
पटना का एक अणे मार्ग पिछले तकरीबन बीस साल से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का पता रहा है. यह कहने को मार्ग रहा है, मगर चार भवनों वाले इस छोटे से मार्ग की पहचान पिछले 40-41 साल से बिहार के मुख्यमंत्री आवास के नाम से रही है. नीतीश कुमार के इस बंगले को छोड़ने के ठीक बाद नई सरकार ने इसका नाम बदल दिया है.
अब यह 'एक अणे मार्ग' के बदले 'लोक सेवक भवन' कहा जाएगा. बिहार के राजभवन के ठीक सामने की इस जगह की पहचान कभी लालू यादव के खुले दरबार के रूप में थी. बाद में जब नीतीश आए, तो यह अभेद्य किले में बदलने लगा. वहां न लोग जा सकते थे और न ही वहां से कोई किस्सा उनकी मर्जी के बगैर बाहर आता था.
अब जब नए सीएम सम्राट चौधरी ने इसका नाम लोक सेवक भवन रख दिया है, तो इस जगह का नया कलेवर क्या होगा, यह देखने वाली बात होगी.
सम्राट चौधरी, जो नीतीश कुमार के बाद नए सीएम बने हैं, अभी तक राज्य के मुख्यमंत्री के लिए निर्धारित आवास में शिफ्ट नहीं हुए हैं. अभी वे डिप्टी सीएम के लिए तय अपने पुराने आवास पांच देशरत्न मार्ग में ही हैं. उन्होंने अस्थाई तौर पर अपने पुराने आवास को आधिकारिक रूप से मुख्यमंत्री आवास का विस्तारित अंश घोषित करा लिया है. इसका अर्थ यह है कि सीएम आवास खाली हो जाने के बावजूद वे वहां शिफ्ट होने की हड़बड़ी में नहीं हैं.

मगर जिस तरह उन्होंने इस आवास का नाम एक अणे मार्ग से बदलकर लोक सेवक भवन करा लिया है, उससे जाहिर है कि वे अब अपनी पार्टी BJP की परंपराओं को लागू कराने में जुट गए हैं, जिसमें नाम बदलना एक जरूरी काम है. इससे पहले उन्होंने अपने आवास के करीब राजधानी पटना के चिड़ियाघर का नाम संजय गांधी जैविक उद्यान से बदलकर पटना जू कर दिया. उन्होंने एक अणे मार्ग का नाम क्यों बदला, यह समझने से पहले हम यह जानते हैं कि एक अणे मार्ग किनके नाम पर है और इस मार्ग की कहानी क्या है?
माधव श्रीहरि अणे : आजादी के बाद बिहार के दूसरे गवर्नर
अणे मार्ग का नाम स्वतंत्रता सेनानी, साहित्यकार और राजनेता माधव श्रीहरि अणे के नाम पर रखा गया है. वे 12 जनवरी, 1948 से लेकर 14 जून, 1952 तक बिहार के गवर्नर रहे. पहले तिलक और फिर गांधी के अनुयायी रहे माधव श्रीहरि अणे को "लोकनायक बापूजी" भी कहा जाता था. उन्होंने बाल गंगाधर तिलक की जीवनी संस्कृत भाषा में लिखी थी और इस पुस्तक के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला.
इन्हीं की स्मृति में इस मार्ग का नाम अणे मार्ग रखा गया. यह नाम कब रखा गया, इसकी जानकारी ज्यादातर लोगों को नहीं है. मगर कई पुराने राजनेता यह बताते हैं कि पहले इस जगह बिहार के राज्यपाल के सचिव का बंगला हुआ करता था. बाद में इसे राजकीय अतिथिशाला में बदल दिया गया.
सबसे पहले बिंदेश्वरी दुबे ने इसे सीएम हाउस बनाया
RJD के संस्थापक सदस्य रहे चितरंजन गगन बताते हैं कि आज जो राजकीय अतिथिशाला है, वह पहले मुख्यमंत्री आवास हुआ करता था. हालांकि कई मुख्यमंत्री अलग-अलग आवासों में भी रहते थे. जैसे जगन्नाथ मिश्र सर्कुलर रोड वाले आवास में रहते थे.
