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क्या है वीवीपैट, जिस पर विपक्ष को ईवीएम से ज्यादा भरोसा है?

अभी के नियम के मुताबिक हर विधानसभा क्षेत्र के पांच बेतरतीब ढंग से चुने गए पोलिंग बूथों के ईवीएम वोटों का मिलान वीवीपैट पर्चियों के साथ किया जाता है. विपक्ष की मांग है कि इसे कम से कम 50 फीसदी तक बढ़ाया जाए

ईवीएम और वीवीपैट मशीन (सांकेतिक फोटो)
According to the plea, the government has spent nearly Rs 5,000 crore on the purchase of nearly 24 lakh VVPATs.
अपडेटेड 9 अप्रैल , 2024

इस साल हो रहे 18वीं लोकसभा के चुनाव के लिए पहले चरण का मतदान 19 अप्रैल को होना है. लेकिन इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वो जल्द ही उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें मांग की गई है कि ईवीएम से डाले गए सारे मतों को वेरीफाई करने के लिए उनके वीवीपैट (वोटर वेरीफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल) पर्चियों के साथ मिलान की जाए.

इस सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल को केंद्रीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को नोटिस भेजा. इस नोटिस में चुनाव आयोग से वीवीपैट की सारी पर्चियों के मिलान की संभावना के बारे में जानकारी मांगी गई है. करीब एक साल पहले मार्च, 2023 में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी एडीआर ने इन मांगों के साथ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

याचिका में कहा गया था कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से आयोजित हों इसके लिए यह जरूरी है कि ईवीएम में दर्ज वोटों को उनके वीवीपैट पर्चियों के साथ क्रॉस-वेरीफाई (दोबारा सत्यापन) किया जाए. यह प्रक्रिया तेजी से पूरी हो इसके लिए एडीआर ने वीवीपैट पर्चियों पर बारकोड के इस्तेमाल का सुझाव भी दिया था.

अब यहां सवाल उठता है कि क्या वीवीपैट इतना महत्वपूर्ण है? चुनाव आयोग को इसके इस्तेमाल की जरूरत क्यों पड़ी? इन सवालों की तह में जाने से पहले आइए समझते हैं वीवीपैट है क्या? यह काम कैसे करता है?

दरअसल, वीवीपैट एक मशीन है जो ईवीएम की बैलेट यूनिट से जुड़ी होती है. जब कोई मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवार को ईवीएम के जरिए वोट डालता है तो इसी मशीन पर उस उम्मीदवार की जानकारी एक पर्ची के माध्यम से सामने आती है. उस पर्ची में उम्मीदवार का सीरियल नंबर, उसका नाम और संबंधित पार्टी का सिंबल छपा रहता है.

वो पर्ची सात सेकेंड तक सामने रहती है. इस दौरान मतदाता पर्ची में देखकर वेरीफाई कर सकता है कि उसने सही वोट दिया है. सात सेकेंड के बाद वो पर्ची नीचे डब्बे में गिर जाती है. मतदाता वो पर्ची घर लेकर नहीं जा सकता क्योंकि मशीन में लगे ग्लास विंडो के पीछे वो होती है. बाद में इन्हीं पर्चियों का मिलान ईवीएम में दर्ज वोटों के साथ होता है. अब यहां सवाल उठता है कि चुनाव आयोग को वीवीपैट की जरूरत क्यों पड़ी?

साल 2010 में चुनाव आयोग ने तमाम राजनीतिक दलों के साथ इस बात पर चर्चा करने के लिए बैठक की थी कि ईवीएम आधारित चुनाव प्रक्रिया को और पारदर्शी कैसे बनाया जा सकता है? तब वीवीपैट का विचार पहली बार सामने आया. इसका प्रोटोटाइप (पहला डिजाइन) तैयार हुआ. डिजाइन तैयार होने के बाद साल 2011 में इसका लद्दाख, थिरुवनंतपुरम्, चेरापूंजी, पूर्वी दिल्ली और जैसलमेर में फील्ड ट्रायल हुआ. इसके बाद इसके और भी ट्रायल हुए.

