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स्कूलों में तीन भाषा फॉर्मूला लागू करने की योजना पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

अगले साल से कक्षा 6 में तीन भाषाओं का फॉर्मूला लागू किए जाने को लेकर छात्र, अभिभावक, शिक्षक और राज्य सरकारों की अलग-अलग चिंताएं हैं

Varanasi schools will soon introduce Tamil as part of a new language initiative
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 6 मार्च , 2026

नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत केंद्र सरकार ने स्कूलों में तीन-भाषा फॉर्मूला लागू करने की जो योजना बनाई थी, उसका क्रियान्वयन अगले अकादेमिक सत्र यानी 2026-27 से करने की तैयारी हो रही है. प्रस्तावित व्यवस्था के हिसाब से कक्षा 6 से छात्रों को तीन भाषाएं सीखनी होंगी. 

सरकार की योजना के मुताबिक, अंग्रेजी को अनिवार्य भाषा के बजाय विदेशी भाषा के रूप में वैकल्पिक श्रेणी में रखा जा सकता है. इसका एक मतलब यह भी हुआ कि 2031 में होने वाली दसवीं बोर्ड की परीक्षा में छात्रों को तीन भाषाओं के पेपर देने होंगे.

केंद्र सरकार ने अब तक यह आधिकारिक पुष्टि नहीं की है कि इस फॉर्मूले को अगले अकादमिक सत्र से लागू किया जाएगा, लेकिन केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के अधिकारी बता रहे हैं कि उन्होंने इसके क्रियान्वयन पर काम शुरू कर दिया है. केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का दावा है कि CBSE ने नौ भारतीय भाषाओं के लिए स्टडी मैटेरियल तैयार करने की शुरुआत भी कर दी है. इनमें तमिल, तेलुगू, मलयालम, कन्नड़, बांग्ला और गुजराती जैसी भाषाएं शामिल हैं.

इस मामले में सरकार का तर्क रहा है कि इससे छात्रों में अलग-अलग भाषाओं में दक्षता विकसित होगी. साथ ही, सरकार यह भी कहती आई है कि इससे भारतीय भाषाओं को बढ़ावा मिलेगा और राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिलेगी. लेकिन इस पहल को लेकर कई गंभीर चिंताएं भी व्यक्त की जा रही हैं.

भारत में तीन भाषा फॉर्मूला नया नहीं है. यह विचार सबसे पहले 1960 के दशक में कोठारी आयोग की सिफारिशों के बाद सामने आया था. मोदी सरकार के कार्यकाल में आई 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020' से यह फॉर्मूला एक बार फिर प्रमुखता से चर्चा में आया. नई शिक्षा नीति के आधार पर 2023 में जो 'नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन' बना, उसमें साफ तौर पर कहा गया कि शुरुआती कक्षाओं में मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ाई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और छठी कक्षा से तीन भाषाओं के फॉर्मूले को लागू किया जाना चाहिए.

हालांकि, इस प्रावधान की आलोचना करने वालों का तर्क है कि छात्रों पर पहले से ही काफी शैक्षणिक दबाव है. विशेषज्ञों का कहना है कि छठी कक्षा वह समय होता है जब छात्र माध्यमिक शिक्षा में प्रवेश करते हैं और गणित, विज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों का स्तर कठिन हो जाता है. ऐसे में जानकारों का तर्क है कि तीसरी भाषा को गंभीरता से थोपना बच्चों की सीखने की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है. कुछ शिक्षाविदों का यह भी कहना है कि भाषा सीखना तभी प्रभावी होता है जब उसका रोजमर्रा के जीवन में उपयोग हो. अगर किसी छात्र को ऐसी भाषा पढ़नी पड़े जिसका उसके क्षेत्र में सामाजिक या व्यावहारिक उपयोग न हो, तो वह केवल परीक्षा पास करने का माध्यम बनकर रह जाएगी.

तीन भाषा फॉर्मूला लागू करने की दिशा में एक बड़ी चुनौती यह भी है कि अधिकांश स्कूल इसके लिए तैयार नहीं हैं. देश के बड़े निजी स्कूलों में कई भाषाओं के विकल्प उपलब्ध कराना अपेक्षाकृत आसान है, क्योंकि उनके पास प्रशिक्षित शिक्षक और डिजिटल संसाधन मौजूद हैं. लेकिन गांवों के स्कूलों और सरकारी स्कूलों के लिए इतने कम समय में संबंधित भाषा के शिक्षक नियुक्त करने से लेकर जरूरी संसाधन जुटाना आसान नहीं होगा. यदि पूरी तैयारी के बिना इसे लागू किया गया, तो शहरी और ग्रामीण स्कूलों के बच्चों के बीच भाषा दक्षता के स्तर पर बड़ी असमानता दिखने का खतरा है. इन्हीं बातों को लेकर छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों में चिंता है.

इस फॉर्मूले को लेकर कुछ राज्यों की अपनी राजनीतिक चिंताएं भी हैं. तमिलनाडु जैसे राज्य ने इस पर बार-बार कड़ी आपत्ति जताई है. वैसे भी भारत में भाषा का सवाल राजनीति से पुराना जुड़ाव रखता है. तमिलनाडु लंबे समय से 'दो भाषाओं वाली नीति' का समर्थक रहा है, जहां तमिल और अंग्रेजी को प्राथमिकता दी जाती है. तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी डीएमके की तरफ से बार-बार कहा गया है, "केंद्र सरकार का तीन भाषाओं वाला फॉर्मूला हिंदी को थोपने की कोशिश है." तमिलनाडु के अलावा दूसरे दक्षिण भारतीय राज्यों के राजनीतिक दलों ने भी इस पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है. उनका कहना है कि ऐसा करने से संघीय ढांचा कमजोर होगा.

स्कूलों में नए अकादमिक सत्र की शुरुआत में कुछ ही समय बचा है. ऐसे में भले ही CBSE इस पर काम कर रहा हो, लेकिन जिस दिन इस योजना को सार्वजनिक किया जाएगा, उस दिन से इस मसले पर एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा होना तय माना जा रहा है.

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