'वन नेशन वन इलेक्शन' के लिए पेश किए गए संविधान के 129वें संशोधन विधेयक पर अभी संसद की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) विचार कर रही है. 11 मार्च को जेपीसी के सामने तीन घंटे की बहस में, भारत के पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने अपने बयान में देशभर में एक साथ चुनाव कराए जाने की संवैधानिकता का समर्थन के साथ कुछ शर्तें भी रखीं.
राज्यसभा सांसद गोगोई जेपीसी के सामने एक संवैधानिक विशेषज्ञ की हैसियत से बोल रहे थे. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय और राज्य के चुनावों को एक साथ कराना लोगों के वोट देने के मूल अधिकार के लिहाज से भी अच्छा होगा. पूर्व सीजेआई के मुताबिक, यह लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनने के बजाय बस चुनावों की अवधि तय करने वाला कदम है जो हर पांच साल में एक बार होगा.
रंजन गोगोई ने इस दौरान यह भी कहा कि देशभर में एक साथ चुनाव कराए जाने से लोकतंत्र मजबूत होगा क्योंकि सरकारें हमेशा चुनाव प्रचार में फंसे रहने के बजाय सरकार चलाने पर ध्यान दे सकेंगी. गोगोई ने कहा, "इलेक्शन खत्म हो जाए, तो सरकार अपने टर्म का बाकी टाइम गवर्नेंस में लगा सकती है." उनका मानना है कि इससे प्रशासनिक क्षमता में भी सुधार होगा.
गोगोई ने इसे "भारत के पुराने चुनावी तंत्र की वापसी" कहा जो 1952 से 1967 तक था, बस मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था की मांग के हिसाब से इसमें थोड़े फेरबदल होंगे. उनका कहना है कि ये कोई नया आइडिया नहीं, बल्कि पुरानी चीज का नया वर्जन है.
रंजन गोगोई ने दो बड़े मुद्दों पर भी अपनी राय दी जिसमें पहला तो था संघीय व्यवस्था या फेडरलिज़्म पर असर और दूसरा संविधान के मूल ढांचे का मुद्दा. फेडरलिज़्म पर उन्होंने कहा कि एक साथ चुनाव कराए जाने से संविधान के मूल ढांचे को कोई खतरा नहीं, जैसा विपक्षी पार्टियां आरोप लगा रही हैं. गोगोई के मुताबिक चुनावों के एक समय पर होने का राजनीतिक शक्ति के केंद्रीकरण से कोई लेना-देना नहीं है.
बेसिक स्ट्रक्चर पर गोगोई का कहना था कि ये केशवानंद भारती केस के सिद्धांत को नहीं छेड़ेगा. दरअसल 1973 में केशवानंद भारती मामले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर या मूलभूत ढांचे का सिद्धांत दिया था और कहा था कि संविधान में सबकुछ संशोधित हो सकता है मगर इसका मूल ढांचा नहीं. जेपीसी में मौजूद सूत्रों के मुताबिक गोगोई ने जेपीसी के सामने पूछा, "बेसिक स्ट्रक्चर को कहां तक खींचोगे? वोट डालना बेसिक स्ट्रक्चर है? इलेक्शन लड़ना बेसिक स्ट्रक्चर है?" उनके मुताबिक, संविधान का जो हिस्सा बदला नहीं जा सकता, उसमें चुनाव के तरीके शामिल नहीं हैं बल्कि बड़े लोकतांत्रिक सिद्धांतों की बात है.
हालांकि पूर्व सीजेआई ने विधेयक में एक दिक्कत का भी जिक्र किया - चुनाव आयोग को दी गई ढेर सारी विवेकाधीन शक्तियां. नए विधेयक में प्रस्तावित अनुच्छेद 82A(5) में चुनाव आयोग को अधिकार है कि अगर उसे लगे कि संयुक्त चुनाव मुमकिन नहीं, तो वो राष्ट्रपति को राज्य के चुनाव अलग से करवाने की सलाह दे सकता है. विपक्ष का इसपर कहना था कि यह प्रावधान चुनाव आयोग को 'मनमानी और अनियंत्रित' शक्तियां प्रदान करता है. डीएमके सांसद पी. विल्सन बोले कि इसमें टाइमफ्रेम नहीं है कि चुनाव आयोग कब तक स्टेट इलेक्शन्स कराएगा, जिससे चुनाव अनिश्चित समय के लिए टल सकता है. रंजन गोगोई ने माना कि ये सेक्शन "लीगली टेनेबल नहीं" यानी कानूनी रूप से तर्कसंगत नहीं है और इसे ठीक करना पड़ेगा.