सबकुछ ठीक रहने और राजनीतिक पार्टियों के फीडबैक के बाद चुनाव आयोग की एक एक्सपर्ट कमेटी ने फरवरी, 2013 में इसके डिजाइन को मंजूरी दे दी. इसके लिए कंडक्ट ऑफ इलेक्शंस रूल्स, 1961 में संशोधन किया गया ताकि ईवीएम में वीवीपैट मशीन जोड़ी जा सके. साल 2013 में ही नागालैंड के नोकसेन विधानसभा क्षेत्र के सभी 21 मतदान केंद्रों पर पहली बार वीवीपैट का इस्तेमाल किया गया. जून, 2017 तक आते-आते वीवीपैट को पूरी तरह से अपना लिया गया.

मौजूदा जो नियम है उसके मुताबिक, हर विधानसभा क्षेत्र के कोई पांच पोलिंग बूथों, जिन्हें बेतरतीब ढंग से चुना जाता है,  की ईवीएम वोटों का मिलान वीवीपैट पर्चियों के साथ किया जाता है. विपक्षी दलों की मांग है कि इसे कम से कम 50 फीसदी तक बढ़ाया जाए. पिछले साल दिसंबर में इंडिया गठबंधन ने इसके लिए एक प्रस्ताव भी पास किया था जिसमें 100 फीसदी ईवीएम मतों के साथ वीवीपैट पर्चियों के मिलान की मांग की गई थी. इसके अलावा गठबंधन ने इस सिलसिले में मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार से भी मिलने के लिए समय मांगा है.

चुनाव आयोग की बात करें तो अभी तक उसने इन मांगों पर दिलचस्पी नहीं दिखाई है. सवाल उठता है कि ऐसा क्यों? इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, आयोग का दावा है कि चुनाव अधिकारियों को एक पोलिंग बूथ पर वीवीपैट पर्चियों का ईवीएम मतों से मिलान करने में करीब एक घंटे का समय लगता है. अगर 50 फीसद वीवीपैट पर्चियों के मिलान की जरूरत पड़ती है तो इस प्रक्रिया में और समय लगेगा. जिसका मतलब है नतीजों में पांच से छह दिनों की देरी होगी.

इसके अलावा चुनाव आयोग ने और भी कमियां गिनाई हैं जिनमें मैनपॉवर की कमी, पोलिंग बूथ की संख्या बढ़ाने में दिक्कत (जहां वीवीपैट पर्चियों की गिनती की जाती है) जैसी बुनियादी चुनौतियां शामिल हैं. वहीं आयोग के इस तर्क पर विपक्षी दलों का कहना है कि निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया देर से जारी चुनावी नतीजों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है.

देखा जाए तो ऐसा नहीं है कि चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों के वीवीपैट पर्चियों के मिलान जैसी चिंताओं को समझने की कोशिश नहीं की है. इस सिलसिले में आयोग ने 2018 में इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (आईएसआई) ने पता लगाना चाहा कि वोटिंग की एक्यूरेसी की जांच के लिए कितने फीसद वीवीपैट मतों की गिनती करने की जरूरत होगी?

इसके बाद फरवरी, 2018 में चुनाव आयोग ने हर विधानसभा क्षेत्र में बेतरतीब तरीके से चुने गए एक पोलिंग बूथ के ईवीएम मतों को वीवीपैट पर्चियों के साथ मिलान को अनिवार्य कर दिया. लेकिन तेलुगू देशम पार्टी के नेता चंद्रबाबू नायडू ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली जिसमें वीवीपैट पर्चियों के मिलान के लिए बूथों की संख्या कम से कम 50 फीसद करने की मांग थी.

नायडू की इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल, 2019 को फैसला सुनाया जिसमें वीवीपैट पर्चियों की काउंटिंग के लिए पोलिंग बूथ की संख्या एक से बढ़ाकर पांच कर दिया गया. इन पांच बूथों का चयन रिटर्निंग ऑफिसर उम्मीदवारों या उनके एजेंटों की मौजूदगी में ड्रा के जरिए करते हैं.

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