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सूचना आयोगों में ऐसा क्या चल रहा है कि आपकी सुनवाई में दसियों साल तक लग सकते हैं!

इस समय 29 सूचना आयोगों में 150 सदस्यों के पदों में से 70 से ज्यादा खाली हैं वहीं केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) में प्रमुख के अलावा दो आयुक्तों की जगह भी खाली है

Representational Image (AI)
सांकेतिक तस्वीर (AI)
अपडेटेड 28 नवंबर , 2025

बात 20 बरस से भी अधिक पुरानी है. तारीख थी 11 मई, 2005. उस दिन वर्षों से की जा रही सूचना के अधिकार (RTI) की मांग देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद से पूरी हो रही थी. सूचना का अधिकार कानून संसद में पारित हुआ था. उस अवसर पर उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सदन के अंदर एक जोरदार भाषण दिया. इसमें उन्होंने इस नए कानून के फायदों को गिनाते हुए कहा, ''मुझे विश्वास है कि इस बिल के पारित होने से हमारे शासन प्रक्रियाओं में एक नई युग की शुरुआत होगी, एक ऐसा युग जिसमें प्रदर्शन और दक्षता को महत्व मिलेगा, एक ऐसा युग जिसमें विकास के लाभ हमारी जनता के सभी वर्गों तक पहुंचेंगे... एक ऐसा युग जिसमें आम आदमी की चिंताएं शासन की सभी प्रक्रियाओं के केंद्र में होंगी, एक ऐसा युग जो हमारे गणराज्य के संस्थापकों की आशाओं को साकार करेगा.''
 
इतनी पहाड़ सरीखी उम्मीदों के साथ लागू हुए RTI कानून की आज क्या हालत है? इसकी कलई खोलने का काम सतर्क नागरिक संगठन (SNS) की एक हालिया रिपोर्ट करती है. यह रिपोर्ट बताती है कि भारत की अपील सुनने वाली मशीनरी में पारदर्शिता का बड़ा संकट आ गया है. केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) समेत राज्यों के 29 सूचना आयोगों में से 18 आयोग अपीलों और शिकायतों के फैसले में एक साल से ज्यादा देरी कर रहे हैं.
 
यह जानकर हैरानी होती है कि कुछ मामलों में तो यह देरी 30 साल तक की हो गई है. 30 साल! ऐसा कैसे? दरअसल, तेलंगाना राज्य सूचना आयोग में इतने मामले लंबित पड़े हैं कि अगर जुलाई, 2025 में कोई नया अपील दायर करता है तो उसकी सुनवाई का नंबर 29 साल 2 महीने बाद आएगा. यानी 2025 की अपील का फैसला 2055 में आएगा. पिछले एक साल में छह अलग—अलग राज्यों के आयोग कभी-कभी पूरी तरह बंद ही रहे. जून 2025 तक के आंकड़े बताते हैं कि देश भर में 4.1 लाख से ज्यादा मामले लंबे समय से अटके पड़े हैं.
 
RTI कानून ने आम लोगों को यह ताकत दी थी कि वे सरकार से 30 दिनों में सूचना मांग सकें. कई ऐसे अध्ययन हुए हैं जिनसे पता चलता है कि RTI के प्रभावी क्रियान्वयन से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगने के साथ जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ी. अब जब आम लोग कल्याणकारी योजनाओं समेत अन्य विषयों पर सवाल पूछ रहे हैं तो स्पष्ट जवाब नहीं आ पाने की स्थिति में अपील की व्यवस्था उनके लिए निरर्थक हो गई है. क्योंकि वहां के निर्णय आने में इतनी देरी हो रही है कि सरकारी अधिकारी भी इस बात को लेकर निश्चिंत हैं कि उनका कुछ नहीं हो सकता.

SNS ने इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए खुद 146 RTI आवेदन दाखिल किए. ताकि आयोगों के कामकाज का पता लग सके. केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त का पद अभी खाली पड़ा है. बीते 11 सालों में सातवीं बार ऐसा हो रहा है कि CIC बगैर मुखिया के काम कर रहा है.
 
