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औरंगजेब के बारे में नेहरू क्या सोचते थे?

अमेरिकी इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के की किताब 'औरंगजेब: द मैन एंड द मिथ' में नेहरू के जिक्र के अलावा कई ऐसी बातें हैं जो औरंगजेब के बारे में प्रचलित आम धारणा से मेल नहीं खातीं

छठे मुगल बादशाह औरंगजेब की एक पेंटिंग
छठे मुगल बादशाह औरंगजेब की एक पेंटिंग
अपडेटेड 24 मार्च , 2025

कई बार ऐसा हुआ जब मुगल बादशाह औरंगजेब का नाम सड़क के साइन बोर्डों और स्कूली किताबों से मिटाया गया, लेकिन उसकी क्रूरता और असहिष्णुता की कहानियां आज भी पूरी तरह से मिटी नहीं हैं. इतिहास बताता है कि पिता के हत्यारे औरंगजेब ने राजगद्दी पाने के लिए अपने भाइयों को भी जान से मारने में परहेज नहीं किया.

आम जनमानस के एक बड़े तबके में  इस छठे मुगल बादशाह की जो छवि दर्ज है, वो एक क्रूर शासक की है लेकिन क्या उसकी यह छवि ऐतिहासिक रूप से भी सत्य है, तथ्यात्मक है? या यह महज हमारे पूर्वाग्रहों से बनी एक गड़बड़ छवि मात्र है, जिसे सदियों से सुनी-सुनाई बातों ने लगातार और भी मजबूत किया है.

2017 में अमेरिका की रटगर्स यूनिवर्सिटी की इतिहासकार ऑड्रे ट्रुश्के की एक किताब आई थी - औरंगजेब: द मैन एंड द मिथ. उसमें इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए ट्रुश्के ने इतिहास के पन्नों को दोबारा पलटा, ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स और संदर्भों की दोबारा खंगाला. इस क्रम में कुछ ऐसी बातें सामने आईं जो औरंगजेब के बारे में आम जनमानस की धारणाओं को पलटने का काम करती है और एक जटिल व्यक्तित्व को सामने लाती है जो कभी क्रूर, तो कभी संयमित नजर आता है.

औरंगजेब: द मैन एंड द मिथ किताब के अंश

औरंगजेब भारत के सबसे बदनाम बादशाहों में एक खास, लेकिन अनचाही जगह रखता है. आम धारणा (इसमें वे लोग भी शामिल जो बीजेपी और समान विचारधारा वाले हिंदू राष्ट्रवादी समूहों की सोच से इत्तेफाक नहीं रखते) औरंगजेब को एक कठोर इस्लामी दमनकर्ता के रूप में देखती है जो भारत की हर चीज, खासकर हिंदुओं से नफरत करता था.

और यह धारणा सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है. सीमा के उस पार पाकिस्तान में भी कई लोग औरंगजेब की निगेटिव छवि को स्वीकार करते हैं, यहां तक कि उसे दक्षिण एशिया की आधुनिक समस्याओं के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जाता है. आठ-नौ साल पहले एक मशहूर पाकिस्तानी नाटककार शाहिद नदीम ने कहा भी था, "जब औरंगजेब ने अपने भाई दारा शिकोह पर विजय पाई, तभी विभाजन (भारत-पाक के संदर्भ में) के बीज बो दिए गए थे."

शाहिद नदीम का नजरिया आधुनिक भारत के संस्थापक नेताओं में से एक, जवाहरलाल नेहरू के लेखन से मेल खाता है. 1946 में पहली बार प्रकाशित अपनी किताब 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया में' नेहरू ने औरंगजेब की कथित कमियों को विस्तार से गिनाया और उसे "कट्टरपंथी और कठोर शुद्धतावादी" कहकर फटकार लगाई. उन्होंने छठे मुगल बादशाह की आलोचना करते हुए उसे एक खतरनाक प्रतिगामी (पीछे की ओर जाने वाला) व्यक्ति बताया, जिसने "समय की घड़ी पीछे मोड़ दी" और आखिरकार मुगल साम्राज्य के पतन का कारण बना.

