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मोदी की फांस: दोराहे पर नीतीश

सालाना बजट यूं तो सरकार की आर्थिक कवायद होती है और उसमें विशेष समूहों को खुश करने की राजनीति भी होती है. इसलिए 28 फरवरी को पी. चिदंबरम के बजट पेश करने के चंद घंटों के अंदर जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बजट का स्वागत किया तो राजनीति पर नजर रखने वालों के कान खड़े हो गए.

नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी
नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी
अपडेटेड 8 मार्च , 2013

सालाना बजट यूं तो सरकार की आर्थिक कवायद होती है और उसमें विशेष समूहों को खुश करने की राजनीति भी होती है. इसलिए 28 फरवरी को पी. चिदंबरम के बजट पेश करने के चंद घंटों के अंदर जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बजट का स्वागत किया तो राजनीति पर नजर रखने वालों के कान खड़े हो गए. मुख्य विपक्षी गठबंधन एनडीए का एक मुख्यमंत्री और दूसरे सबसे बड़े सहयोगी दल का नेता केंद्रीय बजट की तारीफ करे, ऐसा अक्सर नहीं होता. हालांकि नीतीश कुमार की बजट की प्रशंसा बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने के लिए जताए गए संकेतों के संदर्भ में है लेकिन इसे एनडीए की अंदरूनी राजनीति से काटकर नहीं देखा जा सकता.

मौजूदा समय में सवाल यह है कि अगर बीजेपी नरेंद्र मोदी को बतौर प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करे तो क्या नीतीश एनडीए छोड़ देंगे? यह यक्ष प्रश्न देश के सामने है जिसका जवाब फिलहाल निश्चितता के साथ नहीं दिया जा सकता. लेकिन राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि जहां एनडीए के नेताओं में प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी का समर्थन करने की होड़ मची है, वहीं जेडीयू के नीतीश कुमार गठबंधन छोडऩे की संभावनाओं पर विचार कर सकते हैं.

बिहार के मुख्यमंत्री के लिए पाला बदलना राजनैतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है, लेकिन बिहार में बीजेपी से गठबंधन के फायदों को छोडऩा भी मुफीद नहीं दिखता. मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में कबूल करने की स्थिति में नीतीश के सामने मुस्लिम वोटों को खोने का खतरा हो जाएगा. बिहार के कुल मतदाताओं में लगभग 16 फीसदी मुसलमान हैं. नीतीश खेमे को डर है कि नरेंद्र मोदी अगर एनडीए के नेता के तौर पर सामने आते हैं तो वे फिर से बिहार में सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाएंगे, क्योंकि वे बड़ी मुश्किल से मुस्लिम मतदाताओं का लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) से मोहभंग कर पाए हैं.

मुसलमानों के लिए कल्याणकारी उपाय करने और नवंबर 2005 में सत्तारूढ़ होने के बाद से प्रदेश में चुनाव प्रचार से नरेंद्र मोदी को दूर रखने के लिए बीजेपी को मजबूर कर ही नीतीश ने यह सफलता हासिल की है. मोदी के मुद्दे पर बीजेपी से नाता तोड़कर नीतीश मुसलमान मतदाताओं के बीच नायक तो बन सकते हैं, लेकिन वे संभवत: बीजेपी समर्थक उच्च जाति के 12 फीसदी वोट बैंक से वंचित रह जाएं. यह भी तथ्य है कि 1995 में जब नीतीश और बीजेपी अलग-अलग विधानसभा चुनाव लड़े थे तो अविभाजित बिहार की 324 विधानसभा सीट में से दोनों को मिलाकर महज 48 सीटें ही मिल पाई थी.    

नीतीश की मुश्किल यह है कि वे मोदी के नाम पर समझौता कर लेते हैं तो लालू को अपना यादव-मुसलमान (एमवाइ) जनाधार फिर से हासिल करने का मौका मिल जाएगा. वैसे बीजेपी के साथ नीतीश का गठबंधन फायदेमंद रहा है.    

नीतीश को पता है कि बीजेपी-जेडीयू गठबंधन टूटने से नए सामाजिक-राजनैतिक समीकरण उभर सकते हैं. 2010 में एनडीए को मिले 39 फीसदी मतों की तुलना में आरजेडी-लोक जनशक्तिपार्टी गठबंधन को 29 फीसदी वोट मिले थे. नीतीश ने सावधानी बरतते हुए अभी तक मोदी की बजाए किसी 'धर्मनिरपेक्ष’ उम्मीदवार को नामित किए जाने के लिए एनडीए के सामने कोई समय सीमा नहीं निर्धारित की है. लेकिन मोदी को 'सबसे लोकप्रिय नेता’ और 2014 के लोकसभा चुनाव में 'एक महत्वपूर्ण भूमिका’ के लिए उपयुक्त बताने वाले बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह के 18 फरवरी के बयान ने पार्टी की रणनीति की ओर इशारा कर दिया है. लेकिन नीतीश तब तक किसी फैसले के मूड में नहीं दिखते हैं, जब तक बीजेपी फैसला नहीं कर लेती. नीतीश ने हाल ही में कहा, ''इस मुद्दे पर हमारी पार्टी में कोई शंका नहीं है. मगर गठबंधन के नेतृत्व का मसला एनडीए की बैठक में ही तय किया जाएगा.” 16 फरवरी को स्कूली बच्चों के लिए सूर्य नमस्कार अनिवार्य करने वाले परिपत्र को जिस तत्परता से उन्होंने संशोधित करवाया, उससे भी अल्पसंख्यक मतदाताओं को नाराज न करने की उनकी इच्छा ही जाहिर हुई. मतलब साफ है-नीतीश एनडीए के लिए अपनी राजनीति कुर्बान नहीं करेंगे.

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