6 जनवरी को मद्रास हाईकोर्ट ने DMK के नेतृत्व वाली तमिलनाडु सरकार को एक बड़ा झटका दिया है. कोर्ट ने अपने पुराने आदेश को बरकरार रखते हुए थिरुपरनकुंड्रम पहाड़ियों के ऊपर स्थित पत्थर के स्तंभ पर दीपक जलाने की इजाजत दे दी है.
यह मामला हिंदू तमिल पार्टी के नेता राम रविकुमार के जरिए दायर याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें उन्होंने पर्व के दिन स्तंभ पर पारंपरिक दीप जलाने की मांग की थी.
अदालत को इस सवाल का जवाब तय करना था कि क्या हजरत सुल्तान सिकंदर बादशाह अवुलिया दरगाह के पास स्तंभ पर दीप जलाया जा सकता है या नहीं?
अदालत ने धार्मिक परंपरा से जुड़ा मामला बताकर क्या कहा था?
पिछले साल 1 दिसंबर को जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया था कि पर्व के दिन दीपम जलाया जाए. अदालत ने इसे धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक अधिकारों से जुड़ा मामला मानते हुए अनुमति दी थी.
हालांकि, इस आदेश को लागू नहीं किया जा सका क्योंकि प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताई थी. अधिकारियों का कहना था कि दीपम जलाने को लेकर विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच विवाद की संभावना है, जिससे शांति भंग हो सकती है.
अदालत के आदेश के खिलाफ याचिका देने वालों का क्या तर्क था?
इसके खिलाफ राज्य सरकार और अन्य अपीलकर्ताओं ने याचिका दर्ज कर रीति-रिवाज, कानून-व्यवस्था संबंधी चिंताओं और उस जगह पर दो समुदाय के बीच शुरू होने वाले प्रतिस्पर्धी दावों का हवाला देते हुए इस प्रथा का विरोध किया था.
राज्य सरकार की आपत्तियों पर ऐतराज जताते हुए पीठ ने कहा कि यह बेहद हास्यास्पद और अविश्वसनीय है कि देवस्थानम को साल में एक दिन पत्थर के स्तंभ पर दीपक जलाने की अनुमति देने से सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है.
अदालत ने राज्य सरकार की याचिका पर क्या कहा?
अदालत ने कहा कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान होना चाहिए और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित कर दीपम जलाने का आदेश लागू किया जाए. अदालत ने कहा कि इस तरह की गड़बड़ी तभी हो सकती है, जब इसे स्वयं राज्य सरकार बढ़ावा दे रही हो.
साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि उसे उम्मीद है कि कोई भी राज्य सरकार अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस स्तर तक नहीं गिरेगा.
क्या है पूरा विवाद?
दरअसल, थिरुपरनकुंदरम पहाड़ी भगवान मुरुगन के छह पवित्र आश्रयों अरुपदई वीडु में से एक है. इस पहाड़ी पर एक प्राचीन चट्टान काटकर बनाया गया गुफानुमा मंदिर बना है. यह तमिलनाडु भर के श्रद्धालुओं के लिए लंबे समय से एक तीर्थस्थल रहा है.
इसके करीब ही एक दरगाह भी है. मंदिर और दरगाह की मात्र 3 किलोमीटर की दूरी को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच पहाड़ी पर अधिकार को लेकर तनाव चलता रहा है. मंदिर और दरगाह ने 1920 में पहली बार पहाड़ी पर कानूनी अधिकार को लेकर चुनौती दी थी.