वहीं 29 सूचना आयोगों में 150 सदस्यों के पदों में से 70 से ज्यादा पद खाली हैं. CIC में प्रमुख के अलावा दो आयुक्तों के पद रिक्त हैं. महाराष्ट्र में छह पद खाली हैं. इसमें मुख्य आयुक्त का पद भी शामिल है. पिछले साल झारखंड, तेलंगाना, तमिलनाडु, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड के आयोग पूरी तरह बंद रहे.
 
इन रिक्तियों की वजह से आयोग में बैठकें ही नहीं हो पातीं. एक अपील को निपटाने में हो रही देरी की वजह से अगर संबंधित आवेदक को दूसरी अपील के लिए जाना पड़े तो उसे और देरी का सामना करना पड़ रहा है. दिल्ली के एक RTI कार्यकर्ता रवि कौशिक बताते हैं, ''मेरे कई आवेदन 2022 से लंबित पड़े है. 2025 खत्म होने वाला है लेकिन न तो सूचना मिल रही है और न ही अपील में सुनवाई हो रहा है. ऐसी स्थिति में अधिकांश लोग हार मान लेते हैं. इसका दूसरा नुकसान यह है कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है. जब अधिकारी जानते हैं कि अपील अटक जाएगी तो वे बेझिझक गलतियां करते हैं. देरी होने की स्थिति में 250 रुपये रोज का जुर्माना लगाने का प्रावधान है लेकिन आयोगों के निष्क्रियता की वजह से सिर्फ 1.2 फीसदी मामलों में जुर्माना लगा है.''

इस बीमारी पर एक पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त अपनी पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताते हैं, ''अगर यही स्थिति जारी रही तो RTI और इसके क्रियान्वयन के लिए केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों का जो ढांचा बना है वो बेमानी हो जाएगा. केंद्र सरकार को इस दिशा में प्राथमिकता के साथ दखल देना चाहिए. जिस तरह से लंबित मामलों का अंबार लगता जा रहा है, उससे तो सरकार की नीयत पर भी सवाल उठते हैं. RTI रूपी औजार अगर भोथरा होता है तो इससे कई स्तर पर नुकसान होंगे. भ्रष्टाचार रूपी दीमक तो बढ़ेगा ही लेकिन साथ ही साथ जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है. इससे आर्थिक नुकसान भी हो रहा है. आयोगों का बजट सालाना 500 करोड़ रुपये है लेकिन रिक्तियों की वजह से बैठकें नहीं होने की वजह से इस पैसे के बड़े हिस्से की बर्बादी हो रही है.''
 
इस बारे में SNS की संयोजक अंजलि भारद्वाज कहती हैं, "RTI लोगों का हथियार था लेकिन अब यह लोगों को थकाने का काम कर रहा है. हमने 146 RTI दाखिल कीं और जवाबों से पता चला कि पारदर्शिता गायब हो गई. उत्तर प्रदेश में एक महिला ने PDS भ्रष्टाचार पर RTI दाखिल की लेकिन अपील दो साल से अटकी है. ऐसी महिलाएं पहले ही सिस्टम से डरती हैं और अब वे चुप हो जाती हैं।''

सुधार की राह सुझाते हुए कौशिक कहते हैं, ''सरकारों को सिर्फ एक छोटा सा काम करना है. वह है- कानूनी प्रावधानों का पालन. डिजिटल तरीके अपनाने की जरूरत है. जैसे ई-फाइलिंग और ऑनलाइन सुनवाई. अमेरिका में जो फ्रीडम ऑफ इन्फॉर्मेशन कानून है उसमें डिजिटल ट्रैकिंग का प्रावधान किया गया है. इससे पारदर्शिता सुनिश्चित होती है. संसदीय समिति ने 2023 में कहा था कि आयोगों को स्वतंत्र बनाएं और राजनीति से दूर रखें. सरकारों को ऐसा करना चाहिए. अगर ये कदम उठाए गए तो कुछ ही वर्षों में लंबित मामले 50 फीसदी कम हो सकते हैं.''

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