चितरंजन गगन कहते हैं, "1985 में जब कांग्रेसी नेता बिंदेश्वरी दुबे को बिहार का सीएम बनाया गया, तो उस वक्त सीएम रहे चंद्रशेखर सिंह ने आवास छोड़ने में वक्त लगा दिया. ऐसे में बिंदेश्वरी दुबे एक अणे मार्ग वाले राजकीय अतिथिशाला में रह गए. फिर वे वहीं रह गए और कभी उस वक्त के सीएम हाउस में शिफ्ट नहीं हुए. उन्होंने इसी जगह को सीएम हाउस के रूप में निर्धारित करवा लिया."
कुछ अलग स्रोत यह भी बताते हैं कि चूंकि इस बात को लेकर विधानसभा में शोर-शराबा होने लगा था, इसलिए बिंदेश्वरी दुबे ने ऐसा कराया. उनके बाद मुख्यमंत्री बने भागवत झा आजाद भी एक अणे मार्ग वाले बंगले में ही रहे. मगर फिर सीएम बने सत्येंद्र नारायण सिन्हा और जगन्नाथ मिश्र ने अपने पुराने बंगले से ही मुख्यमंत्री का दायित्व निभाया.
1990 में जब लालू प्रसाद यादव सीएम बने तो वे इस आवास में आ गए. चितरंजन गगन कहते हैं, "एक बार फिर उन्होंने इसे सीएम हाउस के रूप में निर्धारित करा लिया. हालांकि उस वक्त उस सड़क पर चार बंगले थे. एक बंगले में विधानसभा अध्यक्ष रहे राधानंदन झा भी रहते थे. जब उन्होंने बंगला खाली किया तो लालू जी ने उनके बंगले को भी सीएम हाउस का हिस्सा बना लिया."
दरअसल एक अणे मार्ग वाला बंगला आकार में छोटा था. उसमें ऊपर और नीचे मिला कर चार या पांच कमरे ही थे. इसलिए ऐसा करना जरूरी था.
लालू यादव और राबड़ी देवी दोनों के शासन के दौरान लगभग 15 साल उनका परिवार इसी जगह रहा. उस दौर को याद करते हुए चितरंजन गगन कहते हैं, "तब इस जगह इतनी सुरक्षा नहीं थी. दो-चार सिपाही रहते थे और कोई भी बंगले के अंदर जा और आ सकता था. होली के मौके पर यहां मजमा लगता था. बाकी वक्त भी नेता और पत्रकार जमे रहते और फरियादी आते रहते थे. खास मौके पर इसकी सुरक्षा बढ़ाई जाती थी."
नवंबर, 2005 में जब नीतीश कुमार सीएम बने और इस बंगले में आए, तो उन्होंने इस रास्ते के दो और बंगले में से एक में अपने विश्वस्त एवं करीबी आरसीपी सिंह को रहने दिया. बाकी एक हिस्सा आपदा प्रबंधन के कामकाज के लिए छोड़ दिया गया. मगर धीरे-धीरे वे दोनों बंगले भी सीएम आवास का हिस्सा हो गए. एक हिस्सा आवास और दूसरा उनके कार्यालय का हिस्सा हो गया. उनमें से कुछ हिस्सों में उनके नजदीकी रिश्तेदार भी रहने लगे. मार्ग को दोनों तरफ से बैरिकेड लगाकर घेर दिया गया और वहां सिक्योरिटी गार्ड्स लगा दिए गए. अभी भी यही स्थिति है.
हालांकि नीतीश कुमार अब अपने नए आवास सात देशरत्न मार्ग में शिफ्ट कर गए हैं, मगर इस रास्ते में जाना आज भी आम लोगों के लिए मुश्किल काम है. इस तरह एक अणे मार्ग नाम के इस रास्ते ने पिछले 35 वर्षों में दो तरह के रंग देखे हैं. एक लालू के दौर का रंग, जब यहां हर आम और खास आसानी से आ-जा सकता था. दूसरा नीतीश के दौर का रंग, जब यह किसी अभेद्य किले में बदल दिया गया.
अब इस मार्ग के नए निवासी सम्राट चौधरी होने वाले हैं. उन्होंने इसका नाम बदल दिया है, जिसमें लोक तत्व की प्रधानता है. अब देखना यह है कि वे जब यहां रहने आते हैं, तो क्या यह जगह बिहार के लोगों से गुलजार होगी या एक अभेद्य किला ही बनी रहेगी?

