7 अप्रैल की देर रात जब अमेरिका और ईरान ने दो सप्ताह के युद्धविराम की घोषणा की, तब तक भारतीय एयरलाइंस कंपनियां खाड़ी और पश्चिमी एशिया के लिए 10,000 से अधिक उड़ानें रद्द कर चुकी थीं. इन कंपनियों ने पांच सप्ताह पहले शुरू हुए सैन्य संघर्ष के बाद ही ये सभी फ्लाइट कैंसिल की हैं.
खाड़ी और पश्चिम एशिया क्षेत्र के लिए भारतीय एयरलाइंस की दैनिक उड़ानों की संख्या 300-350 राउंड ट्रिप से घटकर 90 से भी कम हो गई है. इस जंग ने भारतीय अंतरराष्ट्रीय विमानन इंडस्ट्री कोरोना महामारी से भी ज्यादा असर डाला है.
परिचालन को न्यूनतम स्तर तक सीमित कर दिया गया है और निकट भविष्य में सुधार के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं. भारतीय एविएशन इंडस्ट्री 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से ही सरकारी छूट, सरचार्ज और सरकार के जरिए नियंत्रित ईंधन मूल्य के सहारे ऑपरेट हो रही है. ऐसे में इस इंडस्ट्री के लिए युद्धविराम की घोषणा बेहद सुखद खबर की तरह है.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा से कुछ घंटे पहले, दिल्ली में एक अंतर-मंत्रालयी ब्रीफिंग में वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों ने जंग के कारण हो रहे नुकसान का वर्णन बेहद स्पष्ट शब्दों में किया. एक अधिकारी ने कहा, "भारतीय एयरलाइन कंपनियों की सभी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में से आधी उड़ानें इसी क्षेत्र के लिए होती थी. इससे उनकी आय पर निश्चित रूप से असर पड़ा है, जिसका सीधा असर एयरलाइन कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर भी पड़ता है."
फरवरी के अंत से ही विमानन क्षेत्र की आमदनी पर संकट मंडरा रहा है. देश से अंतरराष्ट्रीय उड़ान भरने वाली करीब आधे से ज्यादा विमान ऑपरेट नहीं हो रहे हैं. हवाई क्षेत्र में व्यवधान के कारण कई तरह के परिणाम सामने आए. यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली उड़ानें, जो पहले पश्चिम एशिया के ऊपर से एक सीधे मार्ग से होकर गुजरती थीं, अब ज्यादा घूमकर जाती हैं. इसके कारण भारतीय विमानों का अतिरिक्त ईंधन खर्च होता है. इतना ही नहीं पायलट और क्रू मेंबर्स को भी ज्यादा समय तक ड्यूटी करना होता है.
यही कारण है कि देश के एयरलाइन रेगुलेटर, नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने पायलटों के उड़ान कार्य समय पर लगे प्रतिबंधों में अस्थाई रूप से ढील दी है. अधिकारियों ने बताया कि यह छूट अप्रैल तक लागू रहेगा, और इसके बाद क्या होगा, इस बारे में अनिश्चितता बनी हुई है.
एक सीनियर अधिकारी ने ब्रीफिंग में कहा, “आने वाले दिनों में जो भी होगा, उसे ध्यान में रखते हुए इस व्यवस्था पर फिर से विचार किया जाएगा और अगर आवश्यक हुआ तो हम उचित निर्णय लेंगे.”
एयरलाइंस की सबसे बड़ी समस्या एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) रही है. यह उनके कुल खर्च का लगभग 40 फीसद हिस्सा है. दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने और कुछ एयरस्पेस बंद होने के कारण ATF की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ गई थीं.
सरकार ने 1 अप्रैल को घरेलू ATF की बढ़ी हुई कीमतों को कुछ कम करने के लिए दखल दिया था. अधिकारियों के अनुसार यह “ जरूरत के हिसाब से सही कदम” था. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए कोई राहत नहीं दी गई. जैसी उम्मीद थी, मार्च के मध्य में कुछ एयरलाइंस ने ATF की बढ़ोतरी को देखते हुए दूरी के आधार पर फ्यूल सरचार्ज लगाने की घोषणा कर दी थी.
