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रेलवे बोर्ड के एक ताकतवर सदस्य का अचानक क्यों हुआ तबादला?

नीतिगत गलतियां और विभागीय अधिकारियों के विरोध के कारण रेलवे बोर्ड के सदस्य हितेंद्र मल्होत्रा को उनके पद से हटा दिया गया है

हितेंद्र मल्होत्रा (फाइल फोटो)
हितेंद्र मल्होत्रा (फाइल फोटो)
अपडेटेड 3 फ़रवरी , 2026

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने रेलवे बोर्ड के सदस्य हितेंद्र मल्होत्रा को उनके पद से हटाने का फैसला किया है. हितेंद्र मल्होत्रा रेलवे बोर्ड में 'संचालन एवं व्यवसाय विकास' का जिम्मा संभाल रहे थे. इस पद पर रहते हुए वे पूरे रेलवे नेटवर्क में ट्रेन संचालन, आय और यात्री सुविधाओं से जुड़े अहम मामलों में फैसला लेते थे.

मल्होत्रा को अपने कार्यकाल खत्म होने से करीब एक साल पहले ही इस पद से हटा दिया गया है. वे भारतीय रेलवे विद्युत अभियंता सेवा (IRSEE) के 1987 बैच के अधिकारी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की नियुक्ति समिति (ACC) ने आदेश जारी कर उनका तबादला महानिदेशक (सुरक्षा) के पद पर कर दिया है.

मल्होत्रा के तबादले को डिमोशन ही माना जा रहा है. भारतीय रेलवे यातायात सेवा (IRTS) के 1987 बैच के अधिकारी हरि शंकर वर्मा को मल्होत्रा ​​के स्थान पर रेलवे बोर्ड का नया सदस्य नियुक्त किया गया है. रेलवे बोर्ड के सदस्य भारत सरकार के सचिव रैंक के अधिकारी होते हैं.

केंद्रीय मंत्रिमंडल और रेलवे की नियुक्ति समिति ने फेरबदल के कारणों का आधिकारिक तौर पर जिक्र नहीं किया है. सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि मल्होत्रा ​​का यह फेरबदल शायद पहले से ही तय था. इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि हितेंद्र मल्होत्रा IRSEE सेवा के पहले ऐसे अधिकारी थे, जिन्हें इस महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया गया था. इससे पहले हमेशा से ये पद सिविल सेवा के IRTS कैडर के अधिकारियों के लिए आरक्षित रहा है.

विद्युत अभियांत्रिकी सेवा से होने के कारण मल्होत्रा ​​को यातायात अधिकारी के रूप में काम करने के लिए न तो प्रशिक्षित और न ही अनुभवी माना गया. उनकी नियुक्ति रेलवे की उस नियम के जरिए हुई थी, जिसे अब खत्म कर दिया गया है. इसके तहत रेलवे के सभी शीर्ष पदों को आठों विशेष सेवाओं के लिए खोल दिया गया था. इन शीर्ष पदों पर नियुक्ति के लिए सिविल सेवक या किसी खास कैडर से होना जरूरी नहीं था.

इस नियम को लागू होने के बाद ही रेलवे के सिविल सेवा अधिकारियों ने जमकर विरोध शुरू कर दिया था, जिसके बाद सरकार को नियम दोबारा से बदलने को मजबूर होना पड़ा था. पिछले एक साल से IRTS अधिकारी संघ, कैबिनेट सचिव के साथ-साथ उच्च अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर बातचीत कर रहे थे. इनकी ये मांग थी कि नए नियम के मुताबिक, रेलवे बोर्ड के यातायात कैडर में सदस्य (संचालन और व्यवसाय विकास) के पद को सिविल सेवा से आने वाले IRTS अधिकारियों के लिए बहाल किया जाए.

आखिरकार सरकार ने बाद में अपनी गलती मान ली. सूत्रों की मानें तो मल्होत्रा ​​के बाद 2027 में एक यातायात अधिकारी को उनकी जगह नियुक्त किया जाना था. हालांकि, मल्होत्रा ने कई ऐसी गलतियां की, जो सत्ता में बैठे लोगों को रास नहीं आईं. यही वजह है कि समय से पहले उनका तबादला हो गया.

रेलवे से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, सबसे हालिया वजह रेलवे में थोक सीमेंट की ढुलाई के तरीके में सुधार से जुड़ी है. पिछले कुछ सालों से देश भर में थोक सीमेंट के परिवहन का कारोबार सड़क क्षेत्र के जरिए हो रहा है. इसकी प्रमुख वजह  रेल माल ढुलाई की बढ़ती दरें हैं.

वित्त वर्ष 2025 में रेलवे ने 8.7 करोड़ टन (MT) सीमेंट की ढुलाई की, जिसमें 8 करोड़ टन बोरीबंद सीमेंट और 70 लाख टन थोक सीमेंट शामिल है. यह मात्रा वार्षिक सीमेंट परिवहन का केवल लगभग 17 फीसद है, जिसमें सड़क परिवहनकर्ताओं का वर्चस्व है.

वित्त वर्ष 2025 में भारत का कुल सीमेंट उत्पादन लगभग 450 मीट्रिक टन था, जिसमें थोक सीमेंट की हिस्सेदारी 17-20 फीसद थी. रेलवे ने थोक सीमेंट की कुल मात्रा का केवल 10 फीसद ही ढुलाई की थी.

