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क्या है नागरिकता कानून की धारा 6A जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखते हुए जरूरी बताया?

सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता कानून की धारा 6A को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 17 अक्टूबर को इसे वैध ठहराया है

सुप्रीम कोर्ट नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था (फाइल फोटो)
सुप्रीम कोर्ट नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था (फाइल फोटो)
अपडेटेड 18 अक्टूबर , 2024

सीजेआई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 5 जजों की सुप्रीम कोर्ट बेंच ने 17 अक्टूबर को 4:1 के बहुमत के फैसले में नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा. यह धारा असम में रहने वाले बांग्लादेशी प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने की अनुमति देता है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान की प्रस्तावना में शामिल बंधुत्व (फ्रेटर्निटी) के मूल्य से जुड़ा एक वैध कानून माना.

नागरिकता अधिनियम या सिटीजनशिप एक्ट, 1955 की धारा 6ए की जड़ें 1985 के असम समझौते के राजनीतिक समाधान पर आधारित हैं. इस कानून पर समानता के अधिकार का उल्लंघन, बाह्य अतिक्रमण को बढ़ावा देने, और असम की अपनी भाषा और संस्कृति को बचाए रखने के अधिकार पर चोट करने के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में जानना जरूरी है कि 6ए क्या है, इसका इतिहास क्या है और सुप्रीम कोर्ट ने इसे क्यों संवैधानिक माना.

कहानी शुरू होती है पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने तक की यात्रा से. विभाजन के कुछ सालों बाद से ही पूर्वी पाकिस्तान के भीतर यह भावना समा गई थी कि सारा शासन पश्चिमी पाकिस्तान ही संभाल रहा है और उनकी बांग्ला भाषा पर उर्दू जबरदस्ती थोपा जा रहा है. इसे लेकर जब पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने आंदोलन करना शुरू किया तब सरकार के तरफ से उसे बुरी तरह कुचला जाने लगा.

इस भीषण संघर्ष की वजह से कई बांग्लादेशी, एक बेहतर भविष्य की चाह में भागकर भारत की सीमा में प्रवेश करने लगे. आख़िरकार इस पूरे प्रकरण में जब इंदिरा गांधी का प्रवेश हुआ तो उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान को भारत की सैन्य ताकत की मदद से आजाद कर 1971 में बांग्लादेश बना दिया. इसके बाद भी बांग्लादेशी प्रवासियों का भारत आना रुका नहीं और असम के लोगों को लगने लगा कि बांग्लादेशियों ने उनकी जमीन, रोजगार और संस्कृति पर कब्ज़ा कर लिया है.

क्या है नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए का इतिहास?

1979 से ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसु) ने 'अवैध विदेशियों' (बांग्लादेशी प्रवासियों) की पहचान कर उन्हें देश से बाहर निकालने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया. यह आंदोलन छह साल तक चला जिसके बाद 1985 में राजीव गांधी वाली केंद्र सरकार, असम की राज्य सरकार और आंदोलन कर रहे नेताओं के बीच ऐतिहासिक असम समझौता (असम एकॉर्ड) हुआ.

असम समझौते के क्लॉज़ 5 में विदेशी प्रवासियों के लिए एक तारीख निश्चित की - 1 जनवरी, 1966. इस तारीख के बाद और 24 मार्च, 1971 तक जो भी विदेशी असम में दाखिल हुए, वे भले ही भारत में रहें मगर उनके दाखिल होने से अगले दस सालों तक मतदाता सूची में उनका नाम नहीं आ सकता था. दस साल के बाद जरूर भारतीय नागरिकों की तरह उन्हें वोट देने का अधिकार मिलता. 1 जनवरी, 1966 से पहले आए सभी बांग्लादेशी प्रवासियों को भारत की नागरिकता देने की बात भी धारा 6ए में कही गई है. 25 मार्च, 1971 से जो भी विदेशी (बांग्लादेशी) असम में अवैध तरीके दाखिल होगा, उसे अवैध प्रवासी मानकर बाहर किया जाएगा. अगर वैध तरीके से कोई आए तो भारत सरकार के कानून के मुताबिक उसे नागरिकता के लिए आवेदन करना होगा.

1985 में असम समझौते को अमली जामा पहनने के लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 में धारा 6ए जोड़ी गई. इसी में हालिया बदलाव नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2019 में किया जब उन्होंने इसमें एक और धारा 6बी जोड़ दी. इस धारा के मुताबिक, 31 दिसंबर 2014 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम बहुल देशों से जो भी हिन्दू, ईसाई, सिख, पारसी, बुद्धिस्ट और जैन प्रवासी भारत आए, उन्हें भारत सरकार नागरिकता प्रदान करेगी. जहां नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 6ए केवल असम के लिए है तो वहीं धारा 6बी पूरे देश के लिए प्रभावी है.

धारा 6ए को लेकर कैसे शुरू हुआ कानूनी दांवपेंच?

