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महिला आरक्षण और परिसीमन: सीटों के विस्तार में छिपी राजनीति

परिसीमन कागज पर एक प्रशासनिक अभ्यास भर लगता है लेकिन भारत जैसे विविधता भरे संघीय ढांचे वाले देश में यह हमेशा से सत्ता के वितरण का औजार रहा है

आखिरी बार परिसीमन 2002 में हुआ था (फोटो : AI)
अपडेटेड 16 अप्रैल , 2026

भारत की राजनीति में कई बार ऐसा हुआ है कि किसी विधेयक को उसके घोषित उद्देश्य से नहीं बल्कि उसके दूरगामी असर से याद रखा गया. मंडल आयोग केवल आरक्षण की बहस नहीं था, वह सामाजिक सत्ता-संतुलन का पुनर्विन्यास था. जीएसटी केवल कर सुधार नहीं था, उसने संघीय वित्तीय ढांचे को नए सिरे से परिभाषित किया.

और अब संभव है कि महिला आरक्षण से जुड़ा यह परिसीमन पैकेज भी आने वाले वर्षों में केवल लैंगिक प्रतिनिधित्व के कानून के रूप में नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के भूगोल को बदल देने वाले क्षण के रूप में याद किया जाए क्योंकि संसद में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की इस संवैधानिक परियोजना के भीतर एक और बड़ी कहानी छिपी है. कहानी सत्ता, प्रतिनिधित्व और उत्तर-दक्षिण संतुलन के पुनर्लेखन की.

लोकसभा के विशेष सत्र में 16 अप्रैल को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण का बचाव करते हुए कहा कि देश की 50 प्रतिशत आबादी को नीति-निर्माण में भागीदारी मिलनी चाहिए और जो इसका विरोध करेंगे उन्हें इसकी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी, तब उनका स्वर नैतिक आग्रह का था. उन्होंने कहा कि देश को अब अपनी बहनों पर भरोसा करना चाहिए और उन्हें निर्णय प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका देनी चाहिए.

लेकिन संसद के भीतर यह अपील जितनी सरल सुनाई दी, उसके बाहर उसकी राजनीतिक प्रतिध्वनि उतनी ही जटिल रही. क्योंकि यह आरक्षण सीधे-सीधे परिसीमन से जुड़ा है, और परिसीमन भारत के संघीय ढांचे के सबसे संवेदनशील प्रश्नों में से एक है.

लोकसभा के विशेष सत्र में महिला आरक्षण के मुद्दे पर बोलते हुए पीएम मोदी
लोकसभा में महिला आरक्षण पर बोलते हुए पीएम मोदी

परिसीमन यानी जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों का पुनर्निर्धारण. कागज पर एक यह एक प्रशासनिक अभ्यास लगता है लेकिन भारत जैसे विविधता भरे संघीय ढांचे वाले देश में यह हमेशा से सत्ता के वितरण का औजार रहा है. आखिरी बार व्यापक परिसीमन 1971 की जनगणना के बाद हुआ था और सीटों की संख्या 543 की गई थी.

उसके बाद यह आशंका उभरी कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई है, वे कम जनसंख्या वृद्धि के कारण सीटें खो देंगे. तब यह निर्णय लिया गया कि विकास और जनसंख्या नियंत्रण को दंडित नहीं किया जा सकता. साल 2002 में परिसीमन हुआ लेकिन सीटों की संख्या जस की तस रखी गई. वही स्थगित संतुलन अब खुलने जा रहा है.

सरकार की योजना के अनुसार लोकसभा का आकार 543 से बढ़ाकर लगभग 850 सीटों तक किया जा सकता है और इनमें लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. सरकार का तर्क है कि महिला आरक्षण को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए संसद का विस्तार और निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन आवश्यक है. लेकिन भारतीय राजनीति में संख्या कभी केवल संख्या नहीं होती.

हर सीट अपने भीतर एक भूगोल, एक भाषा, एक जातीय-सामाजिक संरचना और एक राजनीतिक संभावना समेटे होती है. इसलिए सीटों की संख्या बदलना वस्तुतः सत्ता के नक्शे को बदलना है.

यही वजह है कि दक्षिण भारत में इस प्रस्ताव को लेकर गहरी बेचैनी है. तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों को आशंका है कि यदि परिसीमन वर्तमान जनसंख्या के आधार पर हुआ तो उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व तेजी से बढ़ेगा और दक्षिण की तुलनात्मक शक्ति घट जाएगी.

दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश किया, सामाजिक विकास के मानकों पर बेहतर प्रदर्शन किया और अब यदि उसी का परिणाम संसदीय शक्ति में कमी के रूप में सामने आता है तो यह सफलता की सजा होगी.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि यह प्रक्रिया अंततः उन अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को लाभ पहुंचा सकती है जहां भाजपा की राजनीतिक पकड़ पहले से मजबूत है. उनके अनुसार इससे कई राज्यों की तुलनात्मक शक्ति कम होगी और संसद का क्षेत्रीय संतुलन बदल जाएगा. उन्होंने असम और जम्मू-कश्मीर के परिसीमन का उदाहरण देते हुए संकेत दिया कि केंद्र सरकार पहले भी परिसीमन का उपयोग राजनीतिक इंजीनियरिंग के औज़ार की तरह करती रही है.

