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ईरान जंग के बीच रुपए में भारी गिरावट और डॉलर के बढ़ते दबदबे का क्या है गणित?

ईरान जंग के बीच एक डॉलर की कीमत बढ़कर 94 रुपए हो चुकी है

अमेरिकी डॉलर की तुलना में रुपए
ईरान जंग के बाद डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिर रहा है
अपडेटेड 25 मार्च , 2026

फरवरी के आखिरी दिन अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर एक-एक कर हजारों मिसाइलें दागीं. इससे खाड़ी में एक नई जंग का मोर्चा खुल गया. आज इस युद्ध को शुरू हुए 24 दिन गुजर चुके हैं. इन 24 दिनों में अमेरिकी करेंसी डॉलर और क्रूड ऑयल की कीमतें आसमान छू रही हैं. वहीं, भारतीय करेंसी रुपया अब तक की सबसे तेज गिरावट से जूझ रहा है.

23 मार्च को रुपया टूटकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 94 के पार पहुंच गया. रुपए की तरह ही सोना और चांदी की कीमतों में भी गिरावट जारी है. एक अनुमान के मुताबिक, जंग के शुरुआती 12 दिनों में अमेरिका ने हर रोज युद्ध पर एक अरब डॉलर से ज्यादा खर्च किया, इसके बावजूद उसकी करेंसी मजबूत हो रही है.

आमतौर पर यह देखा गया है कि जंग किसी भी देश की आर्थिक हालत के साथ-साथ उसकी करेंसी को भी भारी नुकसान पहुंचाती है. मसलन, ईरानी रियाल ही डॉलर के मुकाबले बीते सालों में बेहद कमजोर हुआ है. ऐसे में सवाल है कि डॉलर इस मार से कैसे बचा? इसकी कीमत घटने के बजाय बढ़ कैसे गई? इन सवालों का जवाब जानने से पहले जानते हैं कि भारतीय करेंसी में क्यों और कितनी गिरावट हुई है.

ईरान जंग के बाद करीब ढाई फीसद कमजोर हुआ रुपया

इस वक्त दुनिया में सिर्फ दो ही चीजों की कीमत बढ़ रही है- क्रूड ऑयल और अमेरिकी डॉलर. जंग शुरू होने से एक दिन पहले 27 फरवरी 2026 को एक डॉलर 91.07 रुपये के बराबर था, जो 24 मार्च को बढ़कर 93.65 रुपये हो गया. इस तरह देखा जाए तो जंग शुरू होने के बाद भारतीय रुपये में 2.58 फीसद से ज्यादा की गिरावट हुई है. 20 मार्च को तो एक ही दिन में रुपये में 91 पैसे की भारी गिरावट दर्ज की गई. सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर की करेंसी में इसी तरह की गिरावट जारी है.

दरअसल, जंग शुरू होने का सीधा असर अरब देशों से सप्लाई होने वाले तेल और गैस पर पड़ा. अचानक वैश्विक बाजार में इनकी मांग बढ़ गई, जिसके कारण ब्रेंट क्रूड की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 112 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई.

वैश्विक बाजार में तेल की खरीद अमेरिकी डॉलर में होती है. हर देश तेल-गैस खरीदने के लिए अपने मुद्रा भंडार से ज्यादा डॉलर खर्च कर रहा है. ऐसे में दुनिया भर में मांग बढ़ने के कारण डॉलर मजबूत होने लगा. जैसा कि हम जानते हैं कि कीमत हमेशा बाजार तय करता है. जितनी ज्यादा मांग और जितनी कम उपलब्धता, उतनी ही उस सामान की कीमत बढ़ती है. अमेरिकी डॉलर के साथ भी यही हुआ है. डॉलर जैसे-जैसे मजबूत हुआ, दुनिया के दूसरे देशों की करेंसी इसकी तुलना में कमजोर होती चली गईं.
 

तेहरान में एक तेल डिपो पर हवाई हमले के बाद लगी आग (तस्वीर: अरिलेज़ा सोतकबार/AP)
तेहरान में एक तेल डिपो पर हवाई हमले के बाद लगी आग (तस्वीर: अरिलेज़ा सोतकबार/AP)

 

क्या आगे भी डॉलर की तुलना में रुपया गिरेगा

बैंक ऑफ अमेरिका से जुड़े बोफा ग्लोबल रिसर्च का अनुमान है कि अगर वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम नहीं हुईं, तो जून 2026 तक रुपया 94 के पार ही कारोबार करेगा. इसके बाद इसमें सुधार की संभावना कम होगी. कुछ दिनों पहले इसी संस्था ने रुपये की कीमत एक डॉलर के मुकाबले 89 तक पहुंचने का अनुमान लगाया था.

जापानी संस्था मित्सुबिशी यूएफजे फाइनेंशियल ग्रुप के मुताबिक, अगर तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार बना रहता है, तो डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत 95 से 95.50 तक पहुंच सकती है. अगर तेल की कीमत 120 डॉलर तक गई और दुनिया में ईंधन संकट गहराया, तो और ज्यादा गिरावट संभव है.

इंडिया टुडे से बात करते हुए अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85-88 फीसद हिस्सा आयात करता है, जो वित्त वर्ष 2023-24 में करीब 23.25 करोड़ मीट्रिक टन (MMT) था. ऐसे में अगर कच्चे तेल की कीमतें कम नहीं होतीं, तो एक डॉलर की कीमत 94-95 रुपये या इससे ज्यादा भी हो सकती है.
 
