अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल आयात करने वाले देशों पर 500 फीसद तक टैरिफ लगाने की धमकी दी है. इसके लिए उनकी सरकार ने एक बिल का समर्थन किया है, जिसे जल्द संसद में पेश किया जाएगा.
ट्रंप की इस धमकी के बाद भारत ने रूसी कच्चे तेल का आयात काफी कम कर दिया है. हालांकि, कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि रूस से तेल आयात बंद करने से भारत पर कोई खास असर नहीं पड़ने की संभावना है.
ऐसा इसलिए क्योंकि भारत पहले से ही अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व (इराक, सऊदी अरब आदि) जैसे करीबी देशों से पूरा करता रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं कि लंबे समय में इससे भारत का आयात बिल काफी बढ़ सकता है क्योंकि रूसी तेल सस्ता था.
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के 500 फीसद टैरिफ की घोषणा का भारत पर दो तरह से फिलहाल असर होता दिख रहा है. पहला तो ये कि अमेरिका के साथ चल रही ट्रेड डील में अब और थोड़ी और देरी हो सकती है. दूसरा असर ये हो सकता है कि अमेरिका के जरिए भारत पर लगाए गए 50 फीसद टैरिफ को कम करने में मदद करने वाले किसी भी समझौते में और देरी हो सकती है.
भारत अपनी तेल आवश्यकता का लगभग 90 फीसद तेल आयात करता है. भारत ने वित्त वर्ष 2025 में विभिन्न देशों से 161 अरब डॉलर मूल्य का तेल आयात किया. पिछले कुछ सालों से भारत को तेल का सबसे बड़ा निर्यातक देश रूस था. रूस ने वित्त वर्ष 2025 में 56.9 अरब डॉलर मूल्य का तेल भारत को बेचा है. हालांकि, अमेरिका के दबाव डालने के कारण रूस से तेल आयात में गिरावट आई है.
वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में भारत ने रूस से 23.1 अरब डॉलर मूल्य का तेल आयात किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 14 फीसद की गिरावट है. रूस से तेल प्राप्त करने वाले देश होने के कारण अमेरिका ने भारत पर निर्यात के लिए 25 फीसद का जुर्माना लगाया है, इसके अतिरिक्त 2025 की शुरुआत में 25 फीसद के पारस्परिक शुल्क की घोषणा भी की गई थी. इस तरह भारतीय सामानों पर अभी 50 फीसद टैरिफ लग रहा है. भारत और अमेरिका ने एक आम सहमति पर पहुंचने के लिए कई दौर की बातचीत की है, जिससे भारत पर लगने वाले शुल्क में भी कमी आ सकती है.
क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICR के वरिष्ठ उपाध्यक्ष प्रशांत वशिष्ठ कहते हैं, “रूसी कच्चे तेल की जगह दूसरे देशों से तेल खरीदना भारत के लिए मुश्किल नहीं है. ऐसा इसलिए क्योंकि इसके कई आपूर्तिकर्ता पहले भी रहे हैं. हम भौगोलिक रूप से कई तेल उत्पादक देशों के करीब हैं. चूंकि हम तीसरे सबसे बड़े आयातक हैं और हमारी अधिकांश रिफाइनरियां किसी भी प्रकार के कच्चे तेल को संसाधित करने में सक्षम हैं, इसलिए रूसी कच्चे तेल को बदलना कोई बड़ी समस्या नहीं होगी.”
रूस से तेल की आपूर्ति न होने की स्थिति में भारत कुवैत, इराक और सऊदी अरब जैसे मध्य पूर्वी आपूर्तिकर्ताओं से आयात बढ़ा सकता है. इसके अलावा, नाइजीरिया और दक्षिण अमेरिका में ब्राजील जैसे अफ्रीकी देश भी हैं. साथ ही अमेरिका भी है, जिससे भारत अपने कच्चे तेल का 6 फीसद हिस्सा खरीदता है.
अमेरिका भारत को तेल निर्यात बढ़ाने की लगातार कोशिश कर रहा है. वित्त वर्ष 2025 में 14.3 अरब डॉलर मूल्य का तेल और वित्त वर्ष 2026 में अब तक 8.3 अरब डॉलर मूल्य का तेल अमेरिका ने भारत बेचा है. वशिष्ठ कहते हैं, "हम किस देश से तेल खरीदेंगे, यह उस समय की आर्थिक स्थिति पर निर्भर करेगा. कौन हमें किस कीमत पर क्या पेशकश कर रहा है, ये भी अहम है."
