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दिल्ली और पंजाब में AAP को पंथिक राजनीति का डबल झटका क्यों लग रहा है

दिल्ली विधानसभा में आतिशी की एक टिप्पणी और 15 जनवरी को अकाल तख्त से भगवंत मान को तलब किए जाने के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) पंथिक राजनीति के बड़े दबाव में फंसती दिख रही है

आतिशी और भगवंत मान
अपडेटेड 15 जनवरी , 2026

विधानसभा चुनाव में अभी करीब एक साल है, लेकिन पंजाब की सियासत में अभी से सरगर्मी शुरू हो गई है. सत्ता में बैठी आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए प्रचार शुरू होने से पहले मुश्किलें ही बढ़ने लगी हैं. दो अलग-अलग तूफान एक साथ आकर टकरा गए हैं. एक दिल्ली में उठा, जहां AAP नेता आतिशी की गुरु तेग बहादुर को लेकर की गई टिप्पणी वायरल हो गई. दूसरा तूफान पंजाब में खड़ा हुआ, जब मुख्यमंत्री भगवंत मान को 15 जनवरी को अकाल तख्त से तलब किया गया. यह अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना मानी जा रही है.

दोनों मामलों ने सिख राजनीति की दुखती रग को दबा दिया है और AAP के लिए यह बड़ी परीक्षा बन गया है कि वह पंजाब के भावनात्मक और आस्था से जुड़े वोटरों को कितनी समझती और संभाल पाती है.

दिल्ली वाला विवाद 6 जनवरी को शुरू हुआ. उस दिन गुरु तेग बहादुर के शहीदी दिवस के 350 साल पूरे होने पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया था. मकसद श्रद्धांजलि देना था, लेकिन मामला उल्टा पड़ गया. दिल्ली विधानसभा में विपक्ष की नेता आतिशी ने बहस के दौरान गुरु तेग बहादुर को लेकर एक ऐसी पंक्ति बोल दी, जिसे कई लोगों ने गलत और गैरजरूरी बताया. बात देखते ही देखते सोशल मीडिया पर फैल गई और नाराजगी तेज हो गई.

दिल्ली में BJP नेताओं ने मौके को फौरन लपक लिया. विधानसभा के अंदर और बाहर जोरदार प्रदर्शन शुरू हो गए. हाथों में तख्तियां थीं, नारे लगे, मार्च निकाले गए और जवाबदेही की मांग की गई. आतिशी और उनकी पार्टी के लोग लगातार कहते रहे कि उन्होंने कुछ गलत नहीं कहा और सोशल मीडिया पर चल रहा वीडियो काटछांट कर फैलाया गया है. लेकिन तब तक नुक्सान हो चुका था. मामला दिल्ली से निकलकर पंजाब तक पहुंच गया और AAP को अपने गढ़ से दूर बचाव की मुद्रा में आना पड़ा.

जालंधर पुलिस ने कथित तौर पर धार्मिक भावनाएं आहत करने वाले ‘एडिटेड’ वीडियो को लेकर एफआइआर दर्ज कर ली. बाद में फॉरेंसिक जांच में साफ हुआ कि वीडियो से छेड़छाड़ की गई थी और आतिशी के असली बयान में धर्म से जुड़ा कोई जिक्र नहीं था.

इसके बावजूद विवाद ठंडा नहीं पड़ा और यह एक बड़े राजनैतिक संकट में बदल गया. दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने एफआइआर को विशेषाधिकार का उल्लंघन बताया. उनका कहना था कि विधानसभा की कार्यवाही का वीडियो कानूनन सदन की संपत्ति है और पंजाब पुलिस का इस पर कोई अधिकार नहीं बनता. इसके बाद पंजाब के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) गौरव यादव, स्पेशल डीजीपी साइबर क्राइम और जालंधर की पुलिस कमिश्नर धनप्रीत कौर को नोटिस जारी किए गए. मामला दिल्ली विधानसभा की विशेषाधिकार समिति के पास भेज दिया गया. यह पूरा मामला दिखाता है कि AAP का राजनैतिक संतुलन कितना नाजुक है और डिजिटल दौर में उठे विवाद कैसे पलक झपकते ही एक राज्य से दूसरे राज्य तक सियासी भूचाल बन सकते हैं.

इस बीच भगवंत मान इससे कहीं ज्यादा संवेदनशील और अभूतपूर्व चुनौती का सामना कर रहे हैं. सिखों की सर्वोच्च धार्मिक सत्ता अकाल तख्त साहिब ने उन्हें 15 जनवरी को पेश होने के लिए तलब किया है. यह पहली बार है जब किसी मौजूदा मुख्यमंत्री को खुद अकाल तख्त के सामने बुलाया गया हो.