नेहरू ने औरंगजेब को इतना ज्यादा मुस्लिम करार दिया कि वह कभी एक सफल भारतीय शासक नहीं हो सकता था. उन्होंने लिखा, "जब औरंगजेब ने पहले के मुगल शासकों की समन्वयता (साथ लेकर चलने की नीति) का विरोध करना और उसे दबाना शुरू किया और भारतीय शासक के बजाय एक मुसलमान की तरह काम करना शुरू किया, तो मुगल साम्राज्य बिखरने लगा." नेहरू के लिए, औरंगजेब के इस्लाम के प्रति समर्पण ने भारत पर शासन करने की उसकी क्षमता को कमजोर कर दिया. 

हालांकि, औरंगजेब को खतरनाक रूप से धर्मनिष्ठ और इसलिए एक बुरा सम्राट बताने में नेहरू बिल्कुल भी नए नहीं थे. नेहरू के कई समकालीनों ने भी इस तरह के विचारों का समर्थन किया, जिनमें 20वीं सदी के सबसे बड़े इतिहासकार यदुनाथ सरकार भी शामिल थे. ब्रिटिश औपनिवेशिक विचारकों ने लंबे समय से मुगलों पर कई तरह के आरोप लगाए थे, जिनमें यह भी शामिल था कि वे स्त्रैण (स्त्रियों जैसा व्यवहार करने वाले) और अत्याचारी मुसलमान थे.

1772 में, अलेक्जेंडर डॉव (ईस्ट इंडिया कंपनी में अधिकारी और लेखक) ने मुगल शासन पर चर्चा करते हुए टिप्पणी की थी कि "मोहम्मद का धर्म (मुस्लिम) विशेष रूप से निरंकुशता के लिए अनुकूल है; और यह उन सबसे बड़े कारणों में से एक है, जो ईस्ट में इस प्रकार की सरकार की स्थायित्व को हमेशा के लिए तय कर सकता है."

अंग्रेजों के लिए ऐसी गहरे पैठी हुई समस्या का सीधा हल था: भारत पर ब्रिटिश शासन. बाद के बरसों में ऐसी धारणाएं स्कूली किताबों और जनसंचार माध्यमों के जरिए व्यापक समाज में फैलीं, और कई पीढ़ियों ने अंग्रेजों की इस धारणा को आत्मसात कर लिया कि औरंगजेब एक धार्मिक उन्माद से प्रेरित क्रूर शासक था. सैकड़ों बरसों से कई टिप्पणीकारों ने भी बेहद कमजोर सबूतों के आधार पर औरंगजेब को एक कट्टर और क्रूर शासक के रूप में पेश करने का मिथक फैलाया है. आज भी औरंगजेब की आम जनमानस में फैली बातें कई झूठी धारणाओं से प्रभावित है, जिनमें यह भी शामिल है कि उसने लाखों हिंदुओं का नरसंहार किया और हजारों मंदिरों को नष्ट किया.

ये 'तथ्य' ऐतिहासिक सबूतों से साबित नहीं होते , हालांकि कुछ विद्वानों ने अक्सर दुर्भावनापूर्ण इरादे से इन मनगढ़ंत कहानियों के लिए कथित आधार प्रस्तुत करने का प्रयास किया है. लेकिन खुलेआम झूठ बोलने की तुलना में पक्षपाती व्याख्याएं अधिक आम रही हैं, जहां कुछ चुनिंदा घटनाओं को इस साफ मकसद से फैलाया गया है कि औरंगजेब की निंदा को पहले से तय निष्कर्ष के रूप में पेश किया जा सके.

जैसे, आलोचक यह तो जोर-शोर से कहते हैं कि औरंगजेब ने कुछ मंदिरों को नष्ट किया, लेकिन यह स्वीकार नहीं करते कि उसने कई आदेश हिंदू मंदिरों की रक्षा के लिए भी जारी किए और ब्राह्मणों को वजीफे और जमीनें प्रदान की थी. 

वे यह तो कहते हैं कि उसने होली के उत्सव पर कुछ प्रतिबंध लगाए, लेकिन यह नहीं बताते कि उसने मुहर्रम और ईद के त्योहारों पर भी पाबंदी थोपी थी. वे इस तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हैं कि औरंगजेब ने सेहत संबंधी मामलों में हिंदू संतों से सलाह-मशविरा किया और अपने प्रशासन में किसी भी पूर्ववर्ती मुगल शासक की तुलना में अधिक हिंदुओं को नियुक्त किया.