परिसीमन के मुद्दे पर आंध्र प्रदेश को छोड़कर दक्षिण के बाकी राज्यों में खासा आक्रोश देखा जा रहा है
परिसीमन के मुद्दे पर आंध्र प्रदेश को छोड़कर दक्षिण के बाकी राज्यों में खासा आक्रोश देखा जा रहा है

परिसीमन विधेयक, 2026 में परिसीमन आयोग के गठन का प्रावधान है. संशोधन विधेयक में कहा गया है कि आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह 'नवीनतम जनगणना आंकड़ों' के आधार पर सीटों का आवंटन करेगा. ध्यान दीजिए यहां नवीनतम जनगणना आंकड़ों की बात है. 2011 के बाद से कोई जनगणना नहीं हुई. 

इन आशंकाओं को कम करने के लिए भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने संसद में सरकार का 50 प्रतिशत फॉर्मूला रखा. सूर्या के अनुसार सरकार की योजना है कि हर राज्य की मौजूदा लोकसभा सीटों में लगभग पचास प्रतिशत की समान वृद्धि की जाएगी ताकि किसी राज्य की वर्तमान हिस्सेदारी अचानक कम न हो. इस मॉडल के तहत तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर लगभग 59, केरल की 20 से 30 और कर्नाटक की 28 से 42 तक जा सकती हैं. भाजपा इसे दक्षिण और छोटे राज्यों के लिए लाभकारी व्यवस्था बता रही है.

विपक्ष का कहना है कि यह 50 प्रतिशत फॉर्मूला अभी केवल एक राजनीतिक बयान है. मसौदे में सीटों के राज्यवार आवंटन के बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा गया है. ऐसे में 50 फीसदी का आंकड़ा कहां से आया? यह काम तो परिसीमन आयोग का है. और वह नवीनतम जनगणना आंकड़ों पर यह तय करेगा. अगर 2011 की जनगणना के लिहाज से सीटों का पुनर्गठन होता है तो उत्तर की सीटें बढ़ जाएंगी. परिसीमन आयोग यदि जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर चलता है तो वर्तमान आश्वासनों की दिशा बदल सकती है.

तमिलनाडु में इस आशंका को सबसे मुखर रूप दिया है मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने. काले झंडे फहराकर, काले वस्त्र धारण कर और विधेयक की प्रति जलाकर उन्होंने इसे प्रतीकात्मक प्रतिरोध का रूप दिया. उनके लिए यह केवल सीटों की गणना नहीं, दक्षिण भारतीय अस्मिता और संघीय अधिकारों की लड़ाई है. यह वही राजनीतिक भाषा है जिसने भारतीय संघवाद की कई पुरानी बहसों को आकार दिया है, केंद्र बनाम राज्य, हिंदी पट्टी बनाम गैर हिंदी क्षेत्र, संख्या बनाम संतुलन.

और यहीं इस पूरे विवाद का केंद्रीय प्रश्न उभरता है. लोकतंत्र का सिद्धांत कहता है कि अधिक जनसंख्या को अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. लेकिन संघवाद का सिद्धांत कहता है कि केवल संख्या ही सब कुछ नहीं हो सकती, क्योंकि तब छोटे, सफल या कम जनसंख्या वाले क्षेत्र लगातार हाशिए पर चले जाएंगे.

भारत जैसे देश में प्रतिनिधित्व केवल गणित नहीं, राजनीतिक न्याय का प्रश्न भी है. महिला आरक्षण के नाम पर शुरू हुई यह प्रक्रिया इसीलिए अब कहीं बड़ी बहस में बदल चुकी है.

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव का कहना है कि भाजपा देश की एकता और संघीय ढांचे के साथ खुला धोखा कर रही है. हालांकि पीएम मोदी ने सदन में गारंटी देते हुए कहा कि,  पहले जो परिसीमन हुआ है और जो अनुपात पहले से चला आ रहा है, उसमें कोई बदलाव नहीं होगा. उन्होंने आगे कहा कि "हम भ्रम में न रहें कि हम नारी शक्ति को  कुछ दे रहे हैं, यह उनका हक है. और हमने कई दशकों से रोका हुआ है, आज उसका प्रायश्चित कर हमें उस पाप से मुक्ति पाने का अवसर है."

इस बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार पर महिलाओं के अधिकारों को लेकर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि परिसीमन की बारी आई तो सरकार ने पूरी रणनीति बनाई कि कैसे क्षेत्र बनाए जाएं कि इसका फायदा इन लोगों को ही मिले. इसलिए हम चाहते हैं कि पहले जनगणना हो. वहीं कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़कर राजनीतिक उद्देश्य साध रही है.

प्रश्न केवल यह नहीं है कि संसद में महिलाएं कितनी होंगी. वह बिल तो 2023 में पास हो चुका. सवाल है कि उसकी आड़ में परिसीमन कर सरकार क्या चाहती है? संसद में कौन-सा भारत अधिक मुखर होगा. वह जो जनसंख्या में बड़ा है या वह जिसने विकास और जनसंख्या नियंत्रण के सामाजिक मॉडल पर जोर दिया है. बहुतों को आशंका है कि सरकार 2024 जैसे नतीजों से बचना चाहती है इसलिए 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यह उसकी परिसीमन की रणनीति है.

परिसीमन का यह प्रस्ताव इस अर्थ में केवल एक विधेयक नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के अगले अध्याय की प्रस्तावना है. संभव है कि आने वाले वर्षों में जब इस दौर को याद किया जाए तो इसे महिला आरक्षण के कानून से अधिक उस क्षण के रूप में देखा जाए जब भारत ने अपनी संसद का आकार ही नहीं, अपनी राजनीति का भूगोल भी बदलना शुरू किया.

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