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डॉलर के मुकाबले अब तक के सबसे निचले स्तर पर क्यों पहुंचा रुपया?

रुपया 90 के पार पहुंचने से आयातित सामानों के महंगे होने का खतरा और बढ़ गया है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 3 दिसंबर , 2025

3 दिसंबर को भारतीय रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया. दिन के शुरुआती कारोबार में ही डॉलर के मुकाबले रुपया 9 पैसे गिरकर 90.05 के स्तर पर खुला है.

इससे पहले 2 दिसंबर को रुपया 89.96 पर बंद हुआ था. डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत ऐसे समय में गिर रही है, जब देश की जीडीपी वृद्धि दर पिछले 6 तिमाहियों में सबसे ज्यादा रही है.

पिछले हफ्ते सरकार ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 8.2 फीसद रही, जो उम्मीद से भी ज्यादा है. इसके बावजूद आखिर रुपये की कीमत क्यों घट रही है? डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत कैसे तय होती है और रुपये की कीमत घटने या बढ़ने से देश के आम लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है? इन सभी सवालों के जवाब जानते हैं :

डॉलर के मुकाबले रुपया अपने सबसे निचले स्तर पर क्यों पहुंचा?

डॉलर के मुकाबले रुपया के निचले स्तर पर गिरने की तीन मुख्य वजहें बताई जा रही हैं-

1. विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से पैसा निकालना: जुलाई 2025 से अब तक विदेशी संस्थागत निवेशक यानी FIIs ने भारतीय बाजार में ₹1.03 लाख करोड़ से ज्यादा की बिक्री की है. टैरिफ की आशंका से विदेशी निवेशक देश से पैसा निकाल रहे हैं. दुनिया के बाजार में डॉलर की मांग बढ़ गई है, जो रुपए की कीमत को गिरा रहा है.

2. टैरिफ के डर से रुपया पर प्रेशर: भारतीय रुपये पर प्रेशर होने की एक बड़ी वजह ट्रंप के टैरिफ का डर है. ट्रंप ने भारतीय आयात पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया हैं, जो भविष्य में भारत की GDP ग्रोथ के लिए काफी अच्छा नहीं है. इसके कारण एक्सपोर्ट घटने से देश में डॉलर की आमद घटने की संभावना है. यह रुपये पर दवाब की दूसरी वजह है.

3. दुनियाभर में डॉलर स्टॉक करने का ट्रेंड बढ़ा है: खबर तो ये भी है कि तेल और सोने की कंपनियां संभावित नुकसान से बचने के लिए डॉलर खरीद रही हैं. कई दूसरे आयातक व निवेशक भी टैरिफ अनिश्चितता के कारण डॉलर स्टॉक कर रहे हैं. इससे अपने देश की करेंसी पर लगातार दबाव बना हुआ है.

डॉलर के मुकाबले किसी देश के करेंसी की कीमत कैसे तय होती है?

डॉलर की तुलना में किसी भी अन्य करेंसी की वैल्यू घटे तो उसे मुद्रा का गिरना, टूटना, कमजोर होना कहते हैं. हर देश के पास फॉरेन करेंसी रिजर्व होता है, जिससे वह इंटरनेशनल लेन-देन करता है. विदेशी मुद्रा भंडार यानी फॉरेन रिजर्व के घटने और बढ़ने का असर करेंसी की कीमत पर दिखता है.

इसे आसान भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि अगर भारत के फॉरेन रिजर्व में डॉलर, अमेरिका के रुपयों के भंडार के बराबर होगा तो रुपए की कीमत स्थिर रहेगी. हमारे पास डॉलर घटे तो रुपया कमजोर होगा, बढ़े तो रुपया मजबूत होगा.

भारतीय करेंसी गिरने से देश की इकोनॉमी और आम लोगों को क्या कुछ फायदा भी होता है?

रुपये की कीमत गिरने से कुछ फायदे हैं, तो उससे ज्यादा नुकसान है. अब अगर फायदे की बात करें तो भारतीय बिजनेसमैन के लिए यह फायदे का सौदा है. दरअसल, इससे निर्यातकों को ज्यादा फायदा होता है.

इसके अलावा देश में घूमना सस्ता हो जाता है, इससे दुनियाभर के लोग भारत घूमने आएंगे. इससे यहां के पर्यटन को बढ़ावा मिल सकेगा. वहीं, बाहर में कमाने वाले लोग जब देश में डॉलर भेजते हैं तो उन्हें यहां ज्यादा रुपया मिलाता है. हालांकि, ये सब फायदे उतने ज्यादा नहीं हैं, जितना इससे नुकसान होता है.

भारतीय करेंसी गिरने से देश की इकोनॉमी और आम लोगों को क्या नुकसान होता है?

इसे ऐसे समझिए कि अगर रुपये में गिरावट होती है, तो भारत के लिए चीजों का इम्पोर्ट महंगा होगा. इससे विदेश से देश में आकर बिकने वाले सामानों की कीमत बढ़ जाएगी. इसके अलावा विदेश में घूमना और पढ़ना भी महंगा हो जाएगा.

मान लीजिए कि जब डॉलर के मुकाबले रुपए की वैल्यू 80 थी, तब अमेरिका से आए एक डॉलर के सामान पर भारतीय लोगों को 80 रुपए खर्च करने होते थे. अब 1 डॉलर के सामान के लिए भारतीय को 90.05 रुपए देने पड़ेंगे. इससे भारतीय छात्र जो अमेरिका पढ़ने जाते हैं, उन्हें भी ज्यादा पैसा खर्च करना होगा.

इससे अब पेट्रोलियम और सोने की कीमत भी बढ़ेगी. इतना ही नहीं देश में विदेशी निवेश भी घट सकता है. इससे महंगाई बढ़ सकती है.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब तक विदेशी निवेश देश में स्थिर नहीं हो जाता या वैश्विक परिस्थितियां सामान्य नहीं हो जातीं, तब तक मुद्रा अस्थिर बनी रहेगी.

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