प्रयागराज में 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के पावन स्नान से शुरू हुआ विवाद 20 जनवरी को एक नोटिस से और तीखा हो गया. माघ मेला प्रशासन की ओर से ज्योतिषपीठ बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को जारी एक नोटिस ने न सिर्फ संगम तट पर, बल्कि देश भर के धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी.
नोटिस में उनसे यह सवाल किया गया कि वे अपने नाम के साथ “शंकराचार्य” की उपाधि का इस्तेमाल किस आधार पर कर रहे हैं. नोटिस में कहा गया है, “यह साफ़ है कि किसी भी धर्माचार्य को ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के रूप में अभिषेक नहीं किया गया है. इसके बावजूद, आपने माघ मेले के दौरान अपने कैंप में लगाए गए बोर्ड पर खुद को ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के रूप में घोषित और प्रदर्शित किया है... आपका यह काम सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना दिखाता है.”
प्रशासन ने 2022 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए 24 घंटे में जवाब मांगा है. इस नोटिस की पृष्ठभूमि तब तैयार हुई जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके समर्थक मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान की तैयारी कर रहे थे. आरोप है कि इसी दौरान पुलिस ने उनके काफिले और जुलूस को आगे बढ़ने से रोका. प्रशासन का कहना है कि किसी को स्नान से नहीं रोका गया, लेकिन भारी भीड़ के कारण पूरे जुलूस को अनुमति देना सुरक्षा की दृष्टि से संभव नहीं था.
इसके बाद प्रशासन पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाकर शंकराचार्य ने धरना शुरू कर दिया. उनका धरना अभी भी जारी है. शंकराचार्य इस बात पर अड़े हैं कि प्रशासन माफी मांगे. उनका कहना है कि माफी के बिना वे अपने आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे. वहीं नोटिस के बाद विवाद ने राजनीतिक रंग भी ले लिया. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे “बेहद निंदनीय” बताया और BJP पर अहंकार का आरोप लगाया. कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने दिल्ली में कहा कि जिस तरह एक शीर्ष हिंदू संत से कागजात मांगे जा रहे हैं, वह अभूतपूर्व है. अखिल भारत हिंदू महासभा ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई और सार्वजनिक माफी की मांग की.
लेकिन यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ है. ज्योतिषपीठ, जिसे बद्रिकाश्रम या उत्तराम्नाय मठ कहा जाता है, उससे जुड़े शंकराचार्य पद का विवाद करीब एक सदी से ज्यादा पुराना है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की पदवी पर सवाल उसी लंबी और जटिल परंपरा, कानूनी लड़ाइयों और आपसी मतभेदों की नई कड़ी है.
ज्योतिषपीठ का ऐतिहासिक महत्व
ज्योतिषपीठ, उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में स्थित है. इसे आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार प्रमुख पीठों में से एक माना जाता है. यह उत्तर दिशा का प्रतिनिधित्व करता है और यहां अथर्ववेद के अध्ययन की परंपरा रही है. अन्य तीन पीठ हैं—शृंगेरी (दक्षिण), द्वारका (पश्चिम) और पुरी (पूर्व). आदि शंकराचार्य ने इन पीठों की स्थापना केवल धार्मिक केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की वैचारिक और दार्शनिक निरंतरता के लिए की थी. इसी उद्देश्य से उन्होंने ‘मठाम्नाय महानुशासनम्’ नामक ग्रंथ की रचना की, जिसे शंकराचार्य परंपरा का एक तरह का संविधान माना जाता है. इसमें उत्तराधिकार, योग्यता और आचार संहिता से जुड़े स्पष्ट नियम बताए गए हैं.
1941 से पहले : खाली गद्दी और शुरुआती दावे
ज्योतिषपीठ का विवाद 20वीं सदी में भले ही अदालतों तक पहुंचा हो, लेकिन इसकी जड़ें 18वीं सदी में हैं. तब इस पीठ पर स्वामी रामकृष्ण तीर्थ आसीन थे. उनके निर्वाण के बाद लगभग 165 वर्षों तक ज्योतिषपीठ निष्क्रिय रही. इस लंबे अंतराल में न तो कोई सर्वमान्य शंकराचार्य रहा और न ही मठ की नियमित गतिविधियां. इस दौर में कई साधुओं और गुरुओं ने खुद को शंकराचार्य बताना शुरू किया. कुछ समय के लिए बद्रीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी रावल को भी ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य मानने की बात सामने आई. 1900 के दशक की शुरुआत से ही इन दावों को लेकर दीवानी मुकदमे दर्ज होने लगे.
1941 में ब्रह्मानंद सरस्वती की नियुक्ति
करीब 168 वर्षों के अंतराल के बाद 11 मई 1941 को ज्योतिषपीठ को एक सर्वमान्य शंकराचार्य मिला. पुरी, शृंगेरी और द्वारका पीठ के शंकराचार्यों की पहल पर स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती को इस पद के लिए राजी किया गया. वाराणसी स्थित भारत धर्म महामंडल से जुड़े विद्वानों और संतों ने उनकी नियुक्ति की. पुरी के शंकराचार्य स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ और शृंगेरी के शंकराचार्य स्वामी चंद्रशेखर भारती ने इस चयन का समर्थन किया. गढ़वाल, वाराणसी और दरभंगा के शासकों ने भी उन्हें मान्यता दी. ब्रह्मानंद सरस्वती के कार्यकाल में ज्योतिषपीठ उत्तर भारत में अद्वैत वेदांत का प्रमुख केंद्र बना. दिसंबर 1952 में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी इस मठ में पहुंचे थे. 20 मई 1953 को स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होते ही उत्तराधिकार का सवाल फिर खड़ा हो गया.