यह समन भगवंत मान के एक वीडियो के बाद आया है. सिख धर्मगुरुओं के एक बड़े वर्ग का मानना है कि उस वीडियो में मुख्यमंत्री का आचरण सिख प्रतीकों और गुरुओं के प्रति सम्मानजनक नहीं था.
समन मिलते ही भगवंत मान ने तुरंत प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि वे नंगे पांव और एक विनम्र सिख की तरह अकाल तख्त के सामने पेश होंगे. इस संदेश का मतलब साफ थाः तख्त की नैतिक सत्ता को मान्यता देना, विनम्रता दिखाना और हालात को और बिगड़ने से रोकने की कोशिश.

लेकिन यह मामला सिर्फ एक वीडियो या एक पल की चूक तक सीमित नहीं है. पंजाब के पंथिक वोटर, जो लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल के साथ रहे, 2017 के बाद AAP की ओर मुड़े. इसकी एक वजह अकाली दल और कांग्रेस सरकारों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप और उनकी नाकामियों को माना गया. पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह की मौजूदगी ने सिख वोटरों को कांग्रेस की तरफ जोड़े रखा था, लेकिन वक्त के साथ यह वर्ग AAP की ओर खिसकता गया. साफ-सुथरी सरकार और नई किस्म की राजनीति के वादों ने इन वोटरों को AAP की तरफ आकर्षित किया.

लेकिन अब सियासी तस्वीर फिर बदलती दिख रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव ने साफ कर दिया कि पंथिक वोटर अब एकजुट नहीं रहे. कट्टर छवि वाले निर्दलीय नेता अमृतपाल सिंह ने खडूर साहिब से और सरबजीत सिंह खालसा ने फरीदकोट से जीत दर्ज की. इससे यह संकेत मिला कि सिख समाज का एक हिस्सा ऐसे नेताओं के पीछे खड़ा हो रहा है, जो खुद को सिख पहचान का बिना समझौता करने वाला चेहरा बताते हैं.

पंथिक बहुल इलाकों में दूसरे सीटों पर भी निर्दलीय या कट्टर माने जाने वाले उम्मीदवारों ने लोकसभा चुनाव में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई. इससे AAP और पारंपरिक पार्टियों, दोनों को चुनौती मिली. संदेश साफ थाः पंथिक वोटर अब आंख बंद करके किसी पार्टी के पीछे नहीं चलते. उन्हें सम्मान चाहिए, प्रतीकों की समझ चाहिए और आस्था के साथ ईमानदारी चाहिए.

इसी अस्थिर माहौल में आतिशी वाला विवाद आकर गिरा. इसके साथ ही भगवंत मान को अकाल तख्त से तलब किया जाना भी जुड़ गया. नतीजा यह हुआ कि AAP खुद को पंथिक राजनीति के गहरे भंवर में फंसा हुआ पा रही है. यह वही इलाका है, जहां पार्टी अब तक बेहद संभलकर चलना चाहती थी. दिल्ली में AAP की प्रशासन और गवर्नेंस पर टिकी छवि पंजाब में उस उम्मीद से टकरा गई, जहां नेताओं से लगातार आस्था और धार्मिक प्रतीकों के प्रति संवेदनशील रहने की अपेक्षा की जाती है.

विपक्ष ने मौके को पहचान लिया है, लेकिन उसकी अपनी मजबूरी यह है कि वे बिखरे हुए हैं. शिरोमणि अकाली दल सिख धार्मिक संस्थाओं से फिर जुड़ने की कोशिश कर रहा है. वह अपनी पंथिक पहचान को दोबारा खड़ा करने में लगा है और AAP की मौजूदा कमजोरियों का इस्तेमाल खुद को सिख भावनाओं का स्वाभाविक रक्षक साबित करने में कर रहा है. लेकिन अकाली दल की सबसे बड़ी दिक्कत उसकी विश्वसनीयता है और सुखबीर बादल के नेतृत्व पर पार्टी के भीतर एकराय का अभाव.
 
BJP खुद को परंपरा और व्यवस्था की रक्षक के तौर पर पेश कर रही है और साफ-सुथरे शासन के मुद्दों पर वोटरों को जोड़ने की कोशिश में है. लेकिन ग्रामीण इलाकों में पार्टी का विस्तार अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है. कांग्रेस, जिसकी गांवों में पुरानी पकड़ रही है, AAP से नाराज वर्गों में फिर से जमीन तलाशने की कोशिश कर रही है. हालांकि पंजाब में कांग्रेस खुद गहरे गुटों में बंटी हुई पार्टी बनी हुई है.

इस बीच AAP के मंत्रियों ने सफाई वाले बयान दिए हैं और छोटे-मोटे प्रदर्शन भी किए हैं, लेकिन तस्वीर पार्टी के पक्ष में नहीं बन पा रही. पार्टी बचाव की मुद्रा में दिख रही है, हालात पर तुरंत प्रतिक्रिया देती हुई और ऐसी राजनीति में उलझी हुई, जहां पंथिक भावनाओं की बारीक समझ बेहद जरूरी होती है.

