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ब्लिंकिट, स्विगी जैसी कंपनियों के '10 मिनट' की डिलीवरी खत्म होने से ग्राहकों पर क्या असर पड़ा?

'10 मिनट' का वादा काफी हद तक सिर्फ एक ब्रांडिंग रणनीति थी और अक्सर ऑर्डर पहुंचने में इससे कहीं ज्यादा समय लगता था. यही कारण है कि 10 मिनट की डिलीवरी खत्म होने से उपभोक्ताओं पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 20 जनवरी , 2026

ब्लिंकइट, स्विगी और ज़ेप्टो सहित सभी प्रमुख क्विक-कॉमर्स कंपनियां अब '10 मिनट में डिलीवरी' का वादा नहीं करेगी. इन कंपनियों के सीनियर अधिकारियों ने केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया के साथ हुई बैठक के बाद ये फैसला लिया है.

डिलीवरी बॉय के खतरा को देखते हुए, केंद्रीय मंत्री मांडविया ने क्विक कॉमर्स कंपनियों से उनके हित में ऐसा फैसला लेने के लिए आग्रह किया था. सरकार और कंपनियों के बीच यह बैठक गिग वर्कर्स के बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के बीच हुई थी. 

सरकार के हस्तक्षेप से निश्चित तौर पर इन गिग वर्कर्स (डिलीवरी बॉय) को राहत मिली है, लेकिन सवाल ये भी उठता है कि कंपनियों के इस फैसले से ग्राहकों पर क्या और कितना असर पड़ा है? 

इस क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना ​​है कि इस बदलाव से जमीनी हकीकत में कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि 10 मिनट में डिलीवरी का वादा सिर्फ एक ब्रांडिंग रणनीति थी. वैसे भी ऑर्डर पहुंचने में अक्सर 15-20 मिनट लग जाते थे. हालांकि, इस फैसले से इन कंपनियों को अपने ऑपरेटिंग मॉडल पर दोबारा से विचार करने की जरूरत है. 

कंपनी को डिलीवरी की गति और श्रमिकों की सुरक्षा दोनों का ध्यान रखकर आगे की प्लानिंग करना होगा. इस तरह ही संतुलन बनाकर कंपनियां अब आगे का बिजनेस मॉडल तैयार करेगी.

मैनेजमेंट कंसल्टिंग फर्म द नॉलेज कंपनी (पूर्व में टेक्नोपैक एडवाइजर्स) के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर अरविंद सिंघल कहते हैं, "10 मिनट में डिलीवरी का वादा असल में एक ब्रांडिंग रणनीति थी. इससे प्लेटफॉर्म्स को अगले दिन डिलीवरी देने वाली कंपनियों से अलग पहचान बनाने में मदद मिली. चूंकि यह सेक्टर अभी नया था, इसलिए इसने उपभोक्ताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने और बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने में मदद की.”

सिंघल आगे कहते हैं कि अगर 10 मिनट की ब्रांड पेशकश को बदलकर 30 मिनट की डिलीवरी भी कर दिया जाए, तो भी यह एक मजबूत पेशकश बनी रहेगी. ऐसा इसलिए क्योंकि तुरंत आपके घर तक सामान पहुंचाने का वादा करने वाली ये कंपनियां प्रोडक्ट को लेकर कई विकल्प और काफी छूट देते हैं. 

यही कारण है कि आसपास के दुकानों की तुलना में घर बैठे यहां से सस्ते सामान मंगवा सकते हैं. 'लोकल सर्कल्स' नाम की कंपनी ने अपने हाल के सर्वे में पाया कि 74 फीसद उपभोक्ताओं ने '10 मिनट' की डिलीवरी को प्रतिबंधित करने के सरकार के कदम का समर्थन किया. उनका मानना ​​था कि डिलीवरी तनावमुक्त और डिलीवरी करने वालों के लिए सुरक्षित होनी चाहिए. 

इसके अलावा, 38 फीसद उपभोक्ताओं ने कहा कि कोई भी काम इतना जरूरी नहीं है कि उसे 10 मिनट के भीतर डिलीवर किया जाए. इस सर्वे में शामिल 62 फीसद उपभोक्ताओं ने दवाओं के ऑर्डर के लिए 10 मिनट की समय सीमा को प्राथमिकता दी. इस सर्वे में 180 शहरी जिलों से 49,000 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया था.  

द नॉलेज कंपनी के वरिष्ठ पार्टनर अंकुर बिसन का कहना है कि इन कंपनियों के पास अच्छी बात यह है कि सप्लाई चेन, लॉजिस्टिक्स और स्टोरेज पहले से ही मौजूद हैं. उनका मानना ​​है कि ब्रांड अब इस बुनियादी ढांचे का लाभ उठाकर ग्राहकों की तत्काल आवश्यकता वाली सेवाएं, जैसे स्वास्थ्य सेवा, प्रदान कर सकते हैं. बिसन कहते हैं, “अब जब इन कंपनियों के पास स्किल्ड वर्कर और बेहतर सप्लाई चेन हैं, तो इनका उपयोग किसी गंभीर हालात और स्वच्छता से लेकर आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा तक कर सकते हैं."

बता दें कि क्रिसमस और नए साल की पूर्व संध्या पर प्रमुख ई-कॉमर्स, फूड डिलीवरी और होम-सर्विस प्लेटफॉर्म के गिग वर्कर्स ने हड़ताल शुरू कर दी थी. इन गिग वर्कर्स ने सरकार से '10 मिनट की डिलीवरी' मॉडल को बंद करने का आग्रह किया, जिसमें सुरक्षा संबंधी चिंताओं, मनमाने ढंग से आईडी ब्लॉक करने और गरिमा को ठेस पहुंचाने का हवाला दिया गया था. इस मांग को लेकर सरकार ने कंपनियों से बात की और आखिरकार गिग वर्कर्स की मांग मान ली गई.

इस बदलाव का स्वागत करते हुए कर्नाटक ऐप-आधारित श्रमिक संघ (KAWU) ने कहा कि यह सही दिशा में उठाया गया कदम है, लेकिन 10 मिनट की डिलीवरी सेवा को बाकी और सभी क्षेत्रों में प्रतिबंधित किया जाना चाहिए. KAWU के अध्यक्ष इनायत अली ने एक मीडिया बयान में कहा, "विज्ञापन में बदलाव के बावजूद जब तक ऐप्स बेहद कम डिलीवरी समय दिखाते रहेंगे, यह पूरी समस्या जस की तस बनी रहेगी."

नीति आयोग के मुताबिक, 2020-21 में भारत में 77 लाख गिग वर्कर थे, जिनकी संख्या 2029-30 तक बढ़कर 235 लाख होने का अनुमान है. सरकार ने नवंबर 2025 में अधिसूचित श्रम संहिता के माध्यम से पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों के लिए सामाजिक सुरक्षा ढांचा पेश किया है, जिसमें भविष्य निधि लाभ, ESIC (कर्मचारी राज्य बीमा निगम) कवरेज, बीमा और अनिवार्य नियुक्ति पत्र शामिल हैं.
 

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