दिसंबर 2025 में जेनेवा स्थित विश्व व्यापार संगठन (WTO) कार्यालय में सदस्य देशों की एक बैठक आयोजित हो रही थी. इस बैठक में चीन की अगुवाई में प्रस्तावित निवेश विकास सुविधा समझौते (IFDA) पर चर्चा होनी थी.
सभी देशों के प्रतिनिधि की नजर इस बात पर थी कि भारत का इसपर क्या पक्ष रहने वाला है. ज्यादातर को इस बात का अंदेशा था कि भारत इस समझौते का कड़ा विरोध कर सकता है. भारत ने किया भी कुछ ऐसा ही है.
भारत ने दृढ़ विश्वास के साथ संगठन में लिए जाने वाले हर फैसले में आम सहमति की बात दोहराई और इसपर अडिग रहा. हालांकि, हॉल में तनावपूर्ण माहौल के बीच करीब 130 सदस्य देशों ने इस समझौते का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर समर्थन किया.
इन देशों का कहना था कि IFDA एक आधुनिक और व्यवहारिक सुधार है, जिससे निवेश पहले से ज्यादा आसान हो जाएगा. दक्षिण अफ्रीका लंबे समय से इस मामले में भारत का सहयोगी रहा है. हालांकि, इस बार कम आक्रामक रुख अपनाते हुए दक्षिण अफ्रीका ने समझौते के विरोध के बजाय और ज्यादा समय की मांग की है.
इसके अलावा, तुर्किए ने भी समझौते को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की है, लेकिन जेनेवा में कई वार्ताकारों का मानना है कि तुर्किए लंबे समय तक अपने रुख पर कायम नहीं रह सकेगा. इस बैठक के बाद एक यूरोपीय राजनयिक ने कहा कि "ऐसा लगता है कि भारत को छोड़कर सभी इस समझौते पर आगे बढ़ रहे हैं."
हालांकि, भारत की राय अलग है. एक भारतीय व्यापार अधिकारी ने कहा, "यह WTO में शामिल ज्यादातर देशों से भारत के अलग-थलग होने का मामला नहीं है. भारत का रुख उस बहुपक्षीय भावना की रक्षा का मामला है, जिस पर विश्व व्यापार संगठन यानी WTO की नींव रखी गई थी. भारत के विचार में यह फैसला बहुपक्षीय पहलों यानी सभी 166 सदस्यों के सहमति से लिया जाना चाहिए, बजाय कुछ देशों के बीच हुए कुछ समझौतों के आधार पर."
निवेश प्रक्रिया को व्यवस्थित करने और पारदर्शिता बढ़ाने के उद्देश्य से बनाया गया IFDA देखने में तो हानिरहित लगता है, लेकिन भारत के लिए इसके मायने कहीं अधिक गंभीर हैं. अधिकारियों का कहना है कि भारत का विरोध इन चिंताओं पर आधारित है-
1. IFDA, WTO के मूल जनादेश से बाहर है. वस्तुओं और सेवाओं से जुड़े व्यापार को लेकर यह सर्वसम्मति पर आधारित फैसला लेने की प्रक्रिया को कमजोर करता है. यह समझौता यह सुनिश्चित करने में विफल है कि प्रत्येक सदस्य देश चाहे छोटा हो या बड़ा सभी को समान अधिकार प्राप्त हो.
2. IFDA विकासशील देशों की नीतिगत स्वतंत्रता को भी सीमित कर सकता है, जिन्हें अपने औद्योगिक और निवेश ढांचे को आकार देने में अभी भी लचीलेपन की आवश्यकता है. शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे खाद्य सुरक्षा, कृषि और विवाद निपटान प्रणाली को बहाल करने जैसे WTO के मूलभूत सुधारों से ध्यान भटकने का खतरा है. ऐसे में विकासशील देश की ओर से हो रहे वर्षों की मांगों पर पानी फिर सकता है.
