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यूपी के शहरी इलाकों में कैसे घट गए लाखों वोटर?

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में यूपी के बड़े शहरों से लाखों नाम कटने सामने आए हैं

SIR के बाद यूपी में 2.89 करोड़ वोटर्स के नाम कटे. (Photo: Representational )
SIR के बाद यूपी में 2.89 करोड़ वोटर्स के नाम कटे. (Photo: Representational )
अपडेटेड 7 जनवरी , 2026

6 जनवरी को उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR के बाद ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी हो चुकी है. ड्राफ्ट वोटर लिस्ट ने साफ कर दिया है कि राज्य के शहरी इलाकों में मतदाताओं की संख्या अचानक और बड़े पैमाने पर घट गई है.

लखनऊ, गाजियाबाद, नोएडा, कानपुर, आगरा, प्रयागराज, मेरठ, बरेली और वाराणसी जैसे बड़े शहरों में लाखों नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं. यह बदलाव सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक मायने भी हैं.

सबसे ज्यादा असर राजधानी लखनऊ में दिखा है, जहां करीब 12 लाख वोटरों के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से गायब हैं. यह कुल वोटर्स के करीब 30 फीसद है. गाजियाबाद, कानपुर नगर, प्रयागराज और मेरठ जैसे शहरों में भी एक चौथाई के आसपास वोटर कम हो गए हैं.

सवाल उठना लाज़मी है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि कुछ ही हफ्तों में शहरी वोटर लिस्ट से इतने लोगों का नाम हटा दिया गया. चुनाव आयोग और SIR से जुड़े अधिकारियों की दलील साफ है कि शहरी इलाकों में बड़ी संख्या में ऐसे वोटर थे, जो स्थायी रूप से दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके थे. नौकरी, पढ़ाई, व्यापार और बेहतर जीवन की तलाश में शहर बदलना शहरी भारत की सच्चाई है.

लखनऊ में 2025 की वोटर लिस्ट में दर्ज 13 फीसदी से ज्यादा वोटरों को ड्राफ्ट लिस्ट में ‘स्थायी रूप से शिफ्ट’ के रूप में चिन्हित किया गया. गाजियाबाद, मेरठ, नोएडा और कानपुर में भी यह आंकड़ा 11 से 12 फीसदी के बीच रहा.

लेकिन पूरी तस्वीर सिर्फ इतनी नहीं है. SIR के दौरान डुप्लीकेट रजिस्ट्रेशन का मुद्दा भी खुलकर सामने आया. बड़ी सख्या में ऐसे मतदाता पाए गए जिनके नाम गांव और शहर दोनों जगह दर्ज थे. गिनती और सत्यापन के चरण में इन वोटरों को एक जगह चुनने का विकल्प दिया गया.

दिलचस्प बात यह रही कि बड़ी संख्या में लोगों ने शहरी पहचान छोड़कर ग्रामीण वोटर बने रहना पसंद किया. इस ट्रेंड के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं. अधिकारियों के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में चल रही कल्याणकारी योजनाएं, जमीन और संपत्ति से जुड़े हित, और आने वाले पंचायत चुनावों ने लोगों को गांव से जुड़ाव बनाए रखने के लिए प्रेरित किया.

एक वरिष्ठ चुनाव अधिकारी कहते हैं, “कोविड काल के बाद शहर में रह रहे बहुत से लोग व्यवहार में गांव से ही जुड़ना पसंद कर रहे हैं. वोट गांव में डालना उनके लिए ज्यादा फायदेमंद और सुरक्षित लगता है.”

प्रयागराज इसका बड़ा उदाहरण है. SIR शुरू होने से पहले जिले में 46.9 लाख वोटर थे. महज 53 दिनों के भीतर 11.5 लाख से ज्यादा नाम हटा दिए गए. अब ड्राफ्ट लिस्ट में करीब 35.3 लाख वोटर बचे हैं. यह गिरावट चौंकाने वाली है, खासकर तब जब पिछले 22 सालों में प्रयागराज में वोटरों की संख्या लगातार बढ़ती रही थी.

विशेषज्ञ मानते हैं कि इतनी बड़ी कटौती ने स्थानीय राजनीतिक संतुलन को झकझोर दिया है. मेरठ में भी यही कहानी है. यहां 6.65 लाख वोटरों के नाम हटे और कुल संख्या घटकर 20.3 लाख रह गई. सबसे ज्यादा असर मेरठ दक्षिण और मेरठ कैंट जैसी शहरी विधानसभा सीटों पर पड़ा है. आगरा में नौ विधानसभा सीटों पर कुल 8.36 लाख नाम कटे.