वसीयत विवाद और शांतानंद सरस्वती
ब्रह्मानंद सरस्वती के बाद उनके शिष्य स्वामी हरिहरानंद को शंकराचार्य बनाने का प्रस्ताव आया, लेकिन उन्होंने मना कर दिया. इसके बाद दावा किया गया कि ब्रह्मानंद सरस्वती ने मृत्यु से पांच महीने पहले एक वसीयत बनाई थी, जिसमें चार उत्तराधिकारियों के नाम दर्ज थे. इस वसीयत के आधार पर स्वामी शांतानंद सरस्वती ने शंकराचार्य पद ग्रहण किया. हालांकि पुरी, द्वारका और शृंगेरी पीठ के शंकराचार्यों सहित कई वरिष्ठ संतों ने इसे मान्यता नहीं दी. उनका तर्क था कि ‘मठाम्नाय महानुशासनम्’ में वसीयत के जरिए उत्तराधिकार की कोई व्यवस्था नहीं है. वसीयत को फर्जी बताकर अदालत का दरवाजा खटखटाया गया. 1955 में सिविल कोर्ट ने स्वामी शांतानंद सरस्वती को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र दिया. 1965 से 1970 के बीच चले मुकदमों के बाद अदालतों ने उनकी नियुक्ति को वैध ठहराया.
1980 से 2017 : नया दौर, नए दावे
28 फरवरी 1980 को स्वामी शांतानंद सरस्वती ने पद त्याग कर स्वामी विष्णुदेवानंद सरस्वती को उत्तराधिकारी बनाया. 1989 में विष्णुदेवानंद ने वसीयत के जरिए स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती को उत्तराधिकारी घोषित किया. इसी दौरान स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने इस नियुक्ति को चुनौती दी. यह विवाद अदालतों में चलता रहा. 1999 में ट्रायल कोर्ट ने वासुदेवानंद के खिलाफ स्टे दिया. 2000 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया.
2004 में हाईकोर्ट का फैसला वासुदेवानंद के पक्ष में आया, जिसे स्वरूपानंद सरस्वती ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. 22 नवंबर 2017 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि स्वरूपानंद और वासुदेवानंद दोनों ही शंकराचार्य के रूप में वैध नहीं हैं. कोर्ट ने नियुक्तियों को अवैध ठहराते हुए एक समिति बनाकर नए शंकराचार्य के चयन का निर्देश दिया. इस फैसले के बाद विवाद और गहरा गया और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया.
2022 में स्वरूपानंद सरस्वती का निधन और नया विवाद
11 सितंबर 2022 को 99 वर्ष की उम्र में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का निधन हो गया. उनके पार्थिव शरीर के सामने ही उत्तराधिकार की घोषणा की गई. वसीयत के आधार पर उनके शिष्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिषपीठ बद्रीनाथ और स्वामी सदानंद को द्वारका शारदा पीठ की गद्दी सौंपने का ऐलान किया गया. अगले ही दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने खुद को शंकराचार्य घोषित कर दिया. इस पर कई अखाड़ों और गोवर्धन मठ, पुरी जैसी पीठों ने आपत्ति जताई. निरंजनी अखाड़े के प्रमुख महंत रविंद्र पुरी ने कहा कि नियुक्ति की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ. 16 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक, छत्र और चंवर के उपयोग पर रोक लगा दी. हालांकि उनके वकील पीएन मिश्रा का तर्क है कि 21 सितंबर 2022 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें शंकराचार्य कहा था और 14 अक्टूबर का आदेश 17 अक्टूबर के बाद होने वाले पट्टाभिषेक पर लागू होता है, जबकि उनका पट्टाभिषेक इससे पहले हो चुका था.
माघ मेला नोटिस और मौजूदा टकराव
माघ मेला प्रशासन ने 19 जनवरी 2026 के नोटिस में कहा कि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है और जब तक अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक किसी को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य घोषित नहीं किया जा सकता. प्रशासन का आरोप है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने कैंप के बोर्ड पर खुद को शंकराचार्य लिखकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना की. उनके कम्युनिकेशन इंचार्ज संजय पांडे का कहना है कि शंकराचार्य की परंपरा 2,500 साल पुरानी है और इसमें प्रशासन को दखल नहीं देना चाहिए. उन्होंने नोटिस के समय पर भी सवाल उठाया और कहा कि वे एक महीने से वहीं कैंप कर रहे थे, तब प्रशासन क्यों नहीं जागा. प्रशासन की ओर से जिलाधिकारी मनीष कुमार वर्मा का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद कानूनी राय लेकर ही प्रोटोकॉल तय किया गया है.
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का मामला केवल एक व्यक्ति की पदवी का सवाल नहीं है. यह सनातन परंपरा, मठाम्नाय महानुशासनम् की व्याख्या, अदालतों के आदेश और राज्य की भूमिका के टकराव की कहानी है. जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अंतिम फैसला नहीं सुनाता, तब तक ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य विवाद यूं ही सुर्खियों में बना रहने की संभावना है.

