पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारत के छोटे व्यवसायों पर भी पड़ने लगा है. अब इस जंग के कारण देश भर के उद्योगों में गैस आपूर्ति और कच्चे तेल की आपूर्ति बाधित हो रही है.
फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो एंड स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (FISME) के महासचिव अनिल भारद्वाज मानते हैं कि उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है. उन्होंने कंपनियों में होने वाली ऊर्जा की कमी को लेकर चिंता जाहिर की है.
अनिल भारद्वाज के मुताबिक, उद्योगों पर इसका प्रभाव दो तरह से पड़ रहा है. पहला- ऊर्जा संसाधनों की कमी के कारण सबसे ज्यादा असर उन क्षेत्रों पर पड़ रहा है जो विनिर्माण के लिए लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) पर निर्भर हैं. इनमें सिरेमिक और फाउंड्री यानी लोहा, स्टील, एल्युमिनियम जैसे उद्योग शामिल हैं. इसके अलावा, उन क्षेत्रों पर भी असर पड़ा है, जो कच्चे तेल से जुड़े कच्चे माल पर निर्भर हैं, जैसे कि प्लास्टिक, रसायन और सिंथेटिक परिधान.
दूसरा- ईरान में चल रही जंग के कारण मध्य पूर्व से आयात-निर्यात करने वाली कंपनियां माल ढुलाई और बीमा लागत में वृद्धि के कारण बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं.
गैस की कमी : खाड़ी देशों में चल रही जंग का असर उन क्षेत्रों पर पड़ रहा है जो विनिर्माण में गैस पर निर्भर हैं, जैसे सिरेमिक, उर्वरक, फाउंड्री एवं कास्टिंग उद्योग. सूक्ष्म एवं लघु इकाइयों में प्रोडक्शन संबंधी समस्याएं पहले ही शुरू हो चुकी हैं और धीरे-धीरे बड़े उद्योगों तक फैलने की आशंका है.
कोयंबटूर का ही उदाहरण लें, तो यह शहर पंप और मोटर निर्माण का एक प्रमुख केंद्र है, जहां 25 लाख से अधिक लघु एवं मध्यम उद्यम इकाइयां हैं. कोयंबटूर अकेला ऐसा शहर है, जो भारत की इन उत्पादों की 40 फीसद से अधिक जरूर की आपूर्ति करती हैं.
कोयंबटूर जिला लघु उद्योग संघ के अध्यक्ष एम. कार्तिकेयन का दावा है कि 9 मार्च से LPG की अनुपलब्धता के कारण इस शहर के राजस्व में 30 फीसद तक की गिरावट हुई है.
कार्तिकेयन आगे कहते हैं, “LPG का स्टॉक खत्म होने के साथ ही इकाइयां बंद होना शुरू हो सकती हैं, क्योंकि ज्यादातर कंपनियां केवल 15 दिनों का स्टॉक रखती हैं. इससे अकेले कोयंबटूर में 12 लाख के श्रम बल में से लगभग 4 लाख लोग अपनी नौकरियां खो सकते हैं.”
यह ध्यान देने योग्य है कि तमिलनाडु सरकार के जरिए 2022 में उद्योग के लिए बिजली की कीमतों में 35 रुपए से 150 रुपए प्रति किलोवाट की वृद्धि करने के कारण लगभग 50 फीसद इकाइयों को बिजली से चलने वाले भट्टों से गैस से चलने वाले भट्टों में बदलना पड़ा था.
कार्तिकेयन का कहना है कि उद्योग से जुड़े लोगों ने राज्य सरकार से बिजली की दरों में कमी करने और पर्याप्त बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने का आग्रह किया है ताकि बिजली से चलने वाले भट्टों वाली इकाइयां अपना संचालन जारी रख सकें.
वे बताते हैं कि यह उद्योग एक ईकोसिस्टम के रूप में कार्य करता है और एक छोटा सा व्यवधान भी इसपर व्यापक असर डाल सकता है. उदाहरण के लिए, पाउडर कोटिंग का काम पूरी तरह से गैस पर ही निर्भर है. इसमें किसी तरह की रुकावट का असर उत्पादन प्रक्रिया के शुरुआती चरणों पर पड़ सकता है. पाउडर कोटिंग के अभाव में शीट मेटल उत्पादन जैसे उद्योग ठप हो सकते हैं.
