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अल कायदा से संबंध का आरोप, 10 साल केस चला लेकिन सबूत ही नहीं थे!

अब्दुर रहमान कटकी को 2015 में अलकायदा के लिए आतंकवादी भर्ती करने के आरोप में गिरफ्तार किया था लेकिन पर्याप्त सबूत न होने के कारण दस साल बाद अब कटक की एक अदालत ने उन्हें आरोपों से बरी कर दिया है

Abdur rehman katki, Al Qaeda
अब्दुर रहमान कटकी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 27 मई , 2026

साल 2015 का आखिरी महीना आधा बीतने को था. तभी देशभर में एक नाम जोर-शोर से गूंजा- अब्दुर रहमान कटकी. काले कपड़े से ढका चेहरा और हाथ में हथकड़ी लगे इस व्यक्ति की तस्वीर हर अखबार में थी. उनके विजुअल हर टीवी चैनल पर दिख रहे थे. उन्हें 16 दिसंबर 2015 को ओडिशा के कटक जिले के जगतपुर पश्चिमकच्छा इलाके से दिल्ली क्राइम ब्रांच और ओडिशा पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में गिरफ्तार किया गया था.

आरोप था कि पेशे से मदरसा शिक्षक 37 वर्षीय कटकी अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) से जुड़े हैं. उन पर मदरसों के माध्यम से अल कायदा के लिए आतंकी तैयार करने का आरोप था. लेकिन अब पूरे 10 साल बाद उन्हें कोर्ट से बरी कर दिया गया है. कटक की जिला एवं सत्र न्यायाधीश मानस रंजन बड़ाईक की अदालत ने मंगलवार, 26 मई को अल-कायदा इन इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) से कथित संबंधों के मामले में अब्दुर रहमान कटकी को पर्याप्त सबूतों के अभाव में बरी कर दिया.

AQIS आतंकवादी संगठन अल-कायदा से जुड़ा संगठन है. इस फैसले के साथ लगभग एक दशक से कानूनी जांच के दायरे में रहे इस मामले का अंत हो गया. अब्दुर रहमान को वर्ष 2015 में दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने कटक जिले के जगतपुर पश्चिमकच्छा इलाके से संदिग्ध उग्रवादी गतिविधियों से जुड़े एक अभियान के दौरान गिरफ्तार किया था. जांच एजेंसियों ने उस समय दावा किया था कि उनका संबंध दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में सक्रिय आतंकी संगठन AQIS से है.

गिरफ्तारी के बाद रहमान पर प्रतिबंधित संगठन से जुड़े लोगों के साथ संभावित संबंध और संपर्क रखने के कई आरोप लगाए गए थे. कथित अंतरराज्यीय आतंकी नेटवर्क और राष्ट्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका के कारण यह मामला काफी चर्चित रहा. हालांकि सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश करने में विफल रहा. उपलब्ध रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और जांच सामग्री की समीक्षा के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने रहमान को सभी आरोपों से बरी कर दिया.

यह फैसला आपराधिक मामलों, खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मामलों में मजबूत सबूतों के महत्व को रेखांकित करता है. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय उस सिद्धांत को मजबूत करता है कि केवल संदेह या आरोपों के आधार पर, बिना विश्वसनीय प्रमाण के किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

बचाव पक्ष के वकील शाहिद नदीम ने कहा, “2016 में जगतपुर थाना प्रभारी ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एफआईआर दर्ज की थी. गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (UAPA) की धारा 18, 19 और 20 तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 124 के तहत रहमान के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था. बाद में यह मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया. क्राइम ब्रांच की जांच के बाद उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई. लगभग 10 लंबे वर्षों तक मामला चलने के बाद कटक जिला अदालत ने सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया.”

