भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है और इस लिहाज से सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को इस लोकतंत्र का इंजन कहा जाना चाहिए. लेकिन इसी प्रदेश में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी विधानसभा की कार्यवाही देखें तो पहली नजर में ही लग जाता है कि इसकी हालत काफी खराब है.
देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य की विधानसभा 2013 के बाद एक भी साल 30 बैठकों का आंकड़ा नहीं छू सकी है. 2002 से 2013 के बीच भी केवल पांच साल ऐसे रहे, जब विधानसभा 30 या उससे अधिक दिन बैठी. 14वीं विधानसभा के कार्यकाल में जहां कुल 147 बैठकें हुईं, वहीं इसके बाद के कार्यकालों में यह संख्या लगातार गिरती चली गई. 17वीं विधानसभा में पांच वर्षों में कुल 102 बैठकें हुईं और मौजूदा 18वीं विधानसभा में 2025 के अंत तक यह आंकड़ा सिर्फ 67 तक पहुंचा है.
यहां हमने 30 के आंकड़े की बात इसलिए की क्योंकि लखनऊ में 21 जनवरी को संपन्न 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में अब यह सहमति बनी है किराज्य विधानमंडलों की बैठकें साल में कम से कम 30 दिन होनी चाहिए. यह महज एक प्रशासनिक सुझाव नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चिंता का संकेत है. यह चिंता अचानक पैदा नहीं हुई है. इसके पीछे वर्षों से घटती विधायी बैठकों का अनुभव, कमजोर होती बहसें और बढ़ती कार्यपालिका की ताकत है.
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सम्मेलन के बाद साफ शब्दों में कहा कि सभी राज्यों ने कम से कम 30 बैठकें करने की कोशिश पर सहमति जताई है. हालांकि यह बाध्यकारी नहीं होगा, लेकिन इसका नैतिक और राजनीतिक संदेश स्पष्ट है. जब विधानसभाएं कम बैठती हैं, तो सरकारें अध्यादेशों, नियमों और कार्यपालिका के आदेशों के जरिए फैसले लेने लगती हैं. यही वह पृष्ठभूमि है, जिसने इस सम्मेलन में न्यूनतम बैठकों की सीमा तय करने की जरूरत को जन्म दिया.
उत्तर प्रदेश का उदाहरण इस चिंता को सबसे साफ तरीके से सामने रखता है. यहां विधानमंडल की बैठकों में गिरावट केवल संख्या की कहानी नहीं है, बल्कि इसके असर गहरे हैं. संविधान के अनुच्छेद 174 में साफ लिखा है कि दो सत्रों के बीच छह महीने से ज्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए. यूपी विधानसभा के नियमों में ‘आमतौर पर’ साल में 90 बैठकें और तीन सत्रों का प्रावधान है. यहां तक कि यह भी कहा गया है कि जहां तक संभव हो, हर दो महीने में कम से कम 10 कार्यदिवसों का सत्र हो. लेकिन व्यवहार में विधानसभा अक्सर साल में तीन छोटे सत्रों तक सीमित रह जाती है. नतीजा यह कि विधायकों को सवाल उठाने, विधेयकों पर चर्चा करने और सरकार की जवाबदेही तय करने का समय ही नहीं मिल पाता.
सम्मेलन के पहले दिन खुद ओम बिरला, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडे ने सत्रों के छोटे होने पर चिंता जताई. यह दुर्लभ था कि सत्ता और विपक्ष के साथ संवैधानिक पदों पर बैठे लोग एक सुर में यह कह रहे थे कि विधानमंडल को अधिक समय तक बैठना चाहिए. यूपी विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना द्वारा पेश प्रस्ताव इसी चिंता का औपचारिक रूप था, जिसे सम्मेलन ने अपनाया. यूपी विधानसभा के एक सेवानिवृत्त प्रमुख सचिव मानते हैं कि बैठकों की घटती संख्या सीधे तौर पर लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करती है. उनके शब्दों में, “जब सदन कम दिन बैठता है, तो सरकार के पास एजेंडा तय करने और उसे बिना पर्याप्त बहस के पास कराने की ज्यादा गुंजाइश होती है. विधायकों की भूमिका धीरे-धीरे प्रतीकात्मक बन जाती है.” पूर्व प्रमुख सचिव के अनुसार, यूपी जैसे बड़े राज्य में यदि हर साल कम से कम 30 बैठकें हों, तो पांच साल में 150 से ज्यादा दिन बहस, निगरानी और जवाबदेही के लिए उपलब्ध होंगे.