1 अप्रैल के बाद इन सरचार्ज को फिर से समायोजित कर दिया गया है. अब हॉर्मुज स्ट्रेट से तेल की सामान्य आवाजाही शुरू होने की संभावना है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतें और ATF की दरें धीरे-धीरे सामान्य हो जाएंगी.
कुछ लंबी दूरी की उड़ानें जिन्हें नया रास्ता लेना पड़ा, उन्हें बीच के एयरपोर्ट पर रुककर ईंधन भरना पड़ रहा था. यह एयरलाइंस के लिए अतिरिक्त खर्च था. अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए सरकार की कोई मदद नहीं मिल रही थी. जहां भी अनुमति मिली, विदेशी एयरलाइंस को अस्थायी व्यवस्था में शामिल किया गया.
एमिरेट्स, कुवैत एयरवेज और जजीरा एयरवेज के अतिरिक्त विमानों को कार्गो सेवाओं और यात्री विमान उड़ाने की अनुमति दी गई है. इसका मकसद था कि क्षेत्र में माल ढुलाई जारी रहे, क्योंकि सामान्य लॉजिस्टिक्स पूरी तरह बिखर चुकी थी. कई देशों के एयर स्पेस बंद होने के कारण गल्फ एयर और जजीरा एयरवेज अपने घरेलू एयरपोर्ट से उड़ान नहीं भर पा रही थीं. इसलिए दोनों कंपनियों ने भारत के लिए अपनी उड़ानें सऊदी के शहर दम्माम से संचालित करना शुरू कर दीं.
अधिकारियों ने माना कि यह सब कुछ सामान्य नहीं था. फिर भी घरेलू हवाई यात्रा अच्छी चल रही थी. 6 अप्रैल को भारत में 4,70,000 ने उड़ान सेवा से यात्रा की है. पूरे देश में रोजाना 3,300 उड़ानें संचालित हो रही थीं. इसमें कोई दो राय नहीं कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को भारी नुकसान पहुंचा है, जिसे सिर्फ ATF की कीमत कम करने से ठीक नहीं किया जा सकता
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि युद्धविराम से इन क्षेत्रों में हवाई यातायात जल्दी ही बहाल हो पाएगा या नहीं. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन ने चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व में तेल उत्पादन में आई रुकावटें 2026 के अंत तक ही पहले की तरह सही और व्यवस्थित तरीके से पटरी पर लौट पाएंगी.
एयरस्पेस (आकाश क्षेत्र) बाजार के नियमों से नहीं, बल्कि देशों के फैसलों से चलता है. कुवैत और बहरीन अभी भी पूरी तरह बंद हैं. ईरान का एयरस्पेस कई महत्वपूर्ण उड़ान मार्गों के लिए बहुत जरूरी है, लेकिन वहां स्थिति ज्यादा जटिल है. ऐसा इसलिए क्योंकि ईरान का फैसला सीजफायर वार्ता पर निर्भर करेगा, जो अभी सिर्फ शुरू ही हुई है.
फिर भी, भारतीय एयरलाइन कंपनियों के लिए सीजफायर का एक बड़ा फायदा यह है कि नुकसान और बढ़ने से रुक गया है. हालांकि. इसके कारण तुरंत उन 200 के करीब रोजाना उड़ानों का संचालन शुरू नहीं हो पाएगा, जो जंग के कारण प्रभावित हुई हैं. अगर सब सही रहा तो इन विमानों का ऑपरेशन धीरे-धीरे शुरू होगा. एयरलाइंस ने जो फ्यूल सरचार्ज लगाया था, वह रातोंरात खत्म होने वाला नहीं है. हवाई क्षेत्र ने पूरे पांच हफ्ते से ज्यादा समय तक बेहद मुश्किल हालात में काम किया. नतीजे अच्छे नहीं रहे और अभी भी विमान कंपनियों को होने वाले कुल नुकसान का हिसाब लगाया जा रहा है.