उन्होंने ये भी सुझाया कि अगर सरकार बीच में गिर जाए, तो "अविश्वास प्रस्ताव के साथ काउंटर-कॉन्फिडेंस मोशन भी लाना चाहिए' ताकि स्थायित्व बना रहे. यह जर्मनी के 'कंस्ट्रक्टिव वोट ऑफ नो कॉन्फिडेंस' जैसा है, जिससे शासन व्यवस्था में अंतराल न आए और देशभर में एक साथ चुनाव की टाइमलाइन चलती रहे.
जेपीसी में कुछ लोगों ने कहा कि अगर सरकार गिर जाए, तो 'विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी को खुद-ब-खुद सत्ता मिलनी चाहिए' ताकि काम चलता रहे. यह चर्चा संसदीय प्रणाली में चुनावी टाइमलाइन बनाए रखने के लिए जरूरी बदलावों पर प्रकाश डालती है, जहां निर्धारित चुनावों के बीच भी सरकारें गिर सकती हैं.
गोगोई से पहले पूर्व सीजेआई यू.यू. ललित ने विधेयक की कानूनी व्यवहारिकता पर सवाल उठाए थे. इससे दोनों पूर्व चीफ जस्टिस के बीच विचार का फर्क साफ दिखता है. गोगोई पहले भी 'वन नेशन वन इलेक्शन' के समर्थन में बोल चुके हैं. रामनाथ कोविंद समिति की रिपोर्ट में उन्होंने 'कम खर्च, प्रशासनिक सहूलियत, ज्यादा से ज्यादा वोटरों को जोड़ना और बाहुबल-धनबल के असर में कमी' जैसे फायदे बताए थे.
जेपीसी की बहस चल रही है, और चेयरमैन पी.पी. चौधरी ने एक वेबसाइट लॉन्च करने की बात कही, जहां लोग इस विधेयक पर अपनी राय दे सकेंगे. दरअसल कोविंद समिति ने दावा किया था कि लोगों से मिली 80 प्रतिशत प्रतिक्रियाएं देश में एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में थीं. विपक्ष ने इसपर सवाल उठाए और उसी के जवाब में इस वेबसाइट को लॉन्च करने की बात की गई.
सरकार के मौजूदा प्रस्ताव में 2029 से चुनावों के समन्वय की बात की गई है, जिसमें 2034 में पहला पूर्ण रूप से समन्वित राष्ट्रीय और राज्य चुनाव होंगे.
गोगोई इस व्यवस्था के बारीक संवैधानिक मूल्यांकन के हिमायती हैं. उन्होंने इसे न पूरी तरह स्वीकार किया है, न ही नकारा है. उनका कहना है कि यह संविधान के हिसाब से सही है लेकिन इसके साथ ही वे चुनाव आयोग के विवेकाधीन फैसले लेने के अधिकारों से जुड़े प्रावधानों पर सवाल भी उठाते हैं.
पूर्व सीजेआई का यह संतुलित नजरिया संविधान के एक-दूसरे पर हावी होने वाले संवैधानिक मूल्यों के बीच खींचतान को दर्शाता है. जिनमें एक ओर प्रशासनिक दक्षता और सरकार की स्थिरता हैं तो दूसरी ओर संघवाद और केंद्रीकृत शक्ति पर नियंत्रण है. इस रस्साकशी को दूर करने में, गोगोई बड़े ध्यान से संवैधानिक संतुलन का उदाहरण देते हैं, जिसकी जरूरत भारत को अपने लोकतांत्रिक आधार को कमज़ोर किए बिना इस महत्वपूर्ण चुनावी सुधार को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए होगी.
जेपीसी में अभी विचार-विमर्श जारी है और इस दौरान गोगोई का बयान न्यायिक दृष्टिकोण की पुष्टि और चेतावनी दोनों के रूप में काम करता है. यह एक साथ चुनाव को संवैधानिक रूप से सैद्धांतिक रूप से स्वीकार्य मानता है, जबकि व्यवहार में उचित सुरक्षा उपायों पर जोर देता है. अंतिम कानून में ऐसी सुरक्षा उपाय शामिल होंगे या नहीं, यह देखना अभी बाकी है.