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि कम बैठकों का असर केवल विपक्ष तक सीमित नहीं रहता. सत्ता पक्ष के कई विधायक भी निजी बातचीत में स्वीकार करते हैं कि उन्हें अपने क्षेत्र की समस्याएं उठाने का पर्याप्त मौका नहीं मिलता. संसदीय कार्यों पर नजर रखने वाली संस्था “पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च” के एक वरिष्ठ शोधकर्ता के अनुसार, “भारत के कई राज्यों में विधानसभा सत्र औसतन 20-25 दिन तक सिमट गए हैं. यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के भरोसे को कमजोर करती है, क्योंकि लोगों को लगता है कि फैसले बंद कमरों में हो रहे हैं.”
राजनीतिक विशलेषक और लखनऊ में शिया कालेज के शिक्षक अमित राय बताते हैं, “उत्तर प्रदेश में यह समस्या और गंभीर इसलिए है क्योंकि राज्य का आकार और विविधता विधायी कामकाज की ज्यादा मांग करती है. शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था, ग्रामीण विकास और शहरीकरण जैसे मुद्दों पर विस्तृत बहस के बिना नीतियां बनती हैं. जब सत्र छोटे होते हैं, तो विधेयकों को प्रवर समितियों के पास भेजने की परंपरा भी कमजोर पड़ती है. कई बार अहम कानून जल्दबाजी में पास कर दिए जाते हैं, जिनके दूरगामी असर बाद में सामने आते हैं.”
हालांकि सवाल यह भी है कि क्या केवल न्यूनतम संख्या तय कर देने से समस्या हल हो जाएगी. संवैधानिक विशेषज्ञ अंशुमान द्विवेदी का कहना है, “बैठकों की संख्या जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है बैठकों का उपयोग. अगर 30 दिन भी केवल औपचारिकता में निकल जाएं, तो इसका कोई लाभ नहीं होगा.” उनके अनुसार, इसके साथ-साथ समितियों को मजबूत करना, प्रश्नकाल को बाधित न होने देना और विधेयकों पर पर्याप्त समय देना भी उतना ही जरूरी है.
उपायों की बात करें तो विशेषज्ञ तीन स्तरों पर सुधार की जरूरत बताते हैं. पहला, राजनीतिक सहमति. सम्मेलन में यही संदेश दिया गया कि बिना दलों की सहमति के सत्रों की अवधि बढ़ाना मुश्किल है. दूसरा, कैलेंडर आधारित सत्र प्रणाली, जिसमें साल की शुरुआत में ही सत्रों की तारीखें तय हों. इससे सरकार और विपक्ष दोनों तैयारी कर सकें. तीसरा, जनदबाव. नागरिक समाज और मीडिया की भूमिका अहम है, ताकि कम बैठकों को सामान्य मान लेने की प्रवृत्ति पर सवाल उठे. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सम्मेलन में दिया गया बयान इस दिशा में सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. उन्होंने कहा कि राज्य विधानमंडल के सत्र साल में कम से कम 30 दिन चलने चाहिए और सरकार पूरा सहयोग देगी. अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि यह सहमति कागज से निकलकर जमीन पर उतरती है या नहीं.
आखिरकार 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में उठी यह मांग भारतीय लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी की तरह है. उत्तर प्रदेश का उदाहरण बताता है कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो विधानसभाएं धीरे-धीरे औपचारिक मंच बनकर रह जाएंगी.
न्यूनतम 30 बैठकों की सीमा कोई जादुई समाधान नहीं है, लेकिन यह एक जरूरी शुरुआत जरूर है. यह शुरुआत इस समझ से जुड़ी है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से नहीं, बल्कि नियमित, गंभीर और जवाबदेह विधायी कामकाज से जीवित रहता है.