हम औरंगजेब के शासन के इन कम चर्चित लेकिन ऐतिहासिक रूप से अहम पहलुओं को उस काल्पनिक इमेज के साथ मेल नहीं करा सकते, जिसमें उसे धार्मिक नफरत से प्रेरित शासक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. बेशक, कोई यह दावा नहीं करेगा कि औरंगजेब निर्दोष था. उसने कुछ ऐसे काम किए जो आज के लोकतांत्रिक, समतावादी और मानवाधिकार मानकों पर खरे नहीं उतरते. 

लेकिन औरंगजेब आधुनिक दुनिया के पूर्व, राजाओं और साम्राज्यों की दुनिया में शासन कर रहा था जहां हिंसा आम बात थी. राज्य सत्ता और अन्य विषयों पर उसकी सोच उसी समय और परिस्थिति से प्रभावित थी जिसमें वह रहा. दरअसल, इतिहास के अध्ययन का मकसद ही पूरी तरह से कुछ और होता है.

इतिहासकार लोगों को उनके अपने संदर्भ में समझने का प्रयास करते हैं, उन्हें खास समय और स्थान की उपज के रूप में देखते हैं और उनके कामों और प्रभावों की व्याख्या करते हैं. जिसके बारे में हम अध्ययन कर रहे हैं, उसे दोषमुक्त करना जरूरी नहीं है, और न ही हमें उसे पसंद करने की जरूरत है. लेकिन फैसला देने से पहले हमें इतना जरूर ठहरना चाहिए कि औरंगजेब का मिथक बैकग्राउंड में धुंधला पड़ सके और उसकी जगह एक अधिक संतुलित और प्रभावशाली कहानी को सामने लाने का मौका मिले.

औरंगजेब ने अपने समय में रहने वाले लोगों में नैतिकता को बढ़ावा देने के लिए जो तरीका अपनाया, उसमें सबसे आम था - प्रतिबंध लगाना. अपने शासन काल के कई चरणों में औरंगजेब ने कई बुराइयों को सीमित या प्रतिबंधित करने का प्रयास किया, जिनमें शराब, अफीम, वेश्यावृत्ति, जुआ, भड़काऊ धार्मिक लेखन और धार्मिक त्योहारों के सार्वजनिक उत्सव पर बैन लगाना शामिल था. 

मोरल कोड ऑफ कंडक्ट यानी नैतिक संहिता को लागू करने की जिम्मेदारी मुहतसिबों (नैतिक प्रहरी) को सौंपी गई थी, और प्रत्येक शहर में इनकी नियुक्ति उलेमा वर्ग से की जाती थी. हालांकि पूरे साम्राज्य में शराब की खपत को कम करने का औरंगजेब का प्रयास उसके शासन की सबसे बड़ी नीतिगत विफलताओं में से एक रहा.

औरंगजेब के समय में भारत में शराब पीना बहुत आम बात थी. 18वीं सदी की शुरुआत में औरंगजेब के दरबार में आए अंग्रेज राजदूत विलियम नोरिस ने यह गवाही दी थी कि असद खान (जो 1676 से 1707 तक प्रमुख वजीर था) और अन्य सरकारी मंत्री "गर्म मादक पेयों (हॉट स्पिरिट) के इतने शौकीन थे कि अगर उन्हें मिल जाए, तो वे हर दिन नशे में धुत रहना पसंद करते थे." इसी के चलते नॉरिस ने असद खान को प्रभावित करने के इरादे से उसे शराब और विशेष रूप से चुने गए गिलास उपहार में भेजे, जिनसे वह इन "स्ट्रॉन्ग वॉटर" का आनंद ले सके.

हालांकि औरंगजेब ने निजी तौर पर शराब पीने से परहेज किया, लेकिन वह जानता था कि बहुत कम ऐसे शाही अफसर हैं जो उसकी तरह शराब को हाथ नहीं लगाते. इतिहासकार निकोली मनूची (जो अपनी गपशप और अतिशयोक्ति भरी प्रवृत्ति के लिए प्रसिद्ध था) ने लिखा कि एक बार औरंगजेब ने निराशा में कहा था कि पूरे हिंदुस्तान में केवल दो ही लोग शराब नहीं पीते - वह खुद और उसका प्रधान काजी, अब्दुल वहाब.

हालांकि, मनूची ने अपने पाठकों को यह राज खोला, "लेकिन जहां तक अब्दुल वहाब का सवाल है, इस मामले में औरंगजेब गलत था, क्योंकि मैं खुद उसे हर दिन शराब (वीनो) की एक बोतल भेजता था, जिसे वह छुपकर पीता था ताकि बादशाह को इसका पता न चले."