गैस की कमी से कपड़ा उद्योग पर भी प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है. विशेष रूप से दिल्ली-NCR क्षेत्र में भी इसका असर पड़ रहा है. खासकर, तब जब गर्मियों में विदेशी बाजारों के लिए माल की खेप भेजी जानी होती है.
इसका मुख्य कारण PNG (पाइप्ड नेचुरल गैस) की आपूर्ति में रुकावट है, जिसका उपयोग इस्त्री और धुलाई के लिए भाप उत्पन्न करने वाले बॉयलरों में किया जाता है. निर्यातकों के पास इसकी जगह पर दूसरे ईंधन के इस्तेमाल करने के ऑप्शन भी नहीं हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि प्रदूषण प्राधिकरण ने इस पूरे उद्योग के लिए स्वच्छ ईंधन इस्तेमाल करना अनिवार्य कर दिया है. इसके कारण अब इस उद्योग से जुड़े कारोबारी डीजल इस्तेमाल नहीं कर पाते.
कच्चे तेल से जुड़े क्षेत्र : कच्चे तेल से जुड़े उद्योग भी दबाव में हैं. इनमें मुख्य तौर पर प्लास्टिक, रसायन, सिंथेटिक फाइबर (नायलॉन, पॉलिएस्टर), रबर, पेंट, सॉल्वेंट्स और पैकेजिंग सामग्री सहित अन्य उद्योग शामिल हैं. भारत में प्लास्टिक प्रसंस्करण उद्योग पॉलीइथिलीन, पॉलीप्रोपाइलीन और पीवीसी रेजिन जैसे कच्चे माल के आयात पर अत्यधिक निर्भर है. इनकी कुल वार्षिक खपत 2.4 करोड़ टन है, जिसमें से 80-90 लाख टन आयात किया जाता है. इसमें खाड़ी देशों से करीब 30 लाख टन आयात शामिल है.
खाड़ी देशों से आयात बाधित होने के अलावा केंद्र सरकार के 8 मार्च, 2026 के फैसले ने भी इस इंडस्ट्री पर खासा असर डाला है. सरकार ने LPG नियंत्रण आदेश के जरिए रिफाइनरियों को C3 एवं C4 हाइड्रोकार्बन (प्रोपेन, ब्यूटेन, प्रोपाइलीन और ब्यूटेन्स) को LPG उत्पादन की ओर मोड़ने के निर्देश दिए. इससे पेट्रोकेमिकल्स तथा प्लास्टिक उद्योग और अधिक प्रभावित हुए हैं.
नतीजतन, 1 से 13 मार्च के बीच घरेलू पॉलिमर उत्पादकों ने कीमतों में लगभग 50 फीसद की बढ़ोतरी की. प्लास्टिक निर्यात संवर्धन परिषद (FIEO) के क्षेत्रीय अध्यक्ष (उत्तर) अरविंद गोयनका का कहना है कि इससे पैकेजिंग सामग्री, पाइप और शैम्पू व तेल की बोतलों जैसे उत्पादों को बनाने वाले करीब 90,000 लघु एवं मध्यम उद्यम प्लास्टिक प्रोसेसर प्रभावित हुए हैं. उनका कहना है कि ये कंपनियां बढ़ी हुई लागत के कारण प्रोडक्ट को ग्राहकों तक पहुंचाने में असमर्थ हैं.
गोयनका का कहना है, “इससे कई माइक्रो यूनिट जो आमतौर पर स्टॉक नहीं रखतीं, वे बंद होने पर मजबूर हो गई हैं. जबकि कुछ बड़े खिलाड़ी मौजूदा कीमतों पर ही ऑर्डर पूरे कर रहे हैं, हालांकि उन्हें नुकसान हो रहा है.”