आंकड़े बताते हैं कि यहां बड़ी संख्या में वोटर मृत, अनुपस्थित, शिफ्टेड या डुप्लीकेट पाए गए. वाराणसी में स्थिति और भी दिलचस्प है. यहां 5.73 लाख वोटरों के नाम हटाए गए हैं. कैंटोनमेंट, वाराणसी उत्तर और रोहनिया जैसी शहरी सीटों में सबसे ज्यादा कटौती हुई. साथ ही हजारों वोटर ऐसे भी हैं जिनकी मैपिंग नहीं हो पाई है. चुनाव अधिकारी इसे तकनीकी और जमीनी स्तर की समस्या मानते हैं, लेकिन विपक्ष इसे गंभीर सवाल के तौर पर देख रहा है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शहरी वोटरों की संख्या में आई यह गिरावट सीधे तौर पर चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है. परंपरागत रूप से शहरी मतदाता अपेक्षाकृत कम मतदान करते हैं, लेकिन राजनीतिक रूप से ज्यादा मुखर माने जाते हैं. अगर बड़ी संख्या में शहरी वोटर लिस्ट से बाहर हो जाते हैं, तो इसका फायदा या नुकसान किसे होगा, यह एक बड़ा सवाल है.

लखनऊ के प्रतिष्ठ‍ित अवध गर्ल्स डि‍ग्री कालेज की प्राचार्य और राजनीति शास्त्र विभाग की प्रमुख बीना राय कहती हैं, “शहरी इलाकों में वोटरों का कम होना सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं है. इससे शहरी मध्यवर्ग, प्रवासी कामगार और युवा मतदाताओं की राजनीतिक भागीदारी पर असर पड़ेगा. ये वही वर्ग हैं जो चुनावी नैरेटिव बदलने की क्षमता रखते हैं.”

विपक्षी दलों को आशंका है कि इस प्रक्रिया से शहरी इलाकों में उनके संभावित वोट बैंक पर असर पड़ सकता है. खासकर वे मतदाता जो किराए के मकानों में रहते हैं या बार-बार जगह बदलते हैं, वे आसानी से ‘अनुपस्थित’ या ‘शिफ्टेड’ की श्रेणी में आ गए. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दल पहले ही मांग कर चुके हैं कि ड्राफ्ट लिस्ट की गहन समीक्षा हो और किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से न हटे.

वहीं, सत्तारूढ़ दल का तर्क है कि वोटर लिस्ट की शुद्धता लोकतंत्र के लिए जरूरी है. उनका कहना है कि फर्जी, डुप्लीकेट और मृत वोटरों के नाम हटने से चुनाव प्रक्रिया ज्यादा पारदर्शी होगी. बीजेपी से जुड़े एक रणनीतिकार कहते हैं, “साफ वोटर लिस्ट से ही निष्पक्ष चुनाव संभव हैं. अगर कोई सच में शहर में रहता है और वोट डालना चाहता है, तो उसके पास दावा-आपत्ति का पूरा मौका है”

शहरी वोटरों में कमी का एक पहलू प्रवासन से भी जुड़ा है. नोएडा, गाजियाबाद और लखनऊ जैसे शहरों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग रहते हैं जो मूल रूप से पूर्वी यूपी, बुंदेलखंड या बिहार से आए हैं. SIR के दौरान कई ऐसे मतदाता ट्रेस नहीं हो पाए. या तो वे काम के सिलसिले में बाहर थे या फिर अस्थायी पते पर रहने के कारण सत्यापन से छूट गए. इसके उलट बुंदेलखंड जैसे इलाकों में, जहां से पलायन ज्यादा होता है, वहां वोटरों की कटौती अपेक्षाकृत कम रही.

ललितपुर, हमीरपुर और महोबा जैसे जिलों में हटाए गए वोटरों का प्रतिशत 10 से 12 के बीच रहा. विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका कारण यह है कि पलायन के बावजूद लोग अपने गांव की वोटर लिस्ट में नाम बनाए रखना चाहते हैं. पूर्वी और पश्चिमी यूपी के कुछ जिलों में भी औसत से कम कटौती हुई है. लेकिन संभल जैसे जिलों में 20 फीसदी से ज्यादा नाम हटने से स्थानीय राजनीति गरमा गई है.

यहां बड़ी संख्या में वोटरों के फॉर्म जमा न होने और ट्रेस न हो पाने की बात सामने आई है. एक और सवाल यह भी है कि क्या यह गिरावट आने वाले चुनावों में मतदान प्रतिशत को प्रभावित करेगी. अगर बड़ी संख्या में लोग दावा-आपत्ति की प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाए, तो वे चुनाव के दिन वोट डालने से वंचित रह सकते हैं. इससे शहरी सीटों पर मुकाबले का रुख बदल सकता है.

कुल मिलाकर यूपी में शहरी इलाकों से वोटरों का कम होना सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है. यह प्रवासन, पहचान, कल्याण योजनाओं, प्रशासनिक सख्ती और राजनीतिक रणनीति का मिला-जुला नतीजा है. आने वाले हफ्तों में दावा-आपत्ति के बाद यह साफ होगा कि कितने नाम वापस जुड़ते हैं और कितने स्थायी रूप से बाहर रह जाते हैं. लेकिन इतना तय है कि इस प्रक्रिया ने यूपी की शहरी राजनीति को नए सवालों और नई बहसों के बीच ला खड़ा किया है.

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