3. WTO के एक वरिष्ठ वार्ताकार ने कहा, “भारत के सतर्क रहने का एक कारण है. एक बार निवेश सुविधा को विश्व व्यापार संगठन यानी WTO के नियमों में शामिल कर लिया जाए, तो बात यहीं खत्म नहीं होगी. इससे निवेशकों की सुरक्षा, विवाद समाधान तंत्र और प्रशासनिक सरलीकरण से कहीं आगे बढ़कर कई दायित्वों का द्वार खुल जाएगा." दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत को डर है कि यह समझौता विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को विनियमित करने की उसकी संप्रभु शक्ति को सीमित कर सकता है. इससे सरकार की उन घरेलू नीतियों पर असर पड़ सकता है जो स्थानीय उद्योगों या सार्वजनिक हितों की रक्षा के लिए बनाई जाती हैं.
4. भारत ने इस समझौते के तहत प्रस्तावित 'स्वतंत्र निकाय' द्वारा निवेश की पूर्व-जांच और कानूनी विवादों (ISDS) की संभावना पर भी आपत्ति जताई है.
IFDA विकासशील देशों की नीति को भी प्रतिबंधित कर सकता है, जिन्हें अभी भी अपनी औद्योगिक और निवेश ढांचों को आकार देने में लचीलापन की आवश्यकता है. शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विकासशील देशों के जरिए वर्षों से मांग किए जा रहे WTO के मूल सुधारों से ऊर्जा को हटा सकता है. इनमें खाद्य सुरक्षा, कृषि और विवाद निपटान प्रणाली प्रमुख हैं.
एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “एक बार निवेश सुविधा समझौता WTO के नियम में शामिल हो गया, तो यह वहीं नहीं रुकेगी. यह निवेशक संरक्षण, विवाद तंत्र और उन दायित्वों के लिए दरवाजा खोल देगी जो प्रशासनिक सरलीकरण से कहीं आगे जाती हैं.” दूसरे शब्दों में अभी जो समझौता एक हानिरहित सुधार जैसा दिखता है, वह समय के साथ देशों के पूंजी को रेगुलेट करने से जुड़े कानून में बदलाव कर सकती है.
WTO के एक अधिकारी ने इंडिया टुडे को बताया कि विश्व व्यापार संगठन की कुल सदस्यत 166 देशों में से 128 देश अब औपचारिक रूप से IFDA का हिस्सा हैं. इस समझौते को लेकर संख्यात्मक असंतुलन भारत के सामने मौजूद चुनौती को उजागर करता है. फिर भी भारतीय अधिकारी इस बात पर जोर दे रहे हैं कि संख्या नहीं बल्कि सिद्धांत का मामला है. एक भारतीय अधिकारी ने कहा, "यह इस बारे में नहीं है कि इस समझौते के समर्थन में कितने देश हैं और विरोध में कितने देश हैं. मामला यह सुनिश्चित करने के बारे में है कि कोई भी देश बाहर न रह जाए."
भारत को आशंका है कि WTO एक ऐसे प्रणाली को बढ़ावा दे सकता है, जहां विकासशील देश उन मानकों को निर्धारित करने में अपनी समान भूमिका खो देंगे जो उन्हें सबसे अधिक प्रभावित करते हैं. भारत की यह बेचैनी तथाकथित संयुक्त वक्तव्य पहलों (JSI) के प्रति उसके नजरिये में साफ रूप से दिखाई देती है, जो ई-कॉमर्स, सेवा विनियमन और अब निवेश सुविधा पर बहुपक्षीय वार्ताओं का एक समूह है.
भारत इन विषयों का स्वयं विरोध नहीं करता, वह डिजिटल इंक्लूजन और सीमा पार सेवाओं को सुगम बनाने का प्रबल समर्थक है. हालांकि, वह इन पहलों को आगे बढ़ाने के तरीके पर आपत्ति जताता है. एक अन्य अधिकारी ने साफ कहा. “हम नए विचारों के विरुद्ध नहीं हैं. हम बस यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जो लोग अभी इसमें शामिल होने के लिए तैयार नहीं हैं, उनके लिए दरवाजे बंद न हो जाएं.”
