28 जनवरी की सुबह बारामती में एक विमान दुर्घटना में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के प्रमुख अजित अनंतराव पवार का निधन हो गया. 66 वर्षीय अजित पवार महाराष्ट्र में सबसे लंबे समय तक उपमुख्यमंत्री के पद पर रहने वाले नेता थे.
अजित के समर्थक उन्हें महाराष्ट्र के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर देखते थे. 22 जुलाई 1959 को आशाताई और अनंतराव पवार के घर जन्मे अजित महाराष्ट्र के सीनियर नेता शरद पवार के भतीजे हैं.
बारामती तालुका के काटेवाड़ी गांव में ही अजित ने अपना बचपन गुजारा है. अजित के पिता अनंतराव, शरदाबाई और गोविंदराव पवार के तीसरे पुत्र थे. उनका बचपन में अपने परिवार के साथ अच्छा रिश्ता नहीं था. उन्होंने पुणे के प्रतिष्ठित फर्ग्यूसन कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन पहले ही दिन प्रधानाचार्य से उनका झगड़ा हो गया. सख्त अनुशासनप्रिय माता-पिता ने नाराज होकर उन्हें घर से निकाल दिया.
इसके बाद अनंतराव मुंबई आकर दिग्गज निर्देशक वी. शांताराम के साथ असिस्टेंट सिनेमेटोग्राफर के रूप में काम करने लगे. उन्होंने 'झनक-झनक पायल बाजे' और 'अमर भूपाली' जैसी उत्कृष्ट फिल्मों का निर्देशन किया. परिवार से सुलह के बाद वे बारामती लौट आए और परिवार के खेतों का कार्यभार संभाला.
बाद में अनंतराव छत्रपति सहकारी चीनी कारखाने के निदेशक और उपाध्यक्ष बने, जिसके संस्थापक निदेशक उनके पिता गोविंदराव थे. अनंतराव और उनके माता-पिता के बीच यह मनमुटाव बाद में 2023-24 में अजित और उनके चाचा शरद पवार के बीच इसी तरह के अलगाव का प्रतिबिंब बन गया.
अनंतराव के देहांत के बाद शरद पवार ने परिवार की देखभाल की. अजित ने मुर्गी पालन और पारिवारिक खेती का काम संभाला. बारामती के पुराने निवासी याद करते हैं कि कैसे वह लगभग 100 किलोमीटर दूर पुणे स्थित मंडी तक टेम्पो में सब्जियां पहुंचाते थे.
वे बताते हैं कि कैसे उन्होंने उदार किसान नेता शरद जोशी के नेतृत्व वाली शेतकरी संघटना के लिए काम किया, जो 1980 और 1990 के दशक में महाराष्ट्र में एक प्रमुख शक्ति थी. अजित बारामती में अपनी राजदूत मोटरसाइकिल पर घूमते थे. उन्होंने उस्मानाबाद के तत्कालीन मंत्री डॉ. पद्मसिंह पाटिल की सौतेली बहन सुनेत्रा से विवाह किया.
अजित के चुनावी राजनीति में प्रवेश का कारण परिवार में दरार थी. 1991 के लोकसभा चुनावों में बारामती सीट पर चुनाव होने थे. शरद पवार के बड़े भाई दिनकरराव उर्फ अप्पासाहेब इस सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे. उस वक्त अप्पासाहेब ही अपने भाई के मार्गदर्शक और निर्वाचन क्षेत्र प्रबंधक थे. लेकिन, 32 वर्षीय अजित को पार्टी ने यहां से चुनाव लड़ाने का फैसला किया.
दिल्ली में उनका कार्यकाल काफी छोटा रहा. अजित को शरद पवार के लिए अपनी लोकसभा सीट खाली करनी पड़ी और फिर वे बारामती विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए, जिसका प्रतिनिधित्व वे अपनी मृत्यु तक करते रहे. शरद पवार ने भी स्पष्ट कर दिया था कि अजित ही उनके संभावित राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं. बारामती में या पुणे के बारामती हॉस्टल में पार्टी कार्यकर्ताओं से मुलाकात के दौरान, वे अजित को राजनीति की बारीकियां सिखाने के लिए जिला और निर्वाचन क्षेत्र स्तर के कार्य सौंपते थे.
अजित का व्यवहार अपने चाचा (शरद पवार) के विपरीत था. शरद को जहां चालाक लेकिन संयमित और हर फैसला 360 डिग्री नजरिए से सोच-विचार कर लेने वाला माना जाता है. वहीं अजित पवार की छवि तेज-तर्रार लेकिन गुस्सैल और एग्रेसिव नेता गुस्सैल नेता की रही. वे आधी रात को सोते थे और सुबह 5 बजे उठ जाते थे, फिर सुबह 6 बजे से ही लोगों से मिलना शुरू कर देते थे. यह उनकी कठोर लेकिन कुशल प्रशासक की छवि दिखाती है.
इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की सुबह-सुबह (सूरज निकलते ही) जांच-पड़ताल करते थे और कोविड महामारी के दौरान भी मंत्रालय जाते थे. अजित धूम्रपान या शराब नहीं पीते थे. यही कारण था कि उनके सहयोगी उनकी प्रशंसा करते हुए कहते थे कि 'दादा' ने शराब का एक घूंट भी नहीं पिया था. शरद पवार का राजनीतिक क्षेत्र में कई करीबी दोस्त रहे, लेकिन अजित के करीबी मित्र नहीं थे.
शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के राजनीति में आने और 2006 में राज्यसभा सांसद बनने तक अजित को उनके चाचा का राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था. 2009 से सुप्रिया सुले बारामती से चार बार लोकसभा के लिए चुनी जा चुकी हैं.
2010 में जब कांग्रेस ने आदर्श हाउसिंग सोसाइटी विवाद के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के बजाय पृथ्वीराज चव्हाण को सत्ता सौंपने का फैसला किया, तो अजित ने शरद पवार पर छगन भुजबल को डिप्टी सीएम पद से हटाने का दबाव बढ़ा दिया.
अपनी ताकत जुटाकर, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि छगन भुजबल को दोबारा उपमुख्यमंत्री नहीं बनने दिया जाए. विडंबना यह है कि भुजबल अब अजित की NCP में हैं और देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार में मंत्री हैं.
अजित 2014 तक उपमुख्यमंत्री रहे और सिंचाई परियोजनाओं के क्रियान्वयन जैसे मामलों में वे विवादों में फंसे. पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ उनके कभी नरम तो कभी सख्त संबंधों को माना जाता है.
2010 से 2014 तक का उनका कार्यकाल उनके करियर का सबसे विवादास्पद दौर रहा. तत्कालीन विपक्ष में रही BJP ने अजित पर सिंचाई परियोजनाओं में भ्रष्टाचार और महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक (एमएससीबी) में अनियमितताओं का आरोप लगाया था. 2013 में महाराष्ट्र के उस वक्त के BJP अध्यक्ष फडणवीस ने अजित पर बयान देकर यह संकेत दिया था कि उन्हें जेल भेजा जाना चाहिए.
2019 में अजित ने सबको चौंकाते हुए केवल 72 घंटों के लिए फडणवीस के उपनेता के रूप में शपथ ली. यह उस समय की बात है, जब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना, कांग्रेस और NCP की महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार आकार ले रही थी. अजित के इस अचानक कदम और बाद में अपने चाचा के खेमे में लौटने से कई सवाल उठे, जिनमें यह भी शामिल था कि क्या पवार सीनियर ने BJP के साथ सरकार बनाने के लिए गंभीर बातचीत की थी? जैसा कि फडणवीस ने बाद में दावा किया था.
2022 में शिवसेना में फूट के कारण MVA सरकार के गिरने के बाद, कहा जाता है कि BJP ने शरद पवार पर दबाव बढ़ा दिया था. पवार सीनियर और उनके भतीजे अजित के बीच BJP के साथ गठबंधन करने को लेकर विवाद था. इसी सत्ता संघर्ष के चलते शरद पवार ने मई 2023 में NCP अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन नेताओं के एकजुट होने के बाद उन्होंने अपने फैसले पर पुनर्विचार किया.
यह पवार परिवार के भीतर बढ़ती दरारों को दिखा रहा था. अप्पासाहेब के पोते और शरद पवार के भतीजे रोहित 2017 में पुणे जिला परिषद के लिए चुने गए. दो साल बाद उन्होंने अहमदनगर के कर्जत-जामखेड विधानसभा क्षेत्र से BJP के तत्कालीन मंत्री राम शिंदे के खिलाफ जीत हासिल की. इस चुनाव में उन्हें शरद पवार का पूरा समर्थन प्राप्त था।
इससे पहले 2019 में मावल लोकसभा सीट से अजित के बड़े बेटे पार्थ की हार हुई थी. कुल मिलाकर कहा जाता है कि इससे परिवार के भीतर मामले और जटिल हो गए थे. पार्थ की उम्मीदवारी के कारण उनके दादा ने मढा से लोकसभा चुनाव न लड़ने का फैसला किया, क्योंकि परिवार के दो सदस्य पहले से ही मैदान में थे. लंदन में पढ़े-लिखे पार्थ की मराठी भाषा में भारी लहजा होने के कारण चुनाव प्रचार के दौरान उन्हें ट्रोल किया गया था.
