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शादीशुदा लोगों के लिव-इन रिलेशनशिप पर बढ़ रही कानूनी उलझन

इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो विरोधाभासी फैसलों से सवाल उठ रहा है कि क्या लिव-इन कपल्स को दी जाने वाली पुलिस सुरक्षा कानूनी रूप से विवाहित जीवनसाथी के अधिकारों का हनन करेगी?

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 15 अप्रैल , 2026

पिछले महीने कुछ ही दिनों के अंदर लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर दो बिल्कुल उलट फैसले आए. इन फैसलों ने लिव-इन को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों के बीच गहरी असहमति को सामने ला दिया.

दोनों मामले शादीशुदा लोगों के लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े थे. दोनों में पुलिस सुरक्षा मांगी गई थी. दोनों ही मामले में सहमति वाले वयस्क शामिल थे, लेकिन फिर भी दोनों फैसले एक ही बुनियादी सवाल पर बिल्कुल विपरीत थे.

इन दोनों ही मामले में जजों के सामने यह सवाल उठा कि क्या राज्य को ऐसे रिश्तों की रक्षा करनी चाहिए, या ऐसा करने से कानूनी रूप से शादीशुदा जीवनसाथी के अधिकारों पर अतिक्रमण होता है? इन सवालों का जवाब तलाश कर कोर्ट को फैसला सुनाना था.

यह विरोधाभास भारतीय समाज में हो रहे बड़े बदलाव को दिखाता है. आजकल लिव-इन रिलेशनशिप ज्यादा दिखने लगे हैं, लेकिन शादी अभी भी कानूनी रूप से सबसे ऊपर मानी जाती है. इन फैसलों से साफ है कि कानून इन बदलते रिश्तों के साथ तालमेल बिठाने के लिए संघर्ष कर रहा है.

एक ही अदालत में दो आदेश, दो सिद्धांत

यह विवाद 25 मार्च को शुरू हुआ, जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के जैतिपुर के एक मामले में सुनवाई शुरू की. इसमें एक 18 साल की लड़की और एक शादीशुदा आदमी ने पुलिस सुरक्षा की याचिका लगाई थी. लड़की के परिवार ने पुलिस में FIR दर्ज कराई थी.

उन पर आरोप लगाया गया कि शादीशुदा आदमी ने लड़की को फुसलाया था. परिवार वालों का आरोप था कि शादीशुदा व्यक्ति का दूसरी औरत के साथ रहना अपराध है. ऐसे मामलों में अक्सर अपहरण या बलात्कार जैसे गंभीर धाराएं लगा दी जाती हैं.

इस मामले में पीठ का रुख स्पष्ट था. अदालत ने कहा कि वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने लिव-इन रिलेशनशिप को, भले ही उनमें से एक विवाहित हो, अपराध नहीं ठहराया जा सकता. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने इस मुद्दे को राज्य के दायित्व के रूप में प्रस्तुत किया. पीठ ने कहा, "ऐसे जोड़ों की रक्षा करना राज्य का मूलभूत कर्तव्य है."

इस फैसले के महज तीन दिन बाद, 28 मार्च को न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ के सामने भी एक लिव-इन का मामला पहुंचा. इस केस भी एक शादीशुदा व्यक्ति से जुड़ा था. इस मामले में कोर्ट ने बिल्कुल अलग रुख अपनाया. पहले से विवाहित और तलाक नहीं लेने के बावजूद लिव-इन में रह रहे एक कपल की याचिका पर सुनवाई करते हुए, अदालत ने सुरक्षा प्रदान करने से इनकार कर दिया. कोर्ट का तर्क यह था कि "अगर कोई पुरुष पहले से विवाहित है, तो वह अपनी पत्नी को तलाक दिए बिना किसी महिला के साथ लिव-इन में नहीं रह सकता."

अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में रिट जारी करना पति-पत्नी के कानूनी अधिकारों का उल्लंघन होगा, जिन्हें वैवाहिक जीवन में साथ रहने का अधिकार है. न्यायमूर्ति सिंह ने तर्क दिया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता विवाह के वैधानिक और नैतिक ढांचे से ऊपर नहीं हो सकती. हालांकि, दंपति हिंसा की आशंका होने पर पुलिस से संपर्क करने के लिए स्वतंत्र थे. अदालत ने इस "अवैध संबंध" को वैध ठहराने से इनकार कर दिया.

पूर्व उदाहरणों का एक मिला-जुला रूप

यह उतार-चढ़ाव देश में न्यायिक सोच की विविधता को दिखाता है. सुप्रीम कोर्ट वर्षों से वयस्क लोगों की स्वतंत्रता की रक्षा करने की बात करता रहा है. एस. खुशबू बनाम कनियम्मल अन्य के मामले में कोर्ट ने सहमति से वयस्क व्यक्तियों के लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के अधिकार को बरकरार रखा था. इस बात पर जोर देते हुए कि नैतिकता को आपराधिक कानून के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता, अदालत ने ऐसे विकल्पों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता और स्वतंत्रता के दायरे में रखा था.

हालांकि, इस तरह के मामले में अदालत ने कुछ सीमाएं भी तय की हैं. इंद्र शर्मा बनाम वी.के.वी. शर्मा मामले में अदालत ने लिव-इन रिलेशनशिप की विभिन्न श्रेणियों को मान्यता दी, लेकिन स्पष्ट किया कि इन्हें अपने आप ही विवाह का कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं हो जाता. विशेषकर तब जब एक साथी पहले से ही विवाहित हो. अदालत ने कहा कि ऐसे रिश्तों पर दो-विवाह के प्रावधानों के तहत मुकदमा भी चलाया जा सकता है.

हाईकोर्टों ने भी इसी प्रकार के मामले में अलग-अलग फैसले सुनाए हैं. लक्ष्मी नारायण राउत बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में, बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक विवाहित पुरुष और एक अविवाहित महिला को संरक्षण देने से इनकार कर दिया. साथ ही चेतावनी दी कि ऐसा करना पत्नी के अधिकारों का अतिक्रमण होगा.

इसके उलट, मद्रास हाईकोर्ट ने जलाला मोहम्मद काजा मोहिदीन बनाम केके मोहम्मद इब्राहिम के मामले में सहमति को प्राथमिकता दी. कोर्ट ने कहा कि एक ऐसे दंपत्ति को संरक्षण प्रदान किया जाए, जिसमें पुरुष विवाहित होते हुए भी अलग रह रहा हो.

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने हरप्रीत कौर बनाम पंजाब राज्य के मामले में मध्य मार्ग अपनाने का प्रयास किया. इस मामले में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली विवाहित महिला को संरक्षण प्रदान किया गया, लेकिन उसे तलाक की कार्यवाही शुरू करने के निर्देश भी दिए गए.  

इस पूरे मामले में अब भी एक सरल लेकिन अनसुलझा सवाल है. क्या अदालतों को ऐसे दंपतियों को संरक्षण देने से पहले तलाक पर जोर देना चाहिए? भारतीय व्यक्तिगत कानूनों के तहत, चाहे वह 1955 का हिंदू विवाह अधिनियम हो या अन्य. विवाह से लागू करने योग्य अधिकार और दायित्व उत्पन्न होते हैं. इसे अनौपचारिक रूप से भंग नहीं किया जा सकता.

एक वैध विवाह पति या पत्नी को सहवास, साथ रहने और वफादारी का कानूनी अधिकार देता है. कोई भी समानांतर संबंध, इन अधिकारों को कमजोर करने का जोखिम पैदा करता है. हालांकि, इसके विपरीत सोचने वाले वाले लोगों का तर्क भी उतना ही मजबूत है.