जेनेवा में कई राजनयिकों ने निजी तौर पर इस बात पर सहमति जताई कि भारत की सावधानी उचित है. बैठक के बाद एक अफ्रीकी दूत ने कहा, “आम सहमति कोई बाधा नहीं है. यह विश्वास की नींव है, जिसके बिना WTO शक्तिशाली देशों का बाजार बनने का जोखिम उठा रहा है.”
इसमें कोई दो राय नहीं कि कूटनीति की वास्तविकताएं बदल रही हैं. एक व्यापार वार्ताकार ने इंडिया टुडे को बताया, “अब यह एक कूटनीतिक स्थिति है. बाकी सभी लोग मूल्यों से हितों की ओर बढ़ चुके हैं. हम नहीं बढ़े हैं. इसलिए, निर्णय लेने वालों के लिए यह एक कठिन स्थिति है.”
दक्षिण अफ्रीका का नरम रुख इस बदलाव को और भी पुष्ट करता है. घरेलू आर्थिक जरूरतों से जूझ रहा दक्षिण अफ्रीका, भारत के साथ अपने पारंपरिक संबंधों और निवेश आकर्षित करने तथा सुधारों के प्रति खुलापन दिखाने के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. तुर्किए का रुख भी रणनीतिक प्रतीत होता है और यह कहना मुश्किल है कि वह अनिश्चित काल तक इस रुख पर कायम रहेगा. जेनेवा स्थित एक राजनयिक ने कहा, "वे बीच का रास्ता निकाल लेंगे, लेकिन भारत की सीमाएं स्पष्ट हैं. ये दृढ़ विश्वास पर आधारित हैं, सुविधा पर नहीं."
अफ्रीकी देश कैमरून के याउंड में 26 से 29 मार्च तक होने वाले 14वें विश्व व्यापार संगठन मंत्रिस्तरीय सम्मेलन पर अब सबकी नजर है. इस बार यहां IFDA, निवेश और विकास पर बहस का बोलबाला रहने की उम्मीद है. एक प्रतिनिधि ने कहा, "इस कार्यक्रम के लिए IFDA सबसे महत्वपूर्ण एजेंडा होगा, क्योंकि यह सिर्फ निवेश के बारे में नहीं है. यह इस बारे में है कि नियम कौन तय करता है और कैसे?"
याउंड में होने वाली इस बैठक में इस बात की परीक्षा होगी कि क्या सुविधावाद से परिभाषित होती जा रही, इस व्यवस्था में आम सहमति पर भारत का जोर नैतिक रूप से अभी भी मायने रख सकता है या नहीं?
विश्व व्यापार संगठन (WTO) के गलियारों में भारत के दृढ़ संकल्प के प्रति एक अनकहा सम्मान है. यहां तक कि जो राजनयिक इसके रुख से असहमत हैं, वे भी मानते हैं कि भारत उन चिंताओं को आवाज देती है, जिन्हें छोटे देश अक्सर उठाने से हिचकिचाते हैं. एक लैटिन अमेरिकी प्रतिनिधि ने कहा, "भारत वैश्विक दक्षिण के केंद्र से बोलता है. आप उनसे हमेशा सहमत न हों, लेकिन आप जानते हैं कि उनका रुख क्या है."
जैसे-जैसे वैश्विक व्यापार राजनीति अधिक लेन-देन आधारित होती जा रही है, इस तरह के सिद्धांतों पर भारत का अडिग रुख लगभग कम लाभकारी लगता है. फिर भी एक ऐसी व्यवस्था जहां विश्वास कम हो रहा है और आम सहमति खत्म हो रही है, यही शायद WTO को एकजुट रखने वाला एक वजह भी हो सकता है.

