scorecardresearch

Telegram पर बैन लगा सरकार ने खुद उजागर की अपनी कमजोरियां?

‘सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000’ की धारा 69A के तहत Telegram पर 16 जून से रोक लगाई गई है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 18 जून , 2026

जून की 21 तारीख को दोबारा से NEET-UG परीक्षा आयोजित होनी है. तब तक के लिए भारत सरकार ने मैसेजिंग प्लेटफॉर्म Telegram पर रोक लगाने का फैसला किया है.

सरकार के इस फैसले को Telegram ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी है. जस्टिस तेजस कारिया ने छुट्टी पर होने के बावजूद इस मामले में तत्काल सुनवाई पर सहमति व्यक्त की है.

सरकार का यह फैसला कानूनी तौर पर सही है या गलत, इस पर आखिरी फैसला अदालत को करना है. लेकिन, असल सवाल तो यह है कि क्या Telegram पर रोक लगाने भर से अब पेपर लीक नहीं होगा? ऐसे सभी महत्वपूर्ण सवालों के जवाब सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता से समझते हैं :
 
Telegram पर भारत सरकार के किस फैसले से विवाद शुरू हुआ है?

सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता के मुताबिक, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की मांग पर भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने 16 जून 2026 को देश में Telegram ऐप के इस्तेमाल पर अस्थायी रोक लगाने का आदेश जारी किया.

सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000 की धारा 69A के तहत Telegram पर रोक लगाई गई है. रिपोर्ट है कि एग्जाम के बाद भी Telegram को अपना मैसेज एडिट फीचर 30 जून तक बंद रखने का निर्देश दिया गया है.
 
सरकार का मानना है कि कुछ लोग Telegram का इस्तेमाल परीक्षाओं में पेपर लीक होने के फर्जी सबूत बनाने के लिए करते रहे हैं. ऐसे मामलों को रोकने और परीक्षा की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया है. सरकार के इस फैसले के बाद ही इस पूरे मामले पर विवाद शुरू हो गया है.
 
क्या आप मानते हैं कि Telegram पर बैन का फैसला कानूनी तौर पर सही है?
 
वकील विराग गुप्ता बताते हैं कि इस तरह के किसी फैसले को लेने का कानूनी अधिकार भारत सरकार के IT मंत्रालय के पास है. उन्होंने अपने अधिकार के तहत ही पब्लिक ऑर्डर को मेंटेन करने के लिए किया गया है. पहले भी Telegram पर कई सारे फर्जी चैनल ब्लॉक कराए गए हैं. इसके बावजूद यहां इस तरह के कई ग्रुप सक्रिय थे. ऐसे में सरकार का फैसला कानूनी दायरे में तो है लेकिन इस फैसले से तीन बड़े सवाल उठ रहे हैं-
 
अगर इस तरह के प्लेटफॉर्म के जरिए पेपर लीक होते हैं, तो बैन सिर्फ Telegram पर ही क्यों लगाया गया है? बाकी प्लेटफॉर्म से भी तो पेपर लीक होने के बाद मैसेज में सर्कुलेट हो सकते हैं. ऐसे में तो उन सभी को बैन करना होगा. Telegram को बैन करने के बाद भी कई प्रॉक्सी तरीके, वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) आदि के जरिए इस्तेमाल किया जा सकता है. फिर इस रोक का क्या मतलब है?

सरकार का कहना है कि पेपर लीक हो ही नहीं सकता क्योंकि हमारा सिस्टम मजबूत है. अगर ऐसा है तो क्या इस फैसले से अफवाह थम जाएगी? अफवाह तो बाकी दूसरे प्लेटफॉर्म से भी फैल सकती है. इन्हीं कारणों से लगता है कि कानून के अधिकार को सही से पालन नहीं किया गया है.
 
क्या Telegram पर इस बैन से संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हुआ है?


विराग कहते हैं कि हां, सरकार के इस फैसले से अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हुआ है. दरअसल, यह कानून भारत के सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण का मौलिक अधिकार प्रदान करता है.

