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बंदूकें, लूट, धमकी और मदद की गुहार... अमेरिका में कैसा फ्रॉड कर रहे भारतीय?

वीज़ा और ग्रीन कार्ड के लिए धोखेबाज़ी के आरोप में अमेरिकी जांच एजेंसी ने 11 भारतीयों को गिरफ्तार किया है

सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 17 मार्च , 2026

आपकी इन्स्टा फीड में अक्सर ऐसी रील्स आती होंगी जिसमें कहा जाता होगा कि ‘इंडिया इज़ नॉट फॉर बिगिनर्स’. भारत में रहना सब के बस की बात नहीं है. लेकिन अब भारतीयों ने अमेरिका में ऐसा कांड कर दिया है कि वहां लोग कह रहे हैं ‘इंडियन्स आर नॉट फॉर बिगिनर्स’.

अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम में प्रवासियों के लिए बनाए गए एक नियम को कुछ भारतीयों ने ऐसा लूप होल बनाया कि वहां की कानूनी एजेंसियां भी हैरान हैं ! दरअसल अमेरिका में इमिग्रेशन सिस्टम को लेकर एक अजीब और हैरान करने वाला मामला सामने आया है.

वहां की जांच एजेंसियों ने 11 भारतीय नागरिकों को इस मामले में गिरफ्तार किया है. आरोप है कि इन लोगों ने ग्रीन कार्ड पाने के लिए एक ऐसा तरीका अपनाया जो किसी फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा लगता है. इस कथित गैंग ने नकली लूट की घटनाओं के सहारे खुद को अपराध का पीड़ित दिखाया और ग्रीन कार्ड पाने में इन घटनाओं का इस्तेमाल किया.

पहली नजर में यह मामूली धोखाधड़ी लग सकती है. लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी ये साफ होता गया कि सब कुछ बेहद सोची समझी साज़िश के तहत किया जा रहा था. अलग-अलग राज्यों में एक ही तरह की घटनाएं हो रही थीं, एक जैसे बयान दिए जा रहे थे और हर घटना का पैटर्न लगभग एक ही जैसा था.

अपराध पीड़ितों के लिए बने वीज़ा से खेल शुरू हुआ

अमेरिका में एक खास तरह का वीजा होता है जिसे कहते हैं 'यू वीज़ा (U-Visa)'. यह उन लोगों के लिए बनाया गया था जो किसी हिंसक अपराध के शिकार होते हैं और पुलिस की जांच में मदद करते हैं.

असल में इस व्यवस्था के पीछे बाहर से आकर अमेरिका में रह रहे लोगों के लिए एक मानवीय सोच थी. कई बार प्रवासी लोग जिनकी कानूनी स्थिति मजबूत नहीं होती वे अपराध का शिकार होने के बाद भी पुलिस के पास जाने से डरते हैं. हालांकि ऐसा सिर्फ अमेरिका में ही होता हो ऐसा नहीं है. भारत में भी लोग पुलिस के पास तभी जाते हैं जब और कोई विकल्प बाकी नहीं रहता. प्रवासियों के साथ ऐसा ही अमेरिका में भी होता है.

इसलिए अमेरिकी कानून ने यह रास्ता बनाया कि अगर कोई व्यक्ति अपराध को रिपोर्ट करता है और जांच में सहयोग देता है तो उसे अमेरिका में रहने की अनुमति मिल सकती है. कुछ साल बाद वही वीजा ग्रीन कार्ड का रास्ता भी खोल देता है. पीड़ित को स्टेट की तरफ से एम्पावर करने की कवायद के तौर पर यह नियम बनाया गया था. लेकिन इसी व्यवस्था में कुछ लोगों ने एक शॉर्टकट ढूंढ लिया.

लूट भी नकली और पीड़ित भी नकली 

जांच एजेंसियों के मुताबिक यह पूरा खेल बहुत सोच समझकर कई महीनों से खेला जा रहा था. मान लीजिए किसी का नाम A है. योजना के मुताबिक A किसी छोटे जनरल स्टोर में जाता. कई मामलों में दुकान के मालिक से पहले से बात हो चुकी होती. कुछ देर बाद दो-तीन लोग नकाब पहनकर दुकान में घुसते. उनके हाथ में नकली बंदूक होती. दुकान के काउंटर से ये नकाबधारी कुछ पैसा बंदूक दिखाकर ले जाते.