रेलवे के टॉप मैनेजमेंट का उद्देश्य सड़क परिवहन क्षेत्र पर बढ़त हासिल करने और कारोबार में फिर से अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए थोक सीमेंट परिवहन की कीमतों को उचित बनाना था. ताकि, लंबी दूरी पर मालगाड़ियों से ढुलाई तेज और सस्ती होने के साथ-साथ पर्यावरण के अनुकूल भी हों.

पिछले साल नवंबर में सरकार ने थोक सीमेंट परिवहन व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए एक नई नीति शुरू की. इसके लिए पहले के कड़े और उलझे नियमों को खत्म कर 0.90 रुपये प्रति टन-किमी की एक समान माल ढुलाई दर लागू की गई. इसमें दरें दूरी के हिसाब से बदलती रहती हैं. इसका उद्देश्य अगले पांच वर्षों में रेल द्वारा थोक सीमेंट परिवहन में हिस्सेदारी को 30 फीसद तक बढ़ाना है. हालांकि, यह फैसला इसके लिए काफी नहीं है.

सूत्रों ने बताया कि अतिरिक्त शुल्कों को शामिल करने के बावजूद, प्रभावी परिवहन दरें सीमेंट इंडस्ट्री के उम्मीद मुताबिक कम नहीं हुई है. उद्योग जगत के जानकारों ने इंडिया टुडे को बताया कि वे रेल भवन (रेलवे मुख्यालय) के उच्च अधिकारियों को लगातार यह बताते रहे कि नई दरें सीमेंट परिवहन व्यवसाय को आकर्षित करने के अपने उद्देश्य को पूरा नहीं कर रही हैं. हालांकि, इसके बावजूद सरकार की रेलवे सुधारों के प्रतीक के रूप में इस नीति को बड़े धूमधाम से जारी किया जा चुका था.

सूत्रों का कहना है कि इसकी जानकारी सरकार तक पहुंची, तो इससे सत्ताधारियों में नाराजगी बढ़ गई. मौजूदा व्यवस्था में रेलवे के शीर्ष अधिकारियों को इससे कहीं कम गलतियों के लिए भी अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी है. इसलिए दिसंबर में नई नीति लागू होने के कुछ ही दिनों बाद ही रेलवे को नियमों में दोबारा से बदलाव करना पड़ा.  

1 जनवरी से लागू नए नियम के मुताबिक कुछ एक मामलों को छोड़कर सीमेंट ढुलाई दर को घटाकर 0.85 रुपये प्रति टन-किमी कर दिया गया है. सीमेंट जैसी थोक वस्तुओं के लिए, 500-1000 किमी की लंबी दूरी की ढुलाई में 0.05 रुपये प्रति टन-किमी की कमी भी काफी बड़ी बात होती है. इससे इंडस्ट्री को माल ढुलाई पर अच्छी बचत होती है और सड़क परिवहन के मुकाबले रेल सीमेंट ढुलाई के लिए बेहतर माध्यम बन जाता है. इसके अलावा, खाली रेकों पर पहले के 50 फीसद के मुकाबले अब 80 फीसद की ज्यादा छूट दी जा रही है.

सूत्रों के मुताबिक, इस मामले को हल करने में हितेंद्र मल्होत्रा ​​की व्यवहार कुशलता में भी काफी सुधार की गुंजाइश थी. खासकर रेलवे के लिए महत्वपूर्ण कारोबार लाने वाले उद्योगपतियों से डील करने के मामले में वे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे. हालांकि, वे ऐसा नहीं कर पाए. अधिकारियों का यह भी कहना है कि रेलवे बोर्ड के सदस्य (संचालन और व्यवसाय विकास) का पद IRTS के लिए दोबारा बहाल करने का दबाव सिविल सर्विस अधिकारी लगातार बना रहे थे. इसका भी असर उनके तबादले में देखने को मिला है.  

उनका तर्क रहा है कि जब नियमों में संशोधन के बाद इस पद पर IRTS को बहाल किया जाना है, तो ऐसा क्यों नहीं हो रहा है? इसके अलावा वे यह भी कह रहे थे कि रेलवे में वित्त से जुड़े पदों पर केवल भारतीय रेलवे लेखा सेवा और मानव संसाधन के लिए भारतीय रेलवे कार्मिक सेवा के अधिकारियों की ही नियुक्ति होनी चाहिए.  

नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल से पहले रेलवे बोर्ड के सदस्यों को समय से पहले कभी उनके पद से नहीं हटाया गया था. हालांकि, मोदी सरकार के कार्यकाल में भी ऐसा कभी-कभी ही सुनने को मिला. पिछले 10 वर्षों में सचिव स्तर के इन अधिकारियों पर एक से अधिक बार गाज गिरी है.

इससे पहले 2017 में उत्तर प्रदेश के खतौली में कलिंग उत्कल एक्सप्रेस के पटरी से उतरने की घटना पर हुए हंगामे के बाद तत्कालीन रेलवे बोर्ड अध्यक्ष को हटा दिया गया था. इस दुर्घटना में 23 लोगों की मौत हो गई थी. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के कार्यकाल में 2021 से रेलवे बोर्ड के सदस्यों को बदला गया था. इसके अलावा, एक वरीय रेलवे अधिकारी को कथित तौर पर जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया था.

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