जुलाई 2023 में अजित ने आखिरकार अपने चाचा को दरकिनार करते हुए एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र कैबिनेट में उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री के रूप में शपथ ली. हालांकि, इसके बाद ये चर्चा भी खूब हुई थी कि उन्होंने प्रवर्तन निदेशालय (ED) जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के दबाव के आगे घुटने टेक दिए, उनकी दबंग छवि को धूमिल कर दिया.
अजित के BJP से जुड़ाव को देखकर कई लोग अचंभित थे. खासकर उनके जरिए पार्टी पर किए गए हमलों और BJP पर लगाए गए आरोपों को देखते हुए. हालांकि, उनकी मां की तरफ से संघ परिवार से उनका गहरा संबंध था. अहमदनगर जिले में अजित के ममरे भाई चंद्रशेखर कदम राहुरी से BJP के पूर्व विधायक थे, जबकि उनके एक अन्य चचेरे भाई जगदीश संघ परिवार द्वारा संचालित संस्थानों से जुड़े हैं.
2024 के लोकसभा चुनावों में अजित की पत्नी सुनेत्रा को सुप्रिया सुले ने हरा दिया था. यह हार NCP में फूट के बाद पवार सीनियर के प्रति बनी सहानुभूति की लहर के चलते हुई थी. पवार परिवार ने भी अपने मुखिया का साथ दिया. राष्ट्रीय संसद (एससीपी) ने अजित के नेतृत्व वाली NCP की एक सीट के मुकाबले आठ सीटें जीतीं.
हालांकि, अजित ने जोरदार वापसी की. उसी वर्ष बाद में हुए विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी ने 41 सीटें जीतीं और महायुति पार्टी ने शानदार जीत दर्ज की. NCP (SP) को केवल 10 सीटें ही मिलीं. अजित ने बारामती से अपने भतीजे युगेंद्र को बड़े अंतर से हराया.
BJP और अजित की NCP के बीच गठबंधन को काफी सहज और मजबूत गठबंधन के रूप में नहीं देखा गया. NCP का जनाधार मराठों के एक ऐसे वर्ग में है जो स्वभाव से ब्राह्मण विरोधी हैं. पिछले साल के अंत में अजित के बड़े बेटे पार्थ की कंपनी पुणे के मुंडवा-कोरेगांव पार्क में लगभग 40 एकड़ सरकारी जमीन की खरीद को लेकर विवादों में घिर गई थी.
इसे BJP के सीनियर नेता और केंद्रीय राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल के खिलाफ लगे इसी तरह के आरोपों के जवाब के तौर पर देखा गया. ये आरोप शिवाजीनगर के मॉडल कॉलोनी में स्थित सेठ हीराचंद नेमचंद दिगंबर जैन बोर्डिंग को सेठ हीराचंद नेमचंद स्मारक ट्रस्ट के जरिए एक निर्माण कंपनी को बेचने से संबंधित हैं. आरोप था कि केंद्रीय राज्य मंत्री मोहोल के डेवलपर से संबंध थे. हालांकि उन्होंने दावा किया कि वे सौदे से पहले ही कंपनी से अलग हो गए थे.
हाल ही में हुए नगर निगम चुनावों के दौरान अजित BJP नेताओं के साथ एक अशोभनीय जुबानी जंग में उलझ गए थे, जिसमें BJP नेताओं ने कथित सिंचाई घोटाले जैसे मुद्दे उठाए. अजित ने इस बात पर जोर दिया कि अब वह उसी पार्टी के साथ सत्ता साझा कर रहे हैं, जिसने ये आरोप लगाए थे.
अजित के अचानक निधन से NCP में अस्थिरता का माहौल बन सकता है. पार्टी में उत्तराधिकार की स्पष्ट व्यवस्था न होने और अधिकांश विधायकों का समर्थन हासिल कर सकने वाले नेता की अनुपस्थिति से स्थिति और जटिल हो जाएगी. हालांकि हाल ही में NCP के दोनों गुटों के बीच संभावित पुनर्मिलन की संभावना बढ़ रही थी, लेकिन अब NCP के भीतर एक महत्वपूर्ण गुट BJP के साथ गठबंधन करने की कोशिश कर सकता है.
BJP के एक वरिष्ठ नेता ने एक बड़े बदलाव की भविष्यवाणी की है, जिससे NCP का वर्तमान स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है. कुछ निर्वाचित प्रतिनिधि पवार सीनियर के साथ जा सकते हैं, जबकि अन्य BJP की ओर रुख कर सकते हैं. घटनाक्रम में इस बदलाव से एकनाथ शिंदे और उनकी शिवसेना को भी मजबूती मिल सकती है, जिससे BJP को काफी निराशा होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि BJP उनके प्रभाव को सीमित करना चाहती है.
इस तरह बेहद उतार-चढ़ाव भरे राजनीतिक करियर वाले अजित पवार के लिए यह एक अचानक और अप्रत्याशित अंत है.

