टेक्नोलॉजी कंपनियों में गिग हायरिंग- मांग या प्रोजेक्ट के अनुसार कम समय के लिए भर्तियां बढ़ रही हैं. HR सर्विसेज फर्म CIIL-HR का अनुमान है कि सभी तरह की अस्थायी नौकरियों में इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) का एक बड़ा हिस्सा है, और पिछले एक साल में इसमें 10 फीसदी का इजाफा हुआ है.
यह बात थोड़ी अटपटी लग सकती है क्योंकि पिछले साल छंटनियों के कारण आईटी कंपनियां खबरों में छाई थीं. लेकिन, CIIL-HR के प्रबंध निदेशक और सीईओ आदित्य मिश्र बताते हैं कि छंटनियों का मकसद लंबी अवधि वाले निश्चित खर्चों को दुरुस्त करना है. गिग हायरिंग इसलिए बढ़ रही है क्योंकि इससे कंपनियों को जरूरत पड़ने पर आवश्यक स्किल हासिल करने की सुविधा मिलती है, वह भी स्थायी प्रतिबद्धता के बिना. मिश्र कहते हैं, “एक अस्थिर बाजार में कंपनियां चुस्ती और लागत नियंत्रण को प्राथमिकता दे रही हैं. जिस चीज से मदद मिली है, वह है टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्मों का उभार, जिन्होंने बड़े पैमाने पर फ्लेक्सिबल टैलेंट की तैनाती आसान कर दी है, खासकर प्रोजेक्ट बेस्ड और रिजल्ट ओरिएंटेड काम के लिए.”
माइकल पेज इंडिया और सिंगापुर के वरिष्ठ प्रबंध निदेशक, निलय खंडेलवाल कहते हैं कि छंटनियों के बावजूद टेक प्रतिभाओं की मांग बनी हुई है, हालांकि यह मांग अलग-अलग रूप में है. "जिन कंपनियों ने कर्मचारियों को निकाला है, उन्होंने टेक्नोलॉजी में दूसरे लोगों को भर्ती भी किया है, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में. इनमें अधिकतर नए जमाने की तकनीक से संबंधित हैं. मगर, उतनी संख्या में नहीं," निलय आगे यह भी जोड़ते हैं. "कंपनियां वर्कफोर्स में अब 70:30 का अनुपात चाह रही हैं, जहां 70 फीसदी स्थाई और 30 फीसदी कॉन्ट्रेक्ट पर या अस्थाई हैं."
इससे दो मकसद पूरे होते हैं. खासकर मल्टीनेशनल कंपनियों में, स्थाई भर्तियों के लिए मंजूरी लेना मुश्किल हो सकता है, इसलिए गिग हायरिंग बीच का रास्ता मुहैया करा देती है. खंडेलवाल यह भी कहते हैं कि अब जब टेक टैलेंट, खासकर नए जमाने के क्षेत्रों में, बहुत ज्यादा महंगी मिलता है, तो गिग वर्कर महत्त्वपूर्ण बेंच-स्ट्रेंथ मुहैया कराते हैं. अगर स्थाई कर्मियों में से कोई नौकरी छोड़ता है, तो उसकी जगह दूसरे को लाने में लगने वाला समय बहुत कम हो जाता है क्योंकि कंपनी के पास पहले से ही ऐसे गिग वर्करों का एक पूल होता है जिनके साथ उसने काम किया होता है और जिन्हें स्थायी भूमिका में रखा जा सकता है.
खंडेलवाल कहते हैं, "इसलिए, कंपनियां कुल मिलाकर गिग का जहां अस्थाई समाधान के तौर पर इस्तेमाल कर रही हैं, वहीं कुछ स्थितियों में उन्हें स्थाई भूमिका देने पर भी विचार कर रही हैं." वे बताते हैं कि टेक फर्मों में गिग टैलेंट को काम दिलाने का माइकल पेज का अपना कारोबार सालाना आधार पर 100 फीसदी बढ़ा है, और यह रफ्तार अगले कुछ सालों तक जारी रहने की संभावना है. इसलिए कि आईटी फर्मों के अलावा ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) में भी गिग भर्ती का रुझान तेजी से दिख रहा है. कई GCC आईटी कंसल्टिंग कंपनियों पर निर्भर रहने के बजाय अपनी खुद की क्षमताएं बनाने और इन-हाउस टेक्नोलॉजी वर्टिकल्स डेवलप करने पर विचार कर रहे हैं. माइकल पेज पर इन गिग वर्करों का औसत सालाना वेतन आमतौर पर 30-35 लाख रुपये के दायरे में होता है, हालांकि यह 15 लाख से लेकर 70 लाख रुपये तक भी हो सकता है.
कुल मिलाकर, गिग की ज्यादातर मांग आईटी कंसल्टिंग, डेटा एनालिटिक्स, डेटा इंजीनियरिंग और मशीन लर्निंग और एआई विशेषज्ञता में है. साथ ही पार्ट टाइम या कॉन्ट्रेक्ट वाले लीडरशिप रोल भी हैं. इनमें से ज्यादातर पद शुरुआती स्तर से लेकर मिड-एक्सपीरियंस लेवल के हैं, यह बात वेतन में भी दिखती है, जिसमें कई लोगों की सालाना सैलरी 6-10 लाख रुपये के बीच है. विशेष तकनीकी कौशल या अपने डोमेन में अनुभवी लोगों को 10-15 लाख रुपये के बीच वेतन मिलता है, जबकि सीनियर और लीडरशिप लेवल के गिग रोल के लिए 15 लाख रुपये और उससे अधिक मिलते हैं.