इस दौरान दुकान में मौजूद A डरने और मदद के लिए चिल्लाने का नाटक करता. लुटेरों के वहां से चले जाने के बाद भी सहमकर एक जगह बैठा रहता. यह पूरा नाटक इसलिए रचा जाता कि दुकान के सीसीटीवी में यह फिल्म छप जाए. दिखने में ये कहीं से भी नकली लूट नहीं दिखाई दे सकतीं. 

पुलिस को कॉल से खुला खेल 

इस नाटक का सबसे दिलचस्प हिस्सा था पुलिस को कॉल करने का तरीका. सीसीटीवी में A जानबूझकर ऐसा दिखाता जैसे उसे इतना बड़ा सदमा लगा है कि वह 10-15 मिनट अपनी जगह से नहीं हट सकता. इसके बहुत देर बाद A पुलिस को 911 पर कॉल करता और दुकान में हुई लूट को रिपोर्ट करता. इससे दो बातें हो जातीं. पहला, कि इस पूरे अपराध में A घटना का इकलौता गवाह बन जाता और दूसरा, कि घटना रिपोर्ट करके A पुलिस का मददगार साबित हो जाता. पुलिस आती, रिपोर्ट बनती, सीसीटीवी फुटेज भी मौजूद होता. इसलिए पहली नजर में सब कुछ सही लगता.

लेकिन एक बात पुलिस को खटकती कि मामले में तुरंत पुलिस को कॉल करके ख़बर क्यों नहीं की जाती. इस सवाल के जवाब में डिटेक्टिव आगे ज़रूर बढ़ते, लेकिन यहां भी इन लोगों का एक प्लान रहता था. लूट इतनी मामूली रकम की होती कि यह मामला ही बड़ा नहीं बन पाता था. सीसीटीवी में ऐसा दिखाया जाता कि A ने बंदूक सामने होने के बावजूद पूरी तरह सरेंडर नहीं किया और बदमाश शायद इससे घबराकर बहुत पैसा नहीं लूट सके. सौ या कभी पचास डॉलर कि रकम लूटी जाती.

अमेरिका में खुले बाज़ार में बिकती बंदूकें

सुलझ सके ऐसा अपराध ही नहीं होता था

ज़ाहिर सी बात है कि लोकल पुलिस मामले की जांच शुरू करती थी. 15-20 मिनट के बाद आई कॉल और पहुंचने में लगे समय के बाद लुटेरों का पता लगाना मुश्किल होता था. केंटुकी में रहने वाले प्रवासी भारतीय और पेशे से शिक्षक अनिल पाण्डेय अमरीकी ख़बरों के आधार पर इस मामले में बताते हैं, “ओपन गन कल्चर होने की वजह से यहां छिनैती वगैरह आम बात है. बल्कि लोग अलग से कुछ छुट्टे पैसे रखते हैं जिसे इस तरह के मौके पर दिया जा सके. यह बहुत बड़ी रकम नहीं होती और अक्सर नशेड़ी लोग इस तरह के काम में पाए जाते हैं. जिस मामले में अभी गिरफ्तारियां हुई हैं इसमें जिन लूट की घटनाओं को रिपोर्ट किया जाता था उसमें बेहद छोटी रकम की वजह से पुलिस इन लुटेरों को गंभीरता से नहीं लेती थी और ऐसा मान कर चलती थी कि ये नए लड़कों का काम है. शायद यही वजह रही होगी कि पुलिस इन फर्जी लूटों का मामला शुरुआत में ही सुलझा नहीं पाई” 
इन ज्यादातर मामलों में कुछ दिन बाद जांच ठंडे बस्ते के हवाले हो जाती थी.

लेकिन दूसरी तरफ कथित पीड़ित के पास एक मजबूत दस्तावेज तैयार हो जाता. एक दर्ज अपराध, पुलिस रिपोर्ट और ये दावा कि उसने जांच में सहयोग किया है. यही वो कागज हैं जिसके सहारे U-Visa के लिए आवेदन किया जाता रहा.

लेकिन फिर खेल खुल गया

अमेरिकी एजेंसियों को इस पूरे खेल का शक तब हुआ जब अलग-अलग राज्यों में एक जैसी घटनाएं सामने आने लगीं. Massachusetts, Missouri, Kentucky और Ohio जैसे राज्यों में दर्ज मामलों को जब एक साथ देखा गया तो तस्वीर साफ होने लगी.