आमतौर पर यह माना जाता है कि औरंगजेब ने अपने पूरे साम्राज्य में संगीत पर प्रतिबंध लगा दिया था. यह एक गलतफहमी है जिसे कैथरीन शॉफिल्ड जैसे विद्वानों ने ठीक किया है लेकिन अभी तक यह आम जागरूकता में नहीं आया है. दरअसल, औरंगजेब ने अपने दरबार में ही कुछ खास तरह के संगीत पर पाबंदी लगाई थी. शायद अधिक दिलचस्प बात यह है कि औरंगजेब ने व्यंग्य कविता पर बैन नहीं लगाया, जो उस समय एक लोकप्रिय शैली हुआ करती थी.

ऐसा ही एक किस्सा एक कवि का है जिसने सल्तनत के एक अधिकारी कामगार खान की बाद की दूसरी शादी के बारे में एक भद्दा व्यंग्य लिखा था. नाराज कामगार खान ने बादशाह से दखल देने का अनुरोध किया. औरंगजेब का जवाब था, "उसी कवि ने मुझे अपने व्यंग्यों में नहीं बख्शा था; बदले में मैंने उसका इनाम बढ़ा दिया था, ताकि वह ऐसा दोबारा न करे; फिर भी इस एहसान के बावजूद उसने अपनी ओर से व्यंग्य कम नहीं किया." औरंगजेब ने तब याचिका खारिज कर दी, और अपने गुमान में आहत कामगार खान को सलाह देते हुए कहा, "हमें अपनी भावनाओं को दबा देना चाहिए और सद्भाव से रहना चाहिए."

आज के समय में कई लोग औरंगजेब के कुछ खास मंदिरों को नुकसान पहुंचाने वाले फैसलों को हिंदुओं के प्रति उसके नफरत का प्रतीक मानते हैं. ऐसी धारणाएं ब्रिटिश युग के विद्वानों की सोच से उपजी हैं, जहां हिंदू-मुस्लिम शत्रुता को शाश्वत साबित करना अंग्रेजों की "फूट डालो और राज करो" नीति का हिस्सा था. आज कई वेबसाइटें अक्सर तथ्यों के साथ खिलवाड़ करते हुए हिंदुओं के खिलाफ औरंगजेब के 'अत्याचारों' को सूचीबद्ध करने का दावा करती हैं, और सांप्रदायिक आग को हवा देती हैं. हालांकि, इस बात में कई खामियां हैं कि औरंगजेब ने मंदिरों को इसलिए ढहाया क्योंकि वह हिंदुओं से नफरत करता था.

सबसे स्पष्ट बात यह है कि औरंगजेब के शासन क्षेत्र में हजारों हिंदू मंदिर थे, लेकिन उसने अधिकतम कुछ दर्जन ही नष्ट किए. अगर हम औरंगजेब को एक कट्टरपंथी के रूप में देखने की जिद पर अड़े रहें, जो केवल भारत से मंदिरों को मिटाने के एकमात्र उद्देश्य से प्रेरित था, तो यह विरोधाभास कोई मायने नहीं रखता.

इतिहास पर आधारित कोई वैध नजरिया यह समझाने का प्रयास करेगा कि औरंगजेब ने मंदिरों को नष्ट करने की तुलना में अधिक बार उनकी रक्षा क्यों की. उसने गैर-मुस्लिम धर्म के नेताओं और संस्थानों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए इस्लामी कानून का पालन किया. भारत में मुस्लिम शासक आठवीं शताब्दी से ही हिंदुओं को "जिम्मी" (इस्लामी कानून के तहत संरक्षित वर्ग) मानते आ रहे थे, और इस प्रकार हिंदू कुछ अधिकारों और राज्य सुरक्षा के हकदार थे. फिर भी, औरंगजेब ने हिंदू और जैन धार्मिक समुदायों के प्रति अपने आचरण में इस्लामी कानून की जरूरतों से परे जाकर काम किया.