ऐसे लोगों का मानना है कि अनुच्छेद 21 में नैतिक शर्तें नहीं जोड़ी गई हैं. न्यायालयों ने बार-बार यह माना है कि सहमति से संबंध बनाने वाले वयस्कों को अपने साथी चुनने का अधिकार है. भले ही यह चुनाव सामाजिक रूप से अस्वीकार्य हो या कानूनी रूप से पेचीदा हो. ऐसे मामलों में सुरक्षा से वंचित करना दंपतियों को हिंसा के खतरे में डाल सकता है, जिसमें सम्मान के नाम पर प्रतिशोध भी शामिल है.

यह तनाव अक्सर आपराधिक घटनाओं के तौर पर सामने आते हैं. परिवार अक्सर अपहरण या बलात्कार की धाराओं के तहत FIR दर्ज कराते हैं, ताकि ऐसे रिश्तों को तोड़ा जा सके. भले ही महिला बालिग हो और स्वेच्छा से ऐसा कर रही हो. कई मामलों में अदालतों ने इन कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए हस्तक्षेप किया है, लेकिन विवाह से जुड़े मामलों में कोई सुसंगत ढांचा मौजूद नहीं है.

बदलती सामाजिक परिस्थितियों के कारण कानूनी अस्पष्टता और भी बढ़ जाती है. जनगणना प्रणाली दीर्घकालिक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों को स्वयं को "स्थिर संबंध" में दर्ज करने की अनुमति देती है. इससे व्यवहार में विवाह और सहवास के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है.

वहीं, दूसरी ओर राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े हर साल भागकर विवाह के हजारों मामले दिखाते हैं, जिनमें से कई लिव-इन रिलेशनशिप के रूप होते हैं. राजस्थान जैसे राज्यों में यह विभाजन विशेष रूप से स्पष्ट है. निचली अदालतों ने अक्सर रूढ़िवादी दृष्टिकोण अपनाया है और वैवाहिक अधिकारों का हवाला देते हुए विवाहित जोड़ों से जुड़े मामलों में संरक्षण देने से इनकार कर दिया है. फिर भी कई अन्य मामलों में जैसे कि अंतर-जातीय या अंतर-धार्मिक संबंधों में, अदालतों ने सामाजिक मानदंडों का उल्लंघन करने वाले संबंधों के बावजूद भी जोड़ों को हिंसा से बचाने के लिए हस्तक्षेप किया है.

आगे का रास्ता

लिव-इन के एक जैसे मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अलग-अलग फैसलों से यह बात स्पष्ट होती है कि न्यायपालिका इस मुद्दे पर किसी एक मत के अभाव में है. अदालत की एक पीठ स्वायत्तता और राज्य के संरक्षण के कर्तव्य को प्राथमिकता देती है. वहीं, दूसरी पीठ विवाह की पवित्रता और उससे प्राप्त अधिकारों को प्राथमिकता देती है. यह स्थिति टिकाऊ नहीं है. ऐसे में साफ है कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट मार्गदर्शन या विधायी हस्तक्षेप के बिना, निचली अदालतें असंगत फैसले देती रहेंगी, जिससे दंपत्तियां अनिश्चितता और अक्सर असुरक्षित स्थिति में रहेंगी.

इसके लिए स्पष्टता आवश्यक है. न्यायालय दो प्रश्नों को अलग-अलग देख सकते हैं: संबंध की वैधता और नुकसान से सुरक्षा की आवश्यकता. भले ही कोई संबंध कानूनी रूप से अस्पष्ट हो, हिंसा को रोकने का राज्य का कर्तव्य नैतिक स्वीकृति पर निर्भर नहीं होना चाहिए. साथ ही, पति-पत्नी के अधिकारों को मान्यता देने का अर्थ है कि न्यायालय तलाक जैसी उचित प्रक्रिया के बिना समानांतर संबंधों को वैध नहीं ठहरा सकते.

फिलहाल, व्यवस्था दोनों काम करने की कोशिश कर रही है और नतीजा यह है कि वह बंटी हुई है. जब तक यह स्थिति नहीं बदलती, भारत की अदालतों का संदेश विरोधाभासी ही रहेगा. आपको अपना जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता तो है, लेकिन कानून आपका साथ देगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आप किस अदालत में जाते हैं.

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