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कल्याण नहीं, अधिकार: भारत को अब एक समान राष्ट्रीय दिव्यांग पेंशन दर अपनानी ही होगी

भारत में आज दिव्यांग आबादी 4.5 से 5 करोड़ के बीच है और इसमें से महज 40-45 फीसदी पात्र व्यक्तियों को ही दिव्यांग पेंशन मिलती है

Bihar government to provide Rs 1 lakh financial aid to Divyang UPSC aspirants clearing prelims
भारत दिव्यांग पेंशन पर जीडीपी का मात्र 0.02 प्रतिशत खर्च करता है
अपडेटेड 17 फ़रवरी , 2026

भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसके कल्याणकारी राज्य की असली परीक्षा हो रही है. आयुष्मान भारत, जैम (जनधन, आधार और मोबाइल), डीबीटी, यूपीआइ, पीएम-किसान और डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे क्रांतिकारी सुधारों के बावजूद, दिव्यांग नागरिक अब भी सामाजिक सुरक्षा के चौखटे के बाहर खड़े हैं. हमने दुनिया का सबसे बड़ा पहचान-आधारित लाभ वितरण तंत्र खड़ा कर दिया, लेकिन राष्ट्र के सबसे कमजोर नागरिक अब भी राज्य की इच्छाशक्ति, राज्य-वार बजट और भौगोलिक संयोग पर निर्भर हैं. भारत की पेंशन व्यवस्था का आज का सबसे क्रूर विरोधाभास यही है—एक दिव्यांग नागरिक की जीविका और सम्मान का आधार उसकी दिव्यांगता नहीं बल्कि वह राज्य है जहां वह पैदा हुआ या रहता है.

2011 की जनगणना में 2.68 करोड़ दिव्यांग नागरिकों की पहचान हुई थी. पिछले दस वर्षों में जनसंख्या वृद्धि, जीवन प्रत्याशा, गैर-संचारी रोगों, स्ट्रोक और कोविड के बाद की अक्षमता की संख्या देखकर विशेषज्ञ मानते हैं कि आज यह संख्या कम से कम 4.5–5 करोड़ के बीच है. इसके बावजूद, भारत में केवल 40–45 प्रतिशत पात्र व्यक्तियों को ही दिव्यांग पेंशन मिलती है. कई राज्यों में दिव्यांगों को इस लाभ से वंचित करने का प्रतिशत 60 से भी ऊपर है. और उससे भी अधिक गंभीर है यह तथ्य कि पेंशन राशि राज्य-दर-राज्य असमान रूप से बदलती है—कुछ राज्यों में पेंशन 300–500 रुपए तक ही है, जबकि कुछ जगहों पर 3,000 रुपए तक. यह राशि दवा, देखभाल, परिवहन और जीने के न्यूनतम खर्च से भी कम है.

भारत दिव्यांग पेंशन पर जीडीपी का मात्र 0.02 प्रतिशत खर्च करता है. दक्षिण अफ्रीका 0.4 प्रतिशत, ब्राज़ील 0.6 प्रतिशत, ओईसीडी (ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन ऐंड डेवेलपमेंट) देश औसतन 0.8 प्रतिशत और ऑस्ट्रेलिया 1.2 प्रतिशत खर्च करते हैं. विश्व बैंक का अनुमान है कि दिव्यांग व्यक्तियों को श्रम-बाज़ार और सामाजिक सुरक्षा से बाहर रखने से निम्न-आय वाले देशों को जीडीपी का लगभग 7 प्रतिशत नुक्सान होता है. इसलिए प्रश्न यह नहीं कि भारत एक समान राष्ट्रीय पेंशन दर वहन कर सकता है या नहीं, सवाल यह है कि क्या भारत इस तरह उन्हें नजरअंदाज करने की कीमत वहन कर सकता है?

इसलिए अब समय आ गया है कि भारत एक मिनिमन य‌ूनिफॉर्म डिसएबिलिटी पेंशन फ्लोर रेट
(एमयूडीपीएफआर) को अपनाए. यह कोई नई योजना नहीं है बल्कि भारत की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का सबसे आवश्यक पुनर्गठन है. यह संविधान के अनुच्छेद 41 की भावना तथा दिव्यांग अधिकार अधिनियम, 2016 की गारंटी—“गरिमा, सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण”—को व्यावहारिक रूप देता है.

दुनियाभर का अनुभव बताता है कि बड़े संघीय लोकतंत्रों में विकेन्द्रीकृत पेंशन व्यवस्था कभी सफल नहीं होती. दक्षिण अफ्रीका में एसएएसएसए, ब्राज़ील में बीपीसी, न्यूज़ीलैंड में वर्क ऐंड इनकम एनजेड और ऑस्ट्रेलिया में एनडीआइए, ये सभी राष्ट्रीय स्तर पर एक समान पेंशन लागू करते हैं. केन्या, रवांडा, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे विकासशील देशों में भी दिव्यांग पेंशन केंद्र सरकार के नियंत्रण में है. राज्य-वार पेंशन ढांचे केवल असमानता और बहिष्करण पैदा करते हैं.

