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लैंटाना घास की वजह से बाघ कैसे इंसानों के लिए ज्यादा खतरनाक हो गए?

भारत के पर्यावरण से जुड़ी 2026 की रिपोर्ट में बताया गया है कि बाघ और इंसानों के बीच तेजी से टकराव बढ़ रहे हैं

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 3 मार्च , 2026

भारत में राष्ट्रीय पशु बाघ की बढ़ती संख्या संरक्षण की एक सफल कहानी तो बयां करती है, लेकिन तथ्यों की गहराई से जांच करने पर पता चलता है कि बाघ वनों की कटाई और शिकार क्षेत्र में कम के कारण चिंताजनक तरीके से इंसानी आवास के करीब आ रहे हैं.

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) द्वारा तैयार की गई 'स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट (SOE) रिपोर्ट 2026' के अनुसार, तेजी से सिकुड़ते आवासों के कारण इंसानों पर बाघों के हमले बढ़ रहे हैं.

ग्राउंड रिसर्च, विभिन्न अध्ययनों और आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट में बताया गया है कि इंसानों और बाघों के बीच मुठभेड़ों में वृद्धि हो रही है. इसका मुख्य कारण शिकार (प्राकृतिक शिकार जैसे हिरण-सांभर) की कमी है, जिससे भूखे बाघ घने जंगलों से निकलकर सीमावर्ती और साझा क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं.

तथ्यों की गहराई से जांच करने पर पता चलता है कि भारत के बाघ रिजर्व के आसपास जनवरी से जून 2025 के बीच कम से कम 43 लोग बाघों के हमलों में मारे गए. इसी अवधि में 2024 में 44 मौतें दर्ज की गई थीं. इस साल के चार हमलों में बाघों ने पीड़ितों के शरीर के कुछ हिस्सों को खा लिया, जिससे जंगल के किनारे बसे गांवों में डर और चिंता बहुत बढ़ गई है.

केंद्र सरकार के जरिए जारी आंकड़ों के अनुसार, 2014 से 2024 तक पूरे भारत में बाघों के हमलों में 600 से ज्यादा लोग मारे गए, यानी हर साल औसतन 60 मौतें. 2022 के बाद मौतों में बढ़ोतरी हुई है, जो बढ़ती बाघों की संख्या (हर साल लगभग 6 फीसद की वृद्धि) और सिकुड़ते आवासों से जुड़ी हुई है.

विशेषज्ञ बताते हैं कि बाघ बहुत कम ही आदतन इंसान-भक्षी (इंसानों के मांस खाने वाले) होते हैं, लेकिन वे आमतौर पर तब इंसानों पर हमला करते हैं जब वे घायल होते हैं, बूढ़े हो जाते हैं या प्राकृतिक शिकार जैसे हिरण-सांभर का शिकार नहीं कर पाते.

मुंबई स्थित गैर-लाभकारी संस्था वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट के अध्यक्ष अनिश अंधेरिया कहते हैं, "बाघ का इंसानों पर हमला करना या उन्हें खाना बहुत ही दुर्लभ घटना है. अगर इंसान खाना उनकी सामान्य आदत होती, तो भारत में जहां लाखों लोग बाघों के आवासों के आसपास रहते हैं, वहां हर हफ्ते सैकड़ों मौतें होतीं."

ओडिशा के संरक्षण जीवविज्ञानी कृष्णेंदु बासक कहते हैं, "औसतन एक बाघ अपनी खुराक पूरी करने के लिए हर साल लगभग 50 जंगली जानवर मारता है. इसका मतलब है कि उसे प्राकृतिक रूप से जीवित रहने के लिए कम से कम 500 जंगली शिकार जानवरों की आबादी चाहिए. अगर हम मान लें कि सभी बाघ इंसान-खाने वाले हैं और उन्हें हर साल 50 इंसान चाहिए, तो आंकड़े बहुत डरावने हो जाएंगे."