भगवंत मान का अकाल तख्त में पेश होना अपने AAP में असाधारण घटना है. पहले भी सरकार और धार्मिक संस्थाओं के बीच टकराव हुए हैं, लेकिन उन्हें राजनैतिक या प्रशासनिक तरीके से निबटाया गया. किसी मौजूदा मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत तौर पर तलब करना पहले कभी नहीं हुआ. वैसे भी पंजाब में ज्यादातर नेता अकाल तख्त से किसी भी तरह की टकराव वाली स्थिति से बचते रहे हैं. अब मान ऐसे प्रतीकात्मक दायरे में कदम रख रहे हैं, जहां राजनीति, आस्था और नैतिक सत्ता एक साथ मिलती हैं. अगर यहां जरा भी चूक हुई तो सिख वोटर दूर हो सकते हैं, और जरूरत से ज्यादा झुकाव दिखाया गया तो मान कमजोर नेता के तौर पर देखे जा सकते हैं.

जमीनी माहौल फिलहाल काफी तनावपूर्ण है. अकाली दल के नेताओं ने माफी की मांग को लेकर रैलियां की हैं. 13 और 14 जनवरी को माघी के मौके पर धार्मिक रैलियों की तैयारी है, जिसे क्षेत्रीय नववर्ष के तौर पर मनाया जाता है. BJP की पंजाब इकाई ने पुतला दहन और मार्च का आयोजन किया है. कांग्रेस खुद को नाराज लेकिन संतुलित सिखों की आवाज बताने की कोशिश कर रही है.

AAP के नेता दो तरफ से दबाव में हैं. एक तरफ दिल्ली में अपने नेताओं का बचाव करना है, दूसरी तरफ भगवंत मान और धर्मगुरुओं के बीच होने वाली बेहद संवेदनशील मुलाकात को संभालना है. पार्टी धीरे-धीरे पंथिक राजनीति के दलदल में और गहराई तक खिंचती जा रही है. यहां टिके रहना सिर्फ चुनावी मशीनरी पर नहीं, बल्कि प्रतीकों और भावनाओं को समझने की कला पर भी निर्भर करता है. 

आतिशी और भगवंत मान से जुड़े ये दोनों मामले यह भी दिखाते हैं कि आज के दौर में राजनैतिक संकट कैसे पैदा होते हैं. डिजिटल युग में एक छोटा सी क्लिप चंद मिनटों में तोड़-मरोड़ कर हथियार बना दी जाती है, उससे पहले कि सच या संदर्भ सामने आ सके. गुस्सा तथ्यों से कहीं तेज फैलता है. AAP अब ऐसे माहौल से जूझ रही है, जहां डिजिटल भ्रम, प्रतीकात्मक कदम और धार्मिक सत्ता आपस में टकराते हैं, और भावनाओं को गलत पढ़ने की कीमत बेहद भारी पड़ सकती है.

AAP के लिए इस पूरे घटनाक्रम से सबक बिल्कुल साफ हैं. पार्टी को अब दिल्ली वाली गवर्नेंस केंद्रित राजनीति और पंजाब की आस्था से जुड़ी सियासी संस्कृति के बीच तालमेल बैठाना होगा. भाषा, हावभाव और नीतियों में ऐसा संतुलन जरूरी है, ताकि पंथिक वोटरों की नाराजगी और न बढ़े. भगवंत मान का अकाल तख्त में पेश होना सिर्फ एक औपचारिकता नहीं रहेगा. धर्मगुरु और वोटर, दोनों इसे उनकी नीयत और सियासी समझ की कसौटी के तौर पर देखेंगे. आतिशी वाला विवाद यह भी दिखाता है कि पंजाब से दूर बैठे नेता भी यहां की भावनात्मक राजनीति से अछूते नहीं रहते.

पंजाब में, जहां राजनीति और धर्म साथ-साथ चलते हैं, AAP की मौजूदा हालत यह याद दिलाती है कि अच्छी नीयत काफी नहीं होती, धारणा ही सब कुछ बन जाती है. हर कदम को नैतिक नजरिए से परखा जाएगा. हर इशारा सिख मूल्यों के साथ तालमेल की परीक्षा बन सकता है. इस मायने में पंजाब AAP के सामने दोहरी चुनौती पेश कर रहा है. एक तरफ दिल्ली में अपने नेतृत्व का बचाव, दूसरी तरफ पंजाब में सिख धर्मगुरुओं की नैतिक सत्ता के प्रति सम्मान साबित करना. जरा सी चूक भारी पड़ सकती है, जबकि समझदारी से कदम बढ़ाने पर पार्टी अपना आधार बचा सकती है.

यह कोई साधारण सियासी चुनौती नहीं है. आतिशी का विवाद और भगवंत मान का अकाल तख्त में पेश होना मिलकर एक साफ चेतावनी देते हैं. जिस राज्य में नैतिकता, परंपरा और राजनीति एक-दूसरे में गुथी हों, वहां सत्ता तक पहुंचने का रास्ता सिर्फ गवर्नेंस से नहीं, बल्कि आस्था के प्रति सम्मान से भी होकर गुजरता है.

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