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NOTA के विरोध में क्यों हैं मोहन भागवत?

RSS का मानना है कि NOTA ‘नव-उदारवादी व्यक्तिवादी’ सोच है, जिसमें लोग सामूहिकता की भावना दरकिनार कर नतीजों की परवाह किए बिना ही असहमति जताते हैं

15 जनवरी को नागपुर के स्थानीय निकाय चुनाव में वोट देने के बाद मोहन भागवत
अपडेटेड 22 जनवरी , 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत 15 जनवरी को जब नागपुर स्थानीय निकाय चुनाव के एक मतदान केंद्र से बाहर निकले और मतदाताओं को NOTA (उपरोक्त में कोई नहीं) विकल्प का इस्तेमाल न करने की सलाह दी तो यह बस एक सामान्य टिप्पणी भर नहीं थी.

भागवत संघ के इस दृढ़ विश्वास को प्रतिध्वनित कर रहे थे कि लोकतंत्र विरोध से नहीं, बल्कि भागीदारी से, अस्वीकृति से नहीं बल्कि जिम्मेदारी से फलता-फूलता है. भागवत की टिप्पणी तब और भी प्रासंगिक हो जाती है जब BJP प.बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में होने वाले चुनावों के लिए कमर कसकर तैयार हो रही है.

खासकर, बंगाल और केरल में जहां संघ और BJP की वैचारिक प्रतिष्ठा ही दांव पर है. ये चुनाव BJP अपने युवा अध्यक्ष नितिन नबीन के नेतृत्व में लड़ेगी और संघ का समर्थन इसमें खास तौर पर महत्वपूर्ण होगा.

भागवत का संकेत राजनीतिक था लेकिन इसका मतलब सीधा-सपाट है. NOTA का मतलब है कि इसका इस्तेमाल करने वाला सभी उम्मीदवारों के खिलाफ वोट कर रहा. प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र में इस तरह वोटिंग से दूरी बनाना आखिरकार उस उम्मीदवार के लिए फायदेमंद हो सकता है जो लोगों को सबसे कम पसंद होगा. लेकिन असल में यह एक खास मानसिकता का विरोध है.

RSS का मानना है कि NOTA ‘नव-उदारवादी व्यक्तिवादी’ सोच है, जिसमें लोग सामूहिकता की भावना दरकिनार कर नतीजों की परवाह किए बिना ही असहमति जताते हैं. संघ की नजर में यह रवैया नैतिकता के लिहाज से एक गहरी दरार दिखाता है- व्यक्ति का समाज से अलगाव, अधिकारों पर जोर लेकिन कर्तव्यों की अनदेखी और सामूहिक उद्देश्य की जगह सिर्फ व्यक्तिगत हानि-लाभ को प्राथमिकता देना.

संघ ने मतदान को कभी भी सुविधा से जोड़कर नहीं देखा. अपने शुरुआती वर्षों से ही संगठन मतदाता भागीदारी बढ़ाने के लिए अभियान चलाता रहा है. 1980 के दशक के 'मतदाता जागरूक अभियान' से लेकर हालिया बूथ-स्तरीय जनसंपर्क अभियानों तक, संदेश एक ही रहा- वोट देना राष्ट्र धर्म, यानी राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का पालन करने की तरह है. संघ के एक अंदरूनी सूत्र के मुताबिक, चुनावों में भागीदारी नैतिक है, इसे यांत्रिक नहीं माना जाना चाहिए. यहां तक, अक्सर आंतरिक चर्चाओं में भी कई संघ नेताओं ने चुनावी उदासीनता को सामाजिक पतन के लक्षण के तौर पर रेखांकित किया है, जिसमें नागरिक खुद को एक उपभोक्ता के तौर पर देखते हैं और बाकी समुदाय के भले-बुरे की परवाह नहीं करते.

संघ के वैचारिक डीएनए में यह बेचैनी गहराई से समाई है. दीनदयाल उपाध्याय से लेकर दत्तोपंत ठेंगड़ी तक, इसके तमाम विचारक तर्क देते रहे हैं कि व्यक्तिवाद और प्रतिस्पर्धा पर आधारित पश्चिमी लोकतंत्र, परस्पर जुड़ाव के विचार पर निर्मित भारतीय सभ्यता का आदर्श नहीं हो सकता. संघ के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, इस नजरिये से देखें तो NOTA लोकतंत्र के “नव-उदारीकरण” का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें चुनाव बाजार में पसंद-नापसंद आने वाली किसी वस्तु की तरह है और इससे दूरी बनाने को सशक्तीकरण का प्रतीक माना जाता है.

