scorecardresearch

स्कूल खुले लेकिन किताबें गायब, इस देरी की भरपाई कर पाएगा NCERT का नया सिलेबस?

स्कूलों में फ़िलहाल रिवाइज्ड NCERT किताबों की किल्लत दिख रही है, जिससे अकेडमिक वर्ष 2026-27 पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं

Judicial System In Books
NCERT की किताबों में नई शिक्षा नीति के हिसाब से बदलाव होना है
अपडेटेड 14 अप्रैल , 2026

नए अकेडमिक साल की शुरुआत का मतलब अमूमन होता है नई कॉपियां, किताबें और स्कूली दिनचर्या में एक बार फिर ढल जाने का वादा. लेकिन इस वर्ष यह सिलसिला टूटा हुआ दिख रहा है. भारत के स्कूलों में फ़िलहाल रिवाइज्ड NCERT किताबों की किल्लत दिख रही है, जिससे अकेडमिक वर्ष 2026-27 पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं. यह अनिश्चितता नीतियों के आदर्शवाद और क्लासरूम की जमीनी हकीकत के बीच मुंह बाए खड़ी है.

किताबों के आने के पहले फोटोकॉपी किए हुए नोट्स, पीडीएफ, पुराने संस्करणों के अलावा छात्रों और अध्यापकों के विवेक से काम चल रहा है. क्या छात्र, क्या टीचर और क्या अभिभावक, सभी के लिए यह साल की असामान्य शुरुआत बनकर रह गई है. यह देरी अचानक आई किसी समस्या से नहीं, बल्कि संरचनात्मक है.

इसकी वजह छपाई में देरी नहीं है. दरअसल, NCERT एक बड़े आंतरिक बदलाव के बीच में है. इसकी वजह है किताबों में नेशनल करिकुलम फॉर फ्रेमवर्क फॉर स्कूल एजुकेशन (NCSFE) 2023 के मुताबिक बदलाव करना जिसके सरकार की नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (NEP) का सही तरीके से पालन हो सके. लक्ष्य है भारी-भरकम, रट्टू सिलेबस के बजाय प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने वाले इंटरडिसिप्लिनरी अध्ययन पर जोर देना.

नोएडा इंनेशनल यूनिवर्सिटी, ग्रेटर नोएडा की डीन (अकेडमिक) डॉ.तान्या सिंह कहती हैं, "नए शैक्षणिक ढांचे के हिसाब से पढ़ाई को ढालने के लिए एक बड़े स्तर पर सुधार किया जा रहा है. प्रकाशन के बाद आने वाली समस्याओं से बचने के लिए सावधानी से जांच करना जरूरी है.”

इस तरह के व्यापक बदलाव के लिए शैक्षणिक समीक्षा की कई परतें समझने, अध्ययन सामग्री का दोबारा विकास, डिजाइन और अनुवाद की जरूरत होती है, जिसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर पुस्तकों की छपाई और वितरण की लॉजिस्टिक चुनौती आती है. हालांकि NCERT आधिकारिक सर्कुलर जारी करता है, लेकिन अलग-अलग स्तरों पर कम्युनिकेशन की कमी के चलते सभी स्कूलों तक समय पर या स्पष्ट जानकारी नहीं पहुंच पाती, जिससे जमीनी स्तर पर अनिश्चितता बढ़ जाती है.

हालांकि, इसका प्रभाव सबके लिए एक जैसा नहीं है. ट्रांजीशन कक्षाएं, जहां संरचनात्मक बदलाव ज्यादा गहरे हैं, सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं. खासकर कक्षा 9 में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं, जहां पूरी किताबों को नए दृष्टिकोण के अनुसार दोबारा तैयार किया गया है. कक्षा 6 में भी बदलाव हो रहा है, खासकर भाषा के ढांचों में, जबकि अन्य कक्षाएं एक-एक कर इस प्रक्रिया का हिस्सा बन रही हैं.

गाज़ियाबाद के दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस), आर.एन. एक्सटेंशन की प्रिंसिपल पल्लवी उपाध्याय कहती हैं, “शिक्षकों और छात्रों दोनों को अपने आप को नए सिरे से बदलने की आवश्यकता है.”

नई किताबें न होने की वजह से  कई स्कूल पुराने संस्करणों से पढ़ाई शुरू कर रहे हैं और उन्हें नए सिलेबस के अनुसार थोड़ा बदलकर पढ़ा रहे हैं. इससे पढ़ाई रुकी नहीं है, लेकिन एक जैसी पढ़ाई और सही मूल्यांकन करना मुश्किल हो रहा है.

शिक्षकों को तुरंत अपने लेसन प्लान बदलने पड़ रहे हैं और मिलकर तय करना पड़ता है कि क्या पढ़ाना है. उपाध्याय कहती हैं कि यह समय सिर्फ किताबों पर निर्भर रहने के बजाय, बच्चों को बेहतर तरीके से सिखाने का है.

एक्सपर्ट मानते हैं कि यह देरी पूरी तरह बुरी नहीं है. नया सिलेबस ज्यादा उपयोगी होगा, पढ़ाई का बोझ कम करेगा और सोचने-समझने की क्षमता पर जोर देगा. इसलिए इसे एक रुकावट के बजाय एक बदलाव के दौर के रूप में भी देखा जा सकता है.

कैंब्रिज स्कूल, नोएडा की प्रिंसिपल सुरभि भार्गव कहती हैं, “अगर इस स्थिति को सही तरीके से संभाला जाए, तो यह समय पढ़ाई को बेहतर बना सकती है. क्योंकि इससे ध्यान महज किताबी ज्ञान बटोरने से हटकर समझ विकसित करने पर जाएगा.”

लेकिन तात्कालिक चिंताएं भी जायज हैं. कई माता-पिता परेशान हैं क्योंकि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिए, खासकर जिन्होंने पहले ही किताबें खरीद ली हैं. छात्रों के लिए भी अलग-अलग स्रोतों से पढ़ना मुश्किल हो रहा है.

डॉ. सिंह के अनुसार, ऐसी स्थिति से पढ़ाई की निरंतरता प्रभावित होती है. देरी के कारण पढ़ाई अनियमित हो जाती है और अलग-अलग सामग्री पर निर्भरता बढ़ती है, जिससे शिक्षण और तैयारी दोनों पर असर पड़ता है.

छात्रों के लिए शिक्षकों की सलाह साफ है. रटने या सिलेबस जल्दी खत्म करने के बजाय समझ विकसित करने पर ध्यान दें. मुख्य कॉन्सेप्ट ज्यादातर वही रहते हैं, भले ही किताबों का तरीका बदल जाए. टीचर नोट्स, रेफरेंस बुक्स और ऑनलाइन सामग्री इसमें मदद कर सकती हैं.

माता-पिता से कहा जा रहा है कि धैर्य रखें और गाइड बुक्स या शॉर्टकट पर निर्भर न हों. नियमित पढ़ाई की आदत और स्कूल की सलाह पर भरोसा करने से तनाव कम होगा.

NCERT की देरी यह दिखाती है कि शिक्षा में बदलाव सिर्फ कागजों पर नहीं होता, बल्कि कक्षाओं में होता है, जहां कुछ दिक्कतें और अनिश्चितता होना स्वाभाविक है.

किताबें आखिरकार आ ही जाएंगी. फिलहाल लक्ष्य यही है कि सिर्फ सिलेबस ही पूरा न करें, बल्कि सही मायनों में सीखने पर ध्यान लगाएं.

Advertisement
Advertisement