदान के दिन यह भी सामने आया कि वोट डालने के बाद उंगली पर लगाया जाने वाला अमिट स्याही का निशान सैनिटाइजर या एसीटोन से आसानी से मिटाया जा सकता है. इससे पूरे मतदान की निष्पक्षता और भरोसे पर गंभीर सवाल खड़े हो गए. इन आरोपों ने चुनावी नतीजों से आगे जाकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बहस छेड़ दी है. सवाल यह नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा. सवाल यह है कि क्या खेल बराबरी के मैदान पर हुआ.

