जनवरी की 6 तारीख को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने अपनी संशोधित गाइडलाइंस का मसौदा पेश किया. इसमें कई बदलावों की बात कही गई है, लेकिन जिस मुद्दे को लेकर मामला बढ़ता जा रहा है वो विश्वविद्यालय के कुलपतियों (वाइस चांसलर या VC) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर है. अभी तक VC के पद पर नियुक्त होने के लिए जो अहर्ताएं हैं, उनमें उम्मीदवार को एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद् होना जरूरी है जिनके पास प्रोफेसर के रूप में या रिसर्च लीडरशिप की भूमिका में कम से कम दस साल का अनुभव हो.
लेकिन नए मसौदे में VC के पद के लिए प्रोफेसर होना जरूरी नहीं है. इसके तहत वैसे लोग भी अब VC बन सकते हैं जिनके पास इंडस्ट्री, लोक प्रशासन या सरकारी क्षेत्र में कम से कम दस साल काम करने का अनुभव हो और जो शिक्षा या शोध के क्षेत्र में अहम योगदान देने का ट्रैक रिकॉर्ड रखते हों. हालांकि इस बदलाव की कुछ लोगों ने आलोचना की है. केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि यह संघ परिवार (RSS) के लोगों को विश्वविद्यालय प्रशासन के शीर्ष पदों पर लाने का एक शॉर्टकट तरीका है.
यूजीसी का प्रस्तावित नया मसौदा कहता है कि सेंट्रल एक्ट, प्रोविंशियल एक्ट या स्टेट एक्ट के तहत स्थापित सभी विश्वविद्यालयों में VC के चयन के लिए अब सर्च-कम-सेलेक्शन कमिटी अनिवार्य होगी. कुलाधिपति (चांसलर) या विजिटर इस कमिटी का गठन करेंगे, जिसमें VC की नियुक्ति के लिए तीन एक्सपर्ट शामिल होंगे. जहां राष्ट्रपति सभी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के पदेन विजिटर होते हैं, वहीं संबंधित राज्यों के राज्यपाल सभी स्टेट यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति की भूमिका निभाते हैं.
इससे पहले यूजीसी की 2018 की गाइडलाइंस में कहा गया था कि कुलपति के पद के लिए चयन एक सर्च-कम-सेलेक्शन कमिटी द्वारा गठित 3-5 व्यक्तियों के एक पैनल द्वारा किया जाना चाहिए. हालांकि उसमें यह साफ नहीं था कि कमिटी का गठन कौन करेगा, राज्यपाल करेंगे या फिर सरकार पर इसकी जिम्मेदारी होगी. होता यह था कि स्टेट कैबिनेट नामों की सिफारिश करता था जिन पर राज्यपाल मुहर लगाते थे. लेकिन बाद में कई ऐसी घटनाएं सामने आईं जिनमें राज्यपालों ने चांसलर के रूप में अपने खुद के उम्मीदवारों को नॉमिनेट करना शुरू कर दिया. इससे राज्य सरकारों के साथ उनके टकराव की स्थिति पैदा हुई.
हालांकि अब नए मसौदे में स्पष्ट किया गया है कि चयन समिति की नियुक्ति चांसलर या कुलाधिपति करेंगे और यह प्रक्रिया स्टेट यूनिवर्सिटी पर भी लागू होगी. गाइडलाइंस में राज्यपाल का साफ जिक्र नहीं है, बस इतना कहा गया है कि कुलाधिपति चयन समिति की नियुक्ति करेंगे. चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता के लिए समाचार पत्रों में विज्ञापन और सरकारी अधिसूचनाएं प्रकाशित की जाएंगी. इसमें यह भी साफ किया गया है कि जो विश्वविद्यालय इन दिशानिर्देशों को लागू करने में नाकाम होंगे, उन्हें यूजीसी की योजनाओं से बाहर कर दिए जाने का खतरा रहेगा. साथ ही, नियम न मानने पर डिग्री कार्यक्रमों की पेशकश की पात्रता भी समाप्त हो सकती है.
जाहिर है कि नए मसौदे की गाइडलाइंस चांसलर के रूप में राज्यपालों को अधिक ताकतवर बनाती है. इसके तहत अब कुलाधिपति का VC के सिलेक्शन प्रोसेस पर अधिक नियंत्रण होगा और VC की नियुक्तियों में अंतिम फैसला उनका ही होगा. इससे परंपरागत रूप में कुलपतियों के चयन में राज्यों की भूमिका कम होती दिखती है.
यही वजह है कि केरल के सीएम विजयन ने 8 जनवरी को एक बयान में नए मसौदा नियमों की आलोचना करते हुए कहा कि यह उच्च शिक्षा के क्षेत्र में राज्यों के अधिकारों को पूरी तरह से समाप्त करने के एजेंडे का हिस्सा है. उन्होंने आरोप लगाया कि यह यूजीसी और केंद्र सरकार द्वारा लागू की गई "व्यावसायीकरण, सांप्रदायिकरण और केंद्रीकरण की नीतियों" का ही विस्तार है. उन्होंने कहा कि कुलपतियों के चयन पर कुलाधिपतियों को अधिक नियंत्रण देने का प्रस्ताव संघवाद के सिद्धांतों के खिलाफ है और संविधान के बुनियादी उसूलों का उल्लंघन करता है.