इसलिए, भागवत की टिप्पणी सिर्फ एक राजनीतिक नसीहत नहीं थी बल्कि एक दार्शनिक चेतावनी भी थी. इससे ऐसा लगता है कि उनकी नजर में NOTA का इस्तेमाल उस नैतिक आधार को ही नष्ट कर देता है जिस पर लोकतंत्र टिका है. उन्होंने महाभारत का भी हवाला दिया, यह संकेत देते हुए कि कर्तव्य के अभाव में समाज अराजकता की राह पर बढ़ सकता है.

संघ की शब्दावली में NOTA उस woke culture (नवचेतना) के बढ़ते प्रभाव का भी प्रतीक है जिसे संघ आमतौर पर सांस्कृतिक विमुखता करार देता है जो एक अलग तरह के अति-व्यक्तिवाद की एक और अभिव्यक्ति है. नव-उदारवाद जहां नागरिकों को उपभोक्ता बनाकर अर्थव्यवस्था खंडित करता है, उसी तरह woke culture समाज को असंतुष्ट समूहों में बदलकर संस्कृति को चोट पहुंचाता है. संघ का मानना है कि ये दोनों ही व्यक्तियों को उस साझा नैतिक-सामाजिक ताने-बाने से अलग-थलग कर देते हैं जो किसी समुदाय की एकता के सूत्र में बांधे रखता है.

पिछले कुछ वर्षों में भागवत और RSS woke culture के खिलाफ लगातार मुखर रहे हैं. यह असहजता व्यापक स्तर पर दिखाई देती है- विश्वविद्यालयों को लेकर उनकी राय है कि पश्चिमी पहचान के सिद्धांतों से राष्ट्रीय एकता के बजाय विभाजन को बढ़ावा मिलता है; लैंगिक विमर्श में लिंग की अस्थिर अवधारणा और अत्यधिक व्यक्तिवाद के विचार परिवार और सामाजिक सौहार्द को कमजोर करते हैं; और इतिहास लेखन के संदर्भ में उनका तर्क है कि औपनिवेशिक अपराधबोध हावी रहता है और सभ्यतागत गौरव की जगह चुनिंदा पीड़ित भाव को तरजीह दी जाती है.

भागवत ने अक्सर चेतावनी दी है कि वोकवाद, नवउदारवाद की तरह ही सामाजिक सामंजस्य पर व्यक्तिगत मुखरता को प्राथमिकता देता है और लोकतंत्र को सहभागिता के बजाय असंतोष का मंच बना देता है. इस व्यापक तर्क के लिहाज से NOTA का मतलब है कि खुद को हर व्यवस्था से अछूता घोषित करना, सुधार के प्रयास में किसी तरह की भागीदारी के बिना सिर्फ असहमति जताना.
भागवत का संदेश इसी प्रवृत्ति के खिलाफ था. उनके मुताबिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक को सर्वोत्तम उपलब्ध विकल्प चुनना चाहिए और फिर व्यवस्था को भीतर से सुधारने के लिए काम करना चाहिए. उन्होंने सुझाव दिया कि छिटककर दूर खड़े होने के बजाय सहभागिता के लिए आगे आना चाहिए.

विरोध और सहभागिता के बीच का अंतर ही लोकतंत्र पर RSS के नजरिये को समझने का केंद्रबिंदु है. पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने संगठन के मार्गदर्शक सिद्धांत यानी एकात्म मानववाद को पूंजीवादी और समाजवादी दोनों तरह के अलगाव के प्रतिकार के तौर पर विकसित किया था. उपाध्याय ने स्वायत्त व्यक्ति की पश्चिमी अवधारणा को अस्वीकार कर दिया और उसकी जगह “एकात्म मानव” की अवधारणा स्थापित की. इसमें इस पर जोर दिया गया कि मनुष्य की स्वतंत्रता कर्तव्य से संतुलित होती है और उसके अधिकार नैतिक व्यवस्था में निहित होते हैं. इस दर्शन में लोकतंत्र केवल मतों की गिनती तक सीमित एक प्रक्रिया नहीं है; यह एक नैतिक अभ्यास है जो सामूहिक हितों को ध्यान में रखकर अपने कर्तव्यों के पालन की नागरिकों की मंशा पर निर्भर करता है.