जंग के बीच अमेरिका के मुनाफा कमाने की क्या है असल वजह?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए पांच दशक पुराने इतिहास में जाना होगा. दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने के बाद दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने की थी. 22 जुलाई 1944 को इस चुनौती का हल निकालने के लिए अमेरिका के ब्रेटन वुड्स शहर में 44 देशों के प्रतिनिधि पहुंचे. इसी समझौते के तहत IMF (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) और विश्व बैंक की स्थापना हुई.

 

जुलाई 1944 को ब्रेटन वुड्स शहर में आयोजित बैठक की तस्वीर.
जुलाई 1944 को ब्रेटन वुड्स शहर में आयोजित बैठक की तस्वीर.

 
तब तक एक देश दूसरे देश से सामान की खरीद-बिक्री सोना देकर किया करते थे. जिस देश के पास जितना सोना होता था, वह उतनी ही कीमत की करेंसी जारी करता था. पहली बार इसी समझौते में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले सभी करेंसी का एक्सचेंज रेट तय किया गया. दरअसल, उस वक्त अमेरिका के पास दुनिया का करीब 70 फीसद सोना था. इसलिए तय हुआ कि कोई भी देश डॉलर देकर उसके बदले अमेरिका से सोना खरीद सकता है.

इतना ही नहीं, अमेरिकी अर्थव्यवस्था अन्य देशों की तुलना में ज्यादा स्थिर थी, इसलिए सभी देशों ने इस पर भरोसा किया. हालांकि, वियतनाम जंग में उलझने के बाद अमेरिकी साख पर सवाल उठने लगे. इसकी बड़ी वजह यह थी कि अमेरिका ने इस युद्ध में अरबों डॉलर खर्च कर दिए थे और वह डॉलर छापकर इस कमी की भरपाई कर रहा था.

कुछ साल बाद फ्रांस ने इस प्रणाली का विरोध शुरू कर दिया. राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल ने कहा कि वुड्स प्रणाली के कारण अमेरिका जितना चाहे पैसा छाप सकता है, लेकिन बाकी देश ऐसा नहीं कर सकते. इसके बाद फ्रांस ने महज 3 साल में 3,313 टन सोना मंगवा लिया. फ्रांस को देखकर दूसरे देश भी अचानक अमेरिका को डॉलर देकर बदले में सोना मांगने लगे.

परिणाम यह हुआ कि 1971 की शुरुआत तक अमेरिका के पास सिर्फ 10 अरब डॉलर की कीमत का सोना ही रह गया. अब साफ था कि अमेरिका डॉलर के बदले सोना नहीं दे सकता था. इससे बचने के लिए 15 अगस्त 1971 को अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने एक बड़ा फैसला लिया और डॉलर के बदले सोना देने के नियम को खत्म कर दिया.

इसके साथ ही अमेरिका ने दूसरे देशों के सामान पर 10 फीसद तक टैरिफ लगा दिया. अमेरिका के इन दो फैसलों का असर दुनिया भर के शेयर बाजारों पर देखने को मिला, जिसे ‘निक्सन शॉक’ कहा गया. इससे यूरोपीय बाजारों में 3 से 5 फीसद तक की गिरावट आई. अभी अमेरिका का संकट खत्म नहीं हुआ था कि योम किप्पुर जंग में इजराइल का समर्थन करने पर अरब देशों ने तेल पर प्रतिबंध लगा दिया.

इससे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं. 1974 में अमेरिका ने सऊदी अरब और अन्य ओपेक देशों के साथ स्थिति को संभालने के लिए एक समझौता किया. इसके तहत तय हुआ कि ओपेक देश डॉलर में तेल का सौदा करेंगे और बदले में अमेरिका उन्हें सुरक्षा देगा. यहीं से अमेरिका की 'पेट्रो डॉलर' रणनीति की शुरुआत हुई.

पेट्रो डॉलर रणनीति का अमेरिका को कैसे फायदा हुआ?

अमेरिकी अर्थशास्त्री माइकल हडसन अपनी वेबसाइट पर लिखते हैं कि पेट्रो डॉलर से अमेरिका को अत्यधिक विशेषाधिकार मिला. इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिकी करेंसी ने मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई और दुनिया भर में डॉलर की मांग बढ़ने लगी. अमेरिकी फेडरल रिजर्व को इसका भारी भू-राजनीतिक फायदा मिला.

प्रोफेसर अरुण कुमार बताते हैं कि तेल बेचने वाले देश अपने अरबों-खरबों डॉलर अमेरिका के ट्रेजरी बॉन्ड्स में इन्वेस्ट करते हैं. इसका मतलब है कि अमेरिका को बहुत कम ब्याज दर पर भारी-भरकम कर्ज मिल जाता है. इससे अमेरिका अपना बजट घाटा और विदेशी सैन्य खर्च आसानी से पूरा कर लेता है.

प्रोफेसर कुमार के मुताबिक, दुनिया का 90 फीसद से ज्यादा कारोबार डॉलर में होता है. इसी कारण इस करेंसी की मांग हमेशा बनी रहती है. वहीं, जंग जैसे हालात बनने पर यह मांग और बढ़ जाती है और डॉलर लगातार मजबूत होने लगता है.

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