टेलीग्राम के अलावा इस बिजनेस से जुड़े बाकी प्लेटफॉर्म पर बैन नहीं लगाए गए हैं. जबकि उन प्लेटफॉर्म के जरिए भी अफवाह फैल सकती है. यही कारण है कि  Telegram ने समानता के अधिकार के तहत कोर्ट में याचिका दायर की है.
 
क्या इस फैसले से समस्या का दूर हो जाएगी ?
 
विराग गुप्ता के मुताबिक सरकार ने पब्लिक ऑर्डर मेंटेन करने के लिए 22 जून तक Telegram पर बैन लगाया है लेकिन उसके बाद क्या होगा? क्या उसके बाद पब्लिक ऑर्डर मेंटेन हो जाएगा और क्या समस्या खत्म हो जाएगी. इन सवालों पर गौर करें तो यह फैसला समाधान से ज्यादा सरकार की कमजोरियों को छुपाने वाला लगता है.
 
सबसे अहम बात तो यह है कि Telegram का इस्तेमाल सिर्फ पेपर लीक के लिए नहीं हो रहा है. कई तरह के साइबर अपराधों के लिए भी इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल हो रहा है. SEBI ने भी इसके खिलाफ शिकायत की है. ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि NEET एग्जाम के बाद अगर Telegram काम करना शुरू कर देगा, तो बाकी अपराधों को रोकने के लिए सरकार की नीति क्या है. सिर्फ एक एग्जाम को सही से कराना ही तो सरकार की सफलता नहीं हो सकती है ना.
 
विराग कहते हैं कि एक और बड़ी बात यह है कि इस पूरे मामले में IT एक्ट और आईटी इंटरमीडियरी एक्ट (IT Rules) की खामियां उजागर हो गई हैं. यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि IT एक्ट के तहत ही 2011 में आईटी इंटरमीडियरी एक्ट बनाए गए थे. इनका उद्धेश्य IT क्षेत्र में बेहतर तरीके से कानून और नियमों को लागू करना था. इसके तहत कंपनियों को भारत में रजिस्ट्रेशन और शिकायत अधिकारी नियुक्त करना अनिवार्य था.
 
सरकार अब तक इन नियमों को लागू नहीं करवा पाई है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि पिछले दिनों अखिलेश यादव की बेटी से जुड़े एक मामले में पुलिस अधिकारियों को शिकायत करने और समाधान के लिए अमेरिकी अधिकारियों से बात करनी पड़ी जबकि इन कंपनियों के अधिकारी भारत में होना चाहिए.
 
इंटरनेट बंद कर देने या किसी ऐप को पूरी तरह बंद करने से ऐसा लगता है कि गेहूं के साथ घुन भी पिस जा रहा है. यह ‘इज ऑफ डूइंग’ बिजनेस के भी खिलाफ है. साथ ही इन फैसलों से आमलोगों और कंपनियों के अधिकारों का भी हनन होता है. यह फैसला कुछ इस तरह है कि रोड पर कोई गलत गाड़ी चला रहा है तो आपने रोड ही बंद कर दिया. जबकि आपको पहले इन गाड़ी चलाने वालों का चालान काटना चाहिए था. ऐसे में सिर्फ इन फैसलों से समाधान नहीं निकलेगा, सरकार को कड़े नियम बनाकर उनको लागू भी करना होगा.
 
इस तरह की समस्याओं से निपटने का क्या सही तरीका हो सकता है?
 
विराग के मुताबिक, Telegram ने बीते कुछ सालों में लाखों फर्जी अकाउंट बंद किए हैं. ये कंपनी का दावा है. इसी तरह बाकी प्लेटफॉर्म ने भी फर्जी अकाउंट बैन किए. पुलिस या प्रशासन इन फर्जी अकाउंट्स का पता कर, उसको बनाने वाले लोगों पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रही है. एक अकाउंट बंद होने के बाद वही अपराधी दूसरा अकाउंट बना लेते हैं. बॉट और AI के जरिए एक सिंडिकेट की तरह डिजिटल माफिया ये काम कर रहे हैं लेकिन सरकार इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं कर पा रही है जो हमारी नाकामी है और राष्ट्रीय समस्या बन गई है.  

Advertisement
Advertisement