बेंगलुरु के जीवविज्ञानी के. उल्लास करंथ के मुताबिक, बाघों के इंसानों पर हमले इसलिए नहीं हो रहे क्योंकि उन्हें 'इंसानी मांस का स्वाद' अच्छा लगने लगा है. बल्कि ये इसलिए हो रहे हैं क्योंकि बाघ अब इंसानों से डरना कम कर चुके हैं. वन्यजीव संस्थान ऑफ इंडिया के पूर्व डीन डॉ. वाई.वी. झाला के नेतृत्व में फरवरी 2025 में साइंस मैगजीन में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चलता है कि पिछले दो दशकों में भारत में बाघों का क्षेत्र 30 फीसद बढ़ गया है. वहीं, 2011 से 2021 के बीच पारंपरिक जंगल क्षेत्र में 92,989 वर्ग किलोमीटर की कमी आई है, जिसमें से 46,707 वर्ग किलोमीटर बाघों के लिए रिजर्व फॉरेस्ट इलाका भी शामिल है.  

देश के 20 राज्यों में बाघ पाए जाते हैं. इन राज्यों में बाघों के आवास का लगभग 40 फीसद हिस्सा ऐसे इलाकों में है, जहां करीब 6.6 करोड़ लोग रहते हैं. डॉ. वाई.वी. झाला के मुताबिक, बाघों ने जिन नए इलाकों पर कब्जा किया है, वहां औसतन 250 लोग प्रति वर्ग किलोमीटर रहते हैं. वे कहते हैं, "बाघ अब अक्सर खेतों और गांवों से घिरे इलाकों में आ रहे हैं—ऐसे क्षेत्र जो गांव वाले अपनी रोजी-रोटी के लिए इस्तेमाल करते हैं."

सबसे बड़ा बदलाव लैंटाना कैमारा नाम की आक्रामक झाड़ी के तेजी से फैलने से हुआ है. यह झाड़ी अब भारत के बड़े-बड़े जंगलों में तेजी से फैल रही है. यह मूल घास और पौधों को दबा देती है, जिससे चीतल, सांभर जैसे जंगली शिकार जानवर कम हो जाते हैं. जब जंगली शिकार कम हो जाता है, तो बाघ जंगल के किनारे चरने वाले मवेशियों (गाय-भैंस) पर हमला करने लगते हैं.

शोधकर्ता बताते हैं कि लैंटाना वाली घनी झाड़ियां बाघों को शिकार के लिए बहुत अच्छी छिपने की जगह होती हैं. झाड़ियों के अंदर कम दिखाई देती हैं, शिकार के लिए भागने का रास्ता कम होता है और इसके आसपास के इलाकों में मवेशी आसानी से मिल जाते हैं. मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ और महाराष्ट्र के ताडोबा जैसे टाइगर रिजर्व में बाघ अब मुख्य इलाके (कोर जोन) के बाहर लैंटाना वाली जगहों को दिन में छिपने और शिकार करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

डेनमार्क की आरहस यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर निनाद मुंगी कहते हैं, "बाघ के लिए लैंटाना वाली जगहें लगभग परफेक्ट कवर देती हैं. कम दिखाई देने, शिकार के लिए भागने का रास्ता कम होने और ढेर सारे मवेशी का यहां भोजन की तलाश में आने के कारण लैंटाना बाघों के शिकार के लिए अनुकूल जगहें बन गई हैं."

मवेशी मालिकों को बाघ के हमले में उनके पशुओं के मारे जाने पर मुआवजा मिलता है. कुछ इलाकों में इससे गुस्सा कम हुआ है और बाघ एक तरह से गांव की अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन गया है. गांव वालों को बूढ़े या अतिरिक्त मवेशी मरने पर भी पैसे मिल जाते हैं. हालांकि, डेनमार्क की आरहस यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर निनाद मुंगी चेतावनी देते हैं कि इससे बाघों का व्यवहार बिगाड़ सकता है, वे इंसानों के करीब आ सकते हैं.

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए समुदाय-आधारित संरक्षण, बेहतर हैबिटेट मैनेजमेंट, आक्रामक प्रजातियों पर सख्त नियंत्रण और बाघों के रहने वाले इलाकों में इंसानी गतिविधियां कम करने की जरूरत है.

साथ ही, बढ़ती बाघ आबादी को जुड़े हुए हैबिटेट में रणनीतिक तरीके से मैनेज करना चाहिए. भारत की बाघ रिकवरी की बहुत तारीफ हुई है, लेकिन SOE 2026 रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि सिर्फ बाघों की संख्या गिनना काफी नहीं. अब यह समझना जरूरी है कि वे कैसे ढल रहे हैं और क्या ये बदलाव टकराव को और बढ़ा रहे हैं—यही संरक्षण का अगला चरण तय करेगा.

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