नदीम बताते हैं, “उनके खिलाफ तीन मामले थे. पहला मामला नई दिल्ली में NIA ने दर्ज किया था. इसके बाद कटक और जमशेदपुर में मामले दर्ज किए गए. जमशेदपुर मामले में उन्हें पहले ही बरी किया जा चुका है. अब कटक मामले में भी उन्हें बरी कर दिया गया. वहीं, नई दिल्ली वाले मामले में उन्हें सात साल की सजा हुई थी, जिसे वे पहले ही काट चुके हैं.”

इस दौरान क्राइम ब्रांच ने 46 गवाह पेश किए थे. लेकिन पुलिस इन गवाहों से अलग पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सकी. इसलिए उन्हें बरी कर दिया गया.  रहमान पर आरोप था कि उन्होंने एक मदरसा खोला था और बच्चों की भर्ती अल-कायदा के लिए कर रहे थे. लेकिन जांच एजेंसी रहमान के खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी. साथ ही, UAPA के तहत आवश्यक मंजूरी भी नहीं ली गई थी. तकनीकी आधार और सबूतों की कमी के चलते मामला खारिज कर दिया गया.

इससे पहले पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने मौलाना अब्दुर्रहमान कटकी की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए सत्र अदालत को मुकदमे की सुनवाई दो महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया था. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अभियोजन पक्ष ने मामले की जांच करने वाले दो अधिकारियों की गवाही पूरी करवाई तथा अन्य गवाहों के बयान भी दर्ज कराए. इसके बाद अभियोजन ने अदालत से अंतिम बहस सुनने का अनुरोध किया. अदालत ने पहले आरोपी का धारा 313 के तहत बयान दर्ज किया और फिर दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था.

जमीयत उलमा-ए-हिंद ने किया फैसले का स्वागत

इस पूरे 10 साल के दौरान मौलाना अब्दुर्रहमान कटकी के मुकदमे की पैरवी जमीयत उलेमा महाराष्ट्र कानूनी सहायता समिति ने सत्र अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की. संगठन के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने कहा, “इस निर्णय से एक बार फिर साबित हो गया है कि बिना पर्याप्त सबूतों के मुस्लिम युवाओं को आतंकवाद के आरोपों में गिरफ्तार कर उनकी जिंदगियां तबाह की जाती रही हैं. इस मामले में भी इंसाफ मिलने में पूरे 10 वर्ष लग गए.”

उन्होंने कहा, “जांच एजेंसियों और पुलिस की जवाबदेही तय की जानी चाहिए. जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक आतंकवाद विरोधी कानूनों और अन्य कठोर कानूनों की आड़ में निर्दोष लोगों की जिंदगियां इसी तरह बर्बाद होती रहेंगी. मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए मुसलमान सबसे आसान निशाना बन गए हैं. जब तक जवाबदेही तय नहीं की जाएगी और निर्दोष लोगों की जिंदगी बर्बाद करने वालों को सजा नहीं दी जाएगी, तब तक यह दुखद सिलसिला समाप्त नहीं होगा. कानून की आड़ में इसी तरह बेगुनाहों की जिंदगी से खिलवाड़ होता रहेगा.”

अब्दुर रहमान 'कटकी' के भाई ताहिर खान बताते हैं, “अब्दुर रहमान के घर में पत्नी के अलावा दो बेटे और एक बेटी हैं. तीनों गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं. पत्नी गृहिणी हैं. घर में वही अकेले कमाने वाले थे. बीते 10 सालों में परिवार ने जो झेला है, उसका हर दिन अपनी अलग कहानी है. हम सब हर दिन जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहे थे. इसके साथ ही सामाजिक कलंक भी झेलना पड़ा, जो सबसे ज्यादा असहनीय था.”

वह आगे कहते हैं, “परिवार पर कर्ज का बोझ बढ़ चुका है. अब भाई घर लौट आया है, तो शायद जीवन थोड़ा-बहुत पटरी पर लौट आए. फिलहाल हम और हमारा पूरा परिवार बस यही महसूस कर रहे हैं कि वह घर वापस आ गया है.”

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