सीएम विजयन ने कहा, "यह संघ परिवार के लोगों को विश्वविद्यालय प्रशासन के शीर्ष पर लाने का एक शॉर्ट कट रास्ता है. राज्यों के अधिकारों पर अतिक्रमण का कड़ा विरोध हो रहा है. मैं देश की सभी डेमोक्रेटिक ताकतों से अनुरोध करता हूं कि वे यूजीसी मसौदा गाइडलाइंस में संघ परिवार के एजेंडे के खिलाफ सामने आएं."
इससे पहले वामपंथी विचारधारा वाले स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) ने भी नए मसौदे का विरोध किया था. 7 जनवरी को एक बयान में एसएफआई ने कहा,"मसौदे में पहली बार इंडस्ट्री स्पेशलिस्ट और सरकारी क्षेत्र के सीनियर लोगों को कुलपति की भूमिका के लिए विचार करने की अनुमति दी गई है. यह विशेष रूप से शिक्षाविदों की नियुक्ति की लंबे समय से चली आ रही प्रथा से अलग है और शैक्षणिक क्षेत्र में कॉर्पोरेट संस्कृति का परिचय देता है. यह एक मुख्य विषय में विशेषज्ञता को खत्म करके फैकल्टी की गुणवत्ता को बहुत कमजोर कर देगा और भर्ती में चयन समिति को 100 फीसद महत्व दिया जाएगा जो प्रकृति में सब्जेक्टिव है और शैक्षणिक योग्यता, शोध प्रकाशनों और शिक्षण अनुभव को कोई क्रेडिट नहीं देता."
नए मसौदे में VC के चयन के लिए जिस सर्च-कम-सिलेक्शन कमिटी की बात की गई है उनमें तीन सदस्य शामिल होंगे. इनमें एक विजिटर/कुलाधिपति द्वारा नामित व्यक्ति होगा, जो अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा. दूसरा व्यक्ति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष द्वारा नामित होगा जबकि तीसरा यूनिवर्सिटी के शीर्ष निकाय, जैसे सिंडिकेट, सीनेट, कार्यकारी परिषद, प्रबंधन बोर्ड या समकक्ष निकाय का कोई नामित व्यक्ति होगा.
जहां तक नए मसौदे में कुलाधिपतियों को अधिक शक्ति देने की बात है तो अधिकांश राज्यों में राज्यपाल स्टेट यूनिवर्सिटी के पदेन कुलाधिपति के रूप में कार्य करते हैं. यह बात सही है कि राज्यपाल के रूप में वे मंत्रिपरिषद् की सलाह के आधार पर काम करते हैं. लेकिन एक कुलाधिपति के रूप में वे विश्वविद्यालयी मामलों में स्वतंत्र रूप से फैसले लेने में सक्षम हैं.
हालांकि पूर्व में कई ऐसे मामले सामने आए जब एकेडमिक नियुक्तियों को लेकर राज्यों और कुलाधिपतियों के बीच टकराव देखने को मिला. साल 2023 में तमिलनाडु विधानसभा ने दो विधेयक पारित किए, जो 13 स्टेट यूनिवर्सिटी के कुलपतियों की नियुक्ति में राज्यपाल की शक्ति को राज्य सरकार को ट्रांसफर करने की बात करते थे. उससे पहले, पश्चिम बंगाल में भी राज्यपाल के स्थान पर मुख्यमंत्री को सभी राज्य संचालित विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति बनाने की मांग करने वाला एक विधेयक 2022 में विधानसभा द्वारा पारित किया गया था.
केरल में भी सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाली सरकार ने 2023 में राज्यपाल को स्टेट यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति के पद से हटाने की मांग की थी, और राज्य विधानसभा ने इस आशय का एक विधेयक भी पारित किया था. उस समय राज्य के गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान थे, जिनका राज्य सरकार के साथ उच्च शिक्षा के अलावा अन्य मसलों पर विवाद लगातार चल रहा था. राज्यपाल ने विधेयक को राष्ट्रपति के पास भेज दिया था, जिन्होंने अभी तक इस पर अपनी सहमति नहीं दी है.
असल में केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में स्टेट यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति राज्यपाल ही हैं. इन राज्यों में गैर-बीजेपी सरकार है और इन राज्यों को लगता है कि केंद्र सरकार यानी बीजेपी इन नए नियमों के जरिए राज्यपालों को अधिक शक्ति देकर वहां के विश्वविद्यालय प्रशासन में पूर्ण दखल रखना चाहती है. राज्यपालों की नियुक्ति केंद्र सरकार ही करती है.
देखा जाए तो शिक्षा समवर्ती सूची का एक विषय है जिसपर केंद्र और राज्य दोनों ही कानून बना सकते हैं. ऐसे में कई राज्यों, जहां उच्च शिक्षा को लेकर उनके अपने विशिष्ट कानून हैं वहां अक्सर केंद्र और राज्यों के बीच टकराहट देखने को मिलती है.
हालांकि, केंद्रीय सूची की प्रविष्टि 66 उच्च शिक्षा संस्थानों में मानकों के समन्वय और निर्धारण पर केंद्र को महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करती है, जो इस बात को साफ करती है कि जहां भी इन मसलों पर राज्य और केंद्र के बीच कानूनों में टकराहट होगी, वहां केंद्रीय कानून सर्वोच्च होंगे. यूजीसी इन मानकों को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाता है, जिसमें विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में नियुक्तियों से संबंधित मानक भी शामिल हैं.