और यह सुधार वित्तीय रूप से पूरी तरह सम्भव है. 6,000–10,000 रुपए की पेंशन और 15,000 रुपए उच्च-आश्रित श्रेणी के लिए, सबसे बड़े परिदृश्य में भी जीडीपी का 0.2 प्रतिशत से कम खर्च होगा. 40 लाख नागरिकों के लिए प्रति माह 8,000 रुपए देने पर वार्षिक खर्च 38,400 रुपए करोड़ होता है और 65 लाख नागरिकों के लिए प्रति माह 10,000 रुपए देने पर भी यह जीडीपी का केवल 0.16 प्रतिशत रहता है. यह सामाजिक सुरक्षा बोझ नहीं बल्कि सामाजिक-आर्थिक निवेश है. शोध अध्ययन बताता है कि दिव्यांग पेंशन ग्रामीण मांग बढ़ाती है, स्वास्थ्य सुधारती है, गरीबी का दुष्चक्र तोड़ती है, महिला श्रम सहभागिता बढ़ाती है और परिवार को स्थिरता देती है.

लेकिन एमयूडईपीएफआर केवल बजट का प्रश्न नहीं है. यह प्रशासनिक संरचना का भी प्रश्न है. आज दिव्यांग पेंशन केंद्र और राज्यों में बंटी हुई है, जिससे जवाबदेही, समयबद्धता और मानकीकरण का अभाव है. जैसे ऑस्ट्रेलिया में एनडीआइए, दक्षिण अफ्रीका में एसएसएसए, ब्राज़ील में आइएनएसएस और आयरलैंड में डिपार्टमेंट ऑफ सोशल प्रोटेक्शन है—भारत को एक राष्ट्रीय संस्था एनडीपीए (नेशनल डिसएबिलिटी पेंशन ऑथरिटी) स्थापित करनी चाहिए जो पेंशन, प्रमाणन, रजिस्ट्री, भुगतान, पोर्टेबिलिटी और शिकायत निवारण का एक ही स्तंभ बने.

डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर पहले से मौजूद है—आधार, डीबीटी, आयुष्मान भारत, जैम, यूडीआइडी और नेशनल सोशल रचिस्टर. बस इन्हें एकीकृत करने की राजनैतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है. भारत ने जनधन से लेकर पीएम-किसान, यूपीआइ से लेकर मनरेगा तक दिखाया है कि वह लाखों-करोड़ों नागरिकों को प्रत्यक्ष लाभ देने में सक्षम है. अब इसी क्षमता को दिव्यांग नागरिकों के लिए राष्ट्रीय पेंशन फर्श गारंटी में बदलना है.

यह न केवल आर्थिक तर्क का मामला है, यह नैतिक और संवैधानिक प्रश्न भी है. अनुच्छेद 14 समानता की गारंटी देता है, अनुच्छेद 21 जीवन और गरिमा की. संविधान ने कभी भी गरिमा का मानक राज्य-वार तय नहीं किया. अगर भोजन का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, वृद्धावस्था पेंशन और नकद हस्तांतरण राष्ट्रीय स्तर पर सुनिश्चित किया जा सकता है, तो दिव्यांग नागरिकों को इससे बाहर क्यों रखा जाए?

भारत ने अपने कल्याणकारी राज्य के स्तंभ तो खड़े कर दिए हैं. अब उसकी नींव डालने का समय है. एक समान राष्ट्रीय दिव्यांग पेंशन फ्लोर तय करेगा कि भारत का लोकतंत्र केवल बहुमत का राज नहीं बल्कि सबसे कमजोर नागरिक की सुरक्षा पर आधारित है. यह सुधार केवल पेंशन नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण होगा. अवहेलना और असमानता की कीमत बहुत ज्यादा है. अब प्रतीक्षा की गुंजाइश समाप्त हो चुकी है. अगर भारत यह कदम उठाता है तो वह वैश्विक सामाजिक संरक्षण मानकों के अनुरूप खड़ा होगा. अगर नहीं, तो हम अपने ही नागरिकों को भौगोलिक आकस्मिकता के नाम पर दोयम दर्जे पर छोड़ते रहेंगे.

प्रश्न यह नहीं कि हम यह व्यवस्था बना सकते हैं या नहीं. प्रश्न यह है कि क्या हम यह स्वीकार करने को तैयार हैं कि लोकतंत्र तभी पूरा होता है जब वह अपने सबसे कमजोर नागरिक को सुरक्षा, सम्मान और जीवित रहने का अधिकार देता है. एमयूडीपीएफआर इसी परिवर्तन की पहली ईंट है. अब निर्णय देश को लेना है—क्या हम दिव्यांग नागरिक को “कृपा-भाव” से देखेंगे, या उसे भारतीय नागरिकता और मानव गरिमा के केंद्रीय अधिकार के रूप में स्वीकार करेंगे?

(सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सुशील कुमार रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं और केंद्र सरकार में सचिव रह चुके हैं)

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