28 अप्रैल को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) से अलग होने की घोषणा की, जिससे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में हलचल मच गई.
अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पहले से ही वेस्ट एशिया में जारी जंग और होर्मुज स्ट्रेट बंद होने के कारण दबाव का सामना कर रहा है. ऐसे में UAE के इस फैसले से तेल उत्पादक देशों पर भी गंभीर असर पड़ने की संभावना है.
UAE अब तक OPEC में तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक (31.2 लाख बैरल प्रति दिन) देश था. अब UAE ने इस संगठन से बाहर निकलने की घोषणा करते हुए कहा, "OPEC से बाहर निकलने का यह फैसला हमारे लंबे समय के रणनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों तथा बदल रही ऊर्जा नीति के अनुरूप है." UAE ने कहा कि अब उसे अपने देश में ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने और बाजार के मुताबिक अपनी मर्जी से फैसले लेने के लिए ज्यादा आजादी चाहिए.
इसका मतलब यह है कि UAE का मानना है कि इस संगठन से बाहर निकलकर वह तेल उत्पादन के अपने स्तर को निर्धारित करने में सक्षम होगा और OPEC के सामूहिक निर्णय से बंधा नहीं रहेगा. दरअसल, तेल की कीमतों को बढ़ाने के प्रयास में तेल उत्पादन पर सीमाएं तय करने की दुनियाभर में आलोचना होती रही है.
हालांकि, UAE के इस फैसले के पीछे आर्थिक पहलू से कहीं ज्यादा दूसरे कारण हो सकते हैं. ऊर्जा बाजार के जानकारों को पहले से ही इसका अंदाजा था, क्योंकि OPEC में सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश सऊदी अरब (94.8 लाख प्रति दिन) और संयुक्त अरब अमीरात के बीच खाई लगातार गहरी होती जा रही है. खबरों के मुताबिक, यमन और सूडान के साथ-साथ उत्तरी अफ्रीका में भी इन दोनों देशों के हित आपस में टकराते हैं.
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के अन्य देशों के साथ संबंध तनावपूर्ण हो गए, क्योंकि ईरान ने मौजूदा संघर्ष में उस पर भारी बमबारी की. जंग के पहले 40 दिनों में ईरान ने UAE पर लगभग 2,800 मिसाइलें और ड्रोन दागे, जिनमें उसके तेल-गैस स्थलों के साथ-साथ कुछ नागरिक ठिकानों को भी निशाना बनाया गया. इन हमलों पर खाड़ी देशों की प्रतिक्रिया को लेकर UAE में असंतोष बढ़ता जा रहा था.
दरअसल, दशकों से OPEC तेल की कीमतों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता रहा है और जब तक और देश इस समूह से अलग नहीं हो जाते, तब तक यह सिलसिला जारी रहने की संभावना है. इस समूह में 13 देश शामिल थे: अल्जीरिया, अंगोला, कांगो गणराज्य, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया, नाइजीरिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और वेनेजुएला.
ये सभी देश मिलकर विश्व की 40 फीसद तेल आपूर्ति को नियंत्रित करते हैं. संयुक्त अरब अमीरात आधिकारिक तौर पर 1967 में ओपेक में शामिल हुआ था.
विश्व के तेल भंडार का करीब 80 फीसद हिस्सा भी OPEC सदस्य देशों में स्थित है, जिसमें से अधिकांश (64.5 फीसद) मध्य पूर्व में है. तेल उत्पादन और आपूर्ति पर अपने व्यापक प्रभाव के कारण, 1960 में स्थापित OPEC का तेल की कीमतों पर काफी नियंत्रण है. उत्पादन को सीमित करके, यह समूह कीमतों में वृद्धि कर सकता है, जिससे सदस्य देशों को भारी मुनाफा होता है.
हालांकि, हाल के समय में ओपेक का प्रभाव कमजोर हो रहा था. अमेरिका, कनाडा और चीन सहित गैर-ओपेक देशों का वैश्विक तेल उत्पादन पर 60 फीसद से अधिक का नियंत्रण है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका OPEC का कड़ा आलोचक रहा है. ट्रंप ने OPEC पर तेल उत्पादन पर प्रतिबंध लगाकर दुनिया को लूटने का आरोप लगाया था.
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, UAE का यह कदम उपभोक्ताओं और व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक है. अबू धाबी कमर्शियल बैंक (ADCB) की मुख्य अर्थशास्त्री मोनिका मलिक ने कहा, "भू-राजनीतिक स्थिति सामान्य होने पर यह कदम संयुक्त अरब अमीरात के लिए वैश्विक बाजार में हिस्सेदारी हासिल करने का दरवाजा खोलता है."
ऊर्जा अनुसंधान फर्म रायस्टैड के विश्लेषक जॉर्ज लियोन ने UAE के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि सऊदी अरब के अलावा संयुक्त अरब अमीरात उन कुछ OPEC सदस्य देशों में से एक है, जिनके पास अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है. यह क्षमता उसे बाजार में अतिरिक्त तेल उपलब्ध कराने में सक्षम बनाती है.
उन्होंने कहा, "समूह से बाहर, UAE के पास उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन और क्षमता दोनों होगी, जिससे बाजार के केंद्रीय स्टेबलाइजर के रूप में सऊदी अरब की भूमिका की स्थिरता के बारे में व्यापक प्रश्न उठते हैं."
OPEC से UAE के बाहर निकलने का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
अमेरिका और चीन के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है. अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 89 फीसद भारत आयात करता है. अगर ओपेक कमजोर होता है और कीमतें बढ़ाने में असमर्थ रहता है, तो इससे भारत जैसे देशों को फायदा हो सकता है. पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के चलते कच्चे तेल की कीमतें पहले ही 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं. 30 अप्रैल को ब्रेंट क्रूड की कीमतें 114 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर थीं.
कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से भारत का आयात बिल बढ़ेगा और देश का चालू खाता घाटा भी बढ़ेगा. विशेषज्ञों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में 1 डॉलर की वृद्धि से भारत का वार्षिक आयात बिल लगभग 1.5 अरब डॉलर से 2 अरब डॉलर तक बढ़ जाता है. भारत ने 2025-26 में लगभग 2453 लाख टन कच्चे तेल का आयात किया था.
इस जनवरी में, भारत के कच्चे तेल आयात में खाड़ी देशों के तेल की हिस्सेदारी बढ़कर 55 फीसद (लगभग 27.4 लाख प्रति दिन) हो गई, जो 2022 के अंत के बाद से उच्चतम स्तर है. ऐसा इसलिए क्योंकि रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खपत कम कर दी थी.
डेटा एनालिटिक्स फर्म केप्लर के मुताबिक, भारत चौथा सबसे बड़ा LNG आयातक है, अपनी आपूर्ति का लगभग दो-तिहाई हिस्सा कतर, यूएई और ओमान से खरीदता है. जंग के दौरान मध्य पूर्व पर भारत की ऊर्जा निर्भरता महंगी साबित हुई है, क्योंकि इसकी गैस आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई.