डेटा और एनालिटिक्स फर्म केप्लर का अनुमान है कि अगर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रूसी कच्चे तेल का आयात बंद करना पड़ा, तो भारत का सालाना कच्चे तेल का आयात बिल 9-11 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है. वित्त वर्ष 2026 के अप्रैल-नवंबर के दौरान भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 80.9 अरब डॉलर था.
रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी भारतीय कंपनियां पहले से ही मुश्किल में हैं क्योंकि उन्हें रूसी तेल खरीदना बंद करना पड़ा है. रिलायंस ने स्पष्ट किया है कि उसने पिछले तीन हफ्तों से रूसी तेल नहीं खरीदा है. हालांकि, वशिष्ठ का मानना है कि वित्तीय प्रभाव काफी कम होगा.
वित्त वर्ष 2022 से पहले भारत के तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी ना के बराबर करीब 2 फीसद थी. हालांकि, 2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद अमेरिका के रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के चलते, रूस ने भारत को रियायती दरों पर तेल बेचना शुरू कर दिया. इसके परिणाम ये हुआ कि वित्त वर्ष 2023 में भारतीय तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी बढ़कर 22 फीसद हो गई. फिर अगले दो वित्त वर्षों के साथ-साथ वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में लगभग 35 फीसद तक पहुंच गई.
शुरुआत में रूस के जरिए दी जाने वाली भारी छूटों के कारण रूस से तेल आयात में वृद्धि हुई. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 2021-22 के बाद, रूसी तेल पर 2022-23 में औसतन 14 फीसद और 2023-24 में 10.4 फीसद की छूट मिली, जिससे भारत को सालाना लगभग 5 अरब डॉलर या कच्चे तेल के आयात बिल का 3-4 फीसद की बचत हुई.
हालांकि, अक्टूबर 2025 में रूस से दी जाने वाली छूट घटकर 2 डॉलर प्रति बैरल हो गई. फिर भी भारत ने रूसी तेल का आयात जारी रखा क्योंकि भारतीय रिफाइनरियां प्रतिदिन कई अरब बैरल तेल का रिफाइन कर रही हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही भारत को 2 डॉलर सस्ता तेल मिल रहा हो, लेकिन यह किफायती है क्योंकि भारत थोक में खरीद कर रही है.
अमेरिका के वेनेजुएला पर हमला करने और उसके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को बंदी बनाने के बाद, विशेषज्ञों का कहना है कि इस बात की संभावना है कि अमेरिका वेनेजुएला से तेल भारत जैसे बड़े आयातक देशों को बेचने की कोशिश करेगा.
ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि वेनेजुएला अमेरिका को लगभग 2.8 अरब डॉलर मूल्य का 5 करोड़ बैरल तेल सौंप देगा. इस बयान के बाद वैश्विक बाजारों में तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई है. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि तेल बाजार मूल्य पर बेचा जाएगा. उन्होंने पहले यह भी कहा था कि अमेरिकी तेल उद्योग 18 महीनों के भीतर वेनेजुएला में पूरी तरह से चालू हो जाएगा और उन्हें उम्मीद है कि उस देश में बड़ा निवेश होगा.
वेनेजुएला का कच्चा तेल भारी होता है, जिसमें सल्फर की मात्रा अधिक होती है. इसके रिफाइन करने के लिए एक जटिल प्रक्रिया की आवश्यकता होती है. रिलायंस जैसी कुछ ही भारतीय कंपनियां इस प्रकार के कच्चे तेल को रिफाइन कर सकती हैं, इसलिए भारत में वेनेजुएला के कच्चे तेल के खरीदार कम ही होंगे. भू-राजनीतिक दबावों के बावजूद कमजोर वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में अमेरिकी टैरिफ को लेकर अनिश्चितता और नवीकरणीय ऊर्जा यानी रिन्यूएबल एनर्जी पर चीन के बढ़ते ध्यान के कारण तेल की कीमतों में तेजी नहीं आई है.