हर जगह लगभग वही कहानी थी. नकली हथियार, छोटी रकम की लूट, सीसीटीवी फुटेज और कुछ मिनट बाद की गई 911 कॉल. यहां तक कि पीड़ितों के बयान भी लगभग एक जैसे लगते थे जैसे किसी ने उन्हें एक स्क्रिप्ट दे दी हो. यहीं से जांच की दिशा बदल गई.

जांच एजेंसियों ने इन घटनाओं का डेटा खंगाला. कॉल रिकॉर्ड, घटनाओं का समय, बयान सब कुछ मिलाकर देखा गया. धीरे-धीरे पता चला कि अलग-अलग शहरों में हुई घटनाओं के पीछे एक ही तरह की योजना काम कर रही थी. कई लोग एक-दूसरे को जानते थे या एक ही प्रवासी नेटवर्क से जुड़े थे. इसके बाद अधिकारियों ने कार्रवाई की और 11 भारतीय नागरिकों को गिरफ्तार किया गया.

मामले में क्या है गुजरात कनेक्शन?

मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि गिरफ्तार किए गए कई लोग गुजरात से जुड़े हुए हैं. जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या यह पूरा खेल किसी बड़े इमिग्रेशन रैकेट का हिस्सा था. इस एंगल से भी जांच की जा रही है कि क्या इस नेटवर्क का कोई हिस्सा भारत में काम कर रहा है? जो अमेरिका जाने का सपना देखने वाले लोगों को एजेंटों और बिचौलियों के जाल में फंसाता है. ये बिचौलिए इन लोगों को तरह-तरह के “आसान रास्ते” दिखाते हैं. संभव है कि इस मामले में भी ऐसा ही कोई नेटवर्क काम कर रहा हो.

सजा कितनी हो सकती है?

अमेरिकी अभियोजकों ने आरोपियों पर वीजा फ्रॉड और आपराधिक साजिश के आरोप लगाए हैं. अगर अदालत में आरोप साबित होते हैं तो उन्हें चार से सात साल तक जेल की सजा हो सकती है. इसके अलावा भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है. इमिग्रेशन कानून के तहत भविष्य में अमेरिका में प्रवेश पर भी रोक लग सकती है.

अपने पांव पर कुल्हाड़ी है ये फ्रॉड?

यह मामला सिर्फ 11 भारतीयों की गिरफ्तारी की कहानी नहीं है. ये उस सिस्टम की भी परीक्षा है जिसे मूल रूप से पीड़ितों की मदद के लिए बनाया गया था. U-Visa जैसे प्रावधान उन लोगों के लिए हैं जो सचमुच अपराध का शिकार होते हैं और न्याय की प्रक्रिया में मदद करते हैं. लेकिन अगर ऐसे प्रावधानों का दुरुपयोग बढ़ता है तो इससे असली पीड़ितों के लिए रास्ता और मुश्किल हो सकता है. अनिल कहते हैं कि "यहां अमेरिका में भारतीयों की छवि मेहनत से काम करने वाले और ग़ैर-ज़रूरी मामलों में दखल ना देने वाले प्रवासियों की है. जिसका बहुत असर पड़ता है.

लेकिन इधर बीच शुरू हुए डिजिटल फ्रॉड और अब इस तरह के इमिग्रेशन फ्रॉड ने देश की छवि को नुकसान पहुंचाया है, जिसका नतीजा अंततः यहां रह रहे कामकाजी प्रवासियों को ही भुगतना पड़ता है. सोशल मीडिया पर गुजरात के लोगों को एक खास नाम से बुलाया जाता है और अब वही नाम लेकर इस मामले में भारतीयों की हंसी उड़ाई जा रही है जो कतई ठीक नहीं है"

यह ये बात ठीक है कि इस तरह के मामले देश की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं. इसका नतीजा अमेरिका में रह रहे प्रवासी भारतीयों को ही अंततः भुगतना पड़ता है. इस मामले में भारत सरकार की तरफ से अब तक आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है. लेकिन अमेरिका में रह रहे भारतीय प्रवासियों को उम्मीद है कि भारत सरकार इस मामले पर अपना रुख साफ करेगी.

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