संघ पर बारीक नजर रखने वालों का मानना है कि भागवत की NOTA के खिलाफ अपील इसी दृष्टिकोण की पुष्टि है. मतदान एक सामूहिकता का अनुष्ठान बन जाता है, व्यवस्था के प्रति भरोसे की पुष्टि करता है, भले ही वह व्यवस्था त्रुटिपूर्ण हो. प्रतीकात्मक रूप से ही सही मतदान से दूर रहना उस विश्वास के दायरे को तोड़ने जैसा है.

यही वजह है कि संघ हमेशा कहीं न कहीं NOTA के खिलाफ ही रहा है. जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद चुनाव आयोग ने 2013 में नोटा का विकल्प लागू किया तो RSS के टिप्पणीकारों ने चिंता जाहिर करते हुए कहा था कि इससे मतदान से अलगाव संस्थागत रूप ले लेगा. RSS के स्वयंसेवक आम तौर पर चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी को राजनीतिक के बजाय सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़कर इसे प्रोत्साहित करते रहते हैं. मतदान को यज्ञ का रूप मानकर इसमें सामूहिक सेवा की आहूति देने को प्रेरित किया जाता है.

जाहिर है, इसमें एक राजनीतिक निहितार्थ भी है. कई राज्यों और स्थानीय चुनावों में NOTA के खाते में पड़े वोट जीत के अंतर से कहीं ज्यादा रहे, जिससे कभी-कभी BJP को अपने प्रतिद्वंद्वियों से कहीं अधिक नुकसान हुआ है. बहरहाल, भागवत के संदेश को किसी पार्टी के हितों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. उनकी चेतावनी सभ्यतागत थी. उनका मतलब यह था कि अगर लोकतंत्र व्यक्तिगत विरोध का अखाड़ा बन गया तो वह टिकाऊ नहीं रहेगा. यह एक सामूहिक प्रयास बना रहना चाहिए, चाहे वह कितना भी अपूर्ण क्यों न हो.

NOTA को लेकर RSS की चिंता आधुनिकता की सांस्कृतिक दिशा को लेकर व्यापक असहजता को भी दर्शाती है. RSS का मानना है कि राजनीति के नवउदारवादी और नवचेतना के पैरोकारों की जड़ें परस्पर जुड़ी हैं, और इसी धारणा पर आधारित हैं कि सब कुछ साझे दायित्वों के बजाय व्यक्तिगत अभिव्यक्ति में निहित है. संघ को आशंका है कि कहीं यह समुदायों को एकजुट रखने वाले मूल तत्व को ही नष्ट न कर दे. इसलिए, RSS इस भागीदारी को नैतिक रूप देना चाहता है और नागरिकों को याद दिलाना चाहता है कि विरोध के पहले कदम के तौर पर उन्हें पीछे हटने के बजाय भागीदारी के लिए आगे आना चाहिए.

अंततः, भागवत की टिप्पणी ने आत्म-अभिव्यक्ति के युग पर संघ की दीर्घकालिक चिंता को अभिव्यक्त किया है. लोकतंत्र को एक जीता-जागता नैतिक अंग मानने वाले एक आंदोलन के नजरिये से देखें तो NOTA इसके एकदम विपरीत है- जो एक शांत किस्म का शून्यवाद है जिसमें किसी तरह के पुनर्निर्माण के कर्तव्य के बिना अस्वीकारने को अधिकार माना गया है. संघ का मानना है कि भारत के लोकतंत्र को अपनी असली ताकत नागरिकों की “ना” कहने की क्षमता से नहीं, बल्कि उनकी सक्रिय भागीदारी और आंतरिक सुधार की इच्छाशक्ति से मिलती है.

भागवत ने संदेश बिना किसी राजनीतिक दिखावे के साथ दिया इसलिए गहरे राजनीतिक सार वाला था. यह याद दिलाता है कि संघ की नैतिकता की परिभाषा में लोकतंत्र विरोध से नहीं बल्कि सक्रिय भागीदारी से कायम रहता है, और कर्तव्य के बिना स्वतंत्रता या प्रतिबद्धता बिना अंतरात्मा की आवाज की बात करना निश्चित तौर पर पतन की राह पर ले जाने वाला है.

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