औरंगजेब की न्याय की अवधारणा में धार्मिक आजादी का एक निश्चित स्तर शामिल था, जिसके कारण उसने अधिकांश हिंदू पूजा स्थलों की रक्षा की. आम तौर पर, मुगल शासक अपनी प्रजा को अपने धार्मिक विचारों और मान्यताओं को मानने की पर्याप्त आजादी देते थे. हालांकि, मुगल भारत में धार्मिक आजादी राज्य हितों से बंधी हुई थी, और औरंगजेब ने उन धार्मिक संस्थानों और नेताओं के खिलाफ कठोर एक्शन लेने में संकोच नहीं किया, जिन्हें वह विद्रोही या अनैतिक मानता था. लेकिन जब ऐसी कोई चिंता नहीं होती थी, तो औरंगजेब ने खुद को सभी भारतीयों का न्यायप्रिय शासक मानते हुए मंदिरों को राज्य सुरक्षा प्रदान की.

औरंगजेब ने 1654 में मेवाड़ के हिंदू राजपूत शासक राणा राज सिंह को भेजे गए एक शाही आदेश (फारसी में निशान) में बताया था कि अच्छे राजाओं को मंदिरों और अन्य गैर-मुस्लिम धार्मिक स्थलों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए. उसने साफ किया, "क्योंकि महान राजाओं के व्यक्तित्व ईश्वर की छाया होते हैं, इसलिए इस ऊंचे वर्ग जो ईश्वर के दरबार के स्तंभ हैं, का ध्यान इस पर केंद्रित होता है कि विभिन्न मान्यताओं और विभिन्न धर्मों (मजाहिब) के लोग शांति की छांव में जीवन व्यतीत करें और समृद्धि के साथ अपने दिन गुजारें, और कोई भी किसी अन्य के मामलों में हस्तक्षेप न करे."

अगर फारसी की इस नफासत भरी शैली को थोड़ा आसान करें तो औरंगजेब का मुख्य विचार यह था कि राजा धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि होता है, इसलिए उसका कर्तव्य है कि वह धार्मिक समुदायों के बीच शांति बनाए रखे.

उसी रियासती व्यवस्था में औरंगजेब ने उन राजाओं की निंदा भी की, जिन्होंने "कट्टरता (तस्सुम) का सहारा लिया" और उन्हें "ईश्वर की समृद्ध रचनाओं को नष्ट करने" का दोषी ठहराया. औरंगजेब ने वादा किया कि एक बार जब वह सिंहासन पर बैठेगा तो वह इस तरह की गैर-इस्लामिक प्रथाओं से मुंह मोड़ लेगा और इसके बजाय अपने "महान पूर्वजों की सम्मानित प्रथाओं और स्थापित नियमों का पालन करके दुनिया पर चमक बिखेरेगा."

औरंगजेब के पास मुगल साम्राज्य में धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देने के अपने शाही वादे को पूरा करने के लिए 49 वर्ष थे, और उसने इसकी मजबूत शुरुआत की. बादशाह बनने के बाद अपने शुरुआती कामों में से एक के रूप में औरंगजेब ने बनारस के स्थानीय मुगल अधिकारियों को एक शाही आदेश (फरमान) जारी किया, जिसमें उन्हें स्थानीय मंदिरों के मामलों में किसी भी तरह का दखल रोकने का निर्देश दिया गया.

फरवरी 1659 में लिखे गए इस आदेश में औरंगजेब ने कहा कि उसे पता चला है कि "कुछ लोगों ने द्वेष और विद्वेषवश बनारस और आसपास के स्थानों के हिंदू निवासियों को परेशान किया है, जिसमें वहां के प्राचीन मंदिरों की देखरेख करने वाले ब्राह्मणों का एक समूह भी शामिल है."

इसके बाद, राजा ने अपने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिया, "आप यह सुनिश्चित करें कि कोई भी अवैध रूप से ब्राह्मणों या उस क्षेत्र के अन्य हिंदुओं को परेशान न करे, ताकि वे अपने पारंपरिक स्थान पर रह सकें और साम्राज्य की स्थिरता के लिए प्रार्थना कर सकें."

1659 के बनारस फरमान का समापन मुगल साम्राज्य की स्थिरता के लिए ब्राह्मणों की प्रार्थना तय करने के विचार के साथ हुआ था. यही भाव औरंगजेब द्वारा जारी किए गए कई अन्य शाही आदेशों में भी दोहराया गया, जिनमें मंदिरों और उनके संरक्षकों की रक्षा का प्रावधान किया गया था कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाए ताकि ब्राह्मण मुगल राज्य की दीर्घायु के लिए प्रार्थना कर सकें.

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