भारत के 13 अरब डॉलर के प्लास्टिक निर्यात में से 6-7 फीसद मध्य पूर्व को निर्यात होता है, जो कंटेनरों की कमी और माल ढुलाई लागत में वृद्धि के कारण बाधित हो गया है. गोयनका कहते हैं, “मध्य पूर्व को होने वाला सारा निर्यात रुक गया है. तैयार माल रखने वाले कई लघु एवं मध्यम उद्यम अब फंसे हुए हैं.” वे आगे कहते हैं, “यह स्थिति कोविड काल से भी अलग है, जो एक अप्रत्याशित घटना थी लेकिन धीरे-धीरे घटी. इस मामले में सब कुछ मात्र 10 दिनों के भीतर अचानक हो गया है.”
इसी तरह, स्पेशलिटी केमिकल्स और फॉर्मूलेशन फर्म काजय रेमेडीज के प्रबंध निदेशक अजय सबू का कहना है कि टोल्यूनि, बेंजीन और जाइलीन जैसे कच्चे तेल आधारित फीडस्टॉक की अनुपलब्धता के कारण इनकी कमी हो गई है. इनकी कीमतों में 40-80 फीसद की वृद्धि हुई है. वे कहते हैं, "कई कच्चे माल सऊदी अरब और चीन से आयात किए जाते थे, लेकिन उन सभी पर इसका असर पड़ा है."
सबू का कहना है कि हालांकि सरकार डीजल और पेट्रोल की कीमतों को काफी हद तक तय करती है, लेकिन कच्चे तेल पर आधारित अन्य उत्पादों की कीमतें रिफाइनरियों के जरिए निर्धारित की जाती हैं. छोटे कारोबारियों के पास बड़े आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ सौदेबाजी की शक्ति बहुत कम होती है.
निर्यात-आयात संबंधी चुनौतियां : पश्चिम एशिया भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है. खाड़ी और पश्चिमी बाजारों को आपूर्ति करने का एक प्रमुख केंद्र भी है. हालांकि, ईरान जंग के कारण सप्लाई बुरी तरह से बाधित हो गई है और माल ढुलाई को वैकल्पिक बंदरगाहों के माध्यम से भेजा जा रहा है.
दुबई का जेबेल अली बंदरगाह एशिया और मध्य पूर्व को यूरोपीय संघ और अमेरिका जैसे पश्चिमी बाजारों से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण गलियारा है. हालांकि, होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के कारण, माल को UAE के फुजैराह और खोर फक्कन जैसे छोटे बंदरगाहों की ओर मोड़ा जा रहा है, और फिर सड़क मार्ग से अंतिम स्थान तक पहुंचाया जा रहा है.
इसके कारण न केवल निर्यात लागत में भारी वृद्धि हुई है, बल्कि सामानों के भेजने में समय में भी काफी ज्यादा लग रहा है. नई दिल्ली में रहने वाले निर्यातक और टीएमए इंटरनेशनल के संस्थापक पंकज बंसल कहते हैं, “पहले, दुबई के जेबेल अली बंदरगाह से उत्पाद तीन से चार घंटे में बाजार पहुंच जाते थे, अब इसमें तीन से चार दिन लग रहे हैं. इसके कारण उपभोक्ताओं को महंगे और कम ताजे उत्पाद मिल रहे हैं.”
वे आगे कहते हैं, “सप्लाई चेन में व्यवधान के कारण बाजार में उथल-पुथल मची हुई है. ऊंची कीमतों के बावजूद खाद्य उत्पादों की मांग अधिक बनी हुई है, क्योंकि भोजन एक आवश्यक वस्तु है. हालांकि, हमें उम्मीद है कि डिस्पोजेबल आय में गिरावट के साथ मांग धीरे-धीरे कम हो जाएगी.”
बंसल का कहना है कि अगर उपभोक्ता कीमतें एक निश्चित सीमा को पार कर जाती हैं, तो मांग कमजोर हो जाएगी, जिससे खुदरा विक्रेताओं की आय प्रभावित होगी. परिणाम ये होगा कि वितरकों और थोक विक्रेताओं के पास माल का ढेर लग जाएगा, जिससे कारखानों को उत्पादन कम करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.