2012 में असम के कुछ स्थानीय समूहों - असम पब्लिक वर्क्स, असम संयुक्त महासंघ और अन्य ने धारा 6ए के खिलाफ एक याचिका दायर की जिसमें उन्होंने कहा कि केवल असम राज्य में धारा 6ए के लागू होने से राज्य के जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) पैटर्न में एक स्पष्ट परिवर्तन हुआ है और असम के लोगों को अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बना दिया गया है. यह राज्य की आर्थिक और राजनीतिक भलाई के लिए हानिकारक है और लोगों के सांस्कृतिक अस्तित्व, राजनीतिक नियंत्रण और रोजगार के अवसरों के खिलाफ एक शक्तिशाली बाधा के रूप में कार्य करता है.

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि राज्य की जनसांख्यिकी में बदलाव से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 के तहत 'इंडिजिनस' (स्वदेशी) असमिया लोगों के अपनी संस्कृति को संरक्षित करने के अधिकार प्रभावित होंगे. 2014 में दो जजों की बेंच ने धारा 6ए को चुनौती देने वाले मामले को संविधान पीठ को भेज दिया था.

इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए 17 अक्टूबर को सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस जेबी पारडिवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पांच जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत धारा 6ए के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इसे संवैधानिक ठहराया. इन जजों में केवल जस्टिस जेबी पारडिवाला सुप्रीम कोर्ट के फैसले से असहमत दिखे.

यह फैसला केवल असम के लिए महत्वपूर्ण नहीं है जहां लंबे समय से प्रवासन और जनसांख्यिकी के मुद्दों से राजनीति प्रभावित होती रही है. बल्कि नागरिकता और इस संबंध में संसद की शक्तियों के व्यापक मुद्दों के लिए भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला अहम है.

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के सवालों का किस तरह जवाब दिया?

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि धारा 6ए असम में बड़े पैमाने पर आप्रवासन को बढ़ावा देती है, क्योंकि इस प्रावधान के समाप्त होने की कोई अंतिम तारीख नहीं है. इसके अलावा, मौजूदा तंत्र इतने मजबूत नहीं थे कि यह सत्यापित किया जा सके कि कोई व्यक्ति या उसके माता-पिता या उसके दादा-दादी प्रावधान में दी गई तारीखों से पहले असम में आकर बसे थे या नहीं. नतीजतन, उन्होंने कहा कि बड़े पैमाने पर आप्रवासन हुआ जिससे असम की जनसांख्यिकी और संस्कृति प्रभावित हुई और यह अनुच्छेद 29 के तहत उनके सांस्कृतिक अधिकारों का उल्लंघन है. अंत में, उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रावधान असम को अन्य राज्यों से अलग करके संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन करता है.

भारत सरकार ने इसी मुद्दे पर जवाब देते हुए कहा कि उसे अनुच्छेद 11 के तहत नागरिकता पर विशेष कानून बनाने का अधिकार है. समर्थन में खड़े दूसरे पक्षों ने भी कहा था कि असम हमेशा से बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक रहा है, इसलिए याचिकाकर्ता सांस्कृतिक विशिष्टता का दावा नहीं कर सकते. उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि धारा 6ए को असंवैधानिक घोषित करने से वहां का हर नागरिक राज्यविहीन हो जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के बहुमत के फैसले ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि असम की जनसांख्यिकी में परिवर्तन से मूल असमिया लोगों के अधिकार खत्म हो जाएंगे. जस्टिस कांत ने कहा कि इस तर्क को स्वीकार करने से "हमारे संविधान निर्माताओं ने जिस भाईचारे का सपना देखा था, वह विचार कमजोर किया जाएगा, और हमारे विविधतापूर्ण राष्ट्र की एकजुटता को भी इससे खतरा होगा. सीजेआई चंद्रचूड़ ने इसी मुद्दे पर कहा कि किसी अन्य जातीय समूह की मौजूदगी मात्र से अनुच्छेद 29 का उल्लंघन नहीं होता.

सीजेआई चंद्रचूड़ ने मामले में मुख्य मुद्दों की पहचान करके शुरुआत की, विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 6 और 7 पर ध्यान केंद्रित किया. ये प्रावधान पाकिस्तान से भारत में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों और भारत से पाकिस्तान में प्रवास करने वाले लोगों को नागरिकता देने के लिए एक कट-ऑफ तिथि निर्धारित करते हैं. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि धारा 6ए इन प्रावधानों का उल्लंघन करती है क्योंकि वह बांग्लादेश पर भी लागू होती हैं, जो संविधान लागू होने के समय पाकिस्तान का हिस्सा था. हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि धारा 6ए संविधान में संशोधन नहीं करती है, क्योंकि अनुच्छेद 6 और 7 केवल संविधान के लागू होने की तिथि - 26 जनवरी 1950 को लोगों के लिए नागरिकता को संबोधित करते हैं.

सीजेआई ने कहा, "उदाहरण के लिए, अनुच्छेद 6 ऐसे व्यक्ति पर लागू नहीं होती जो 19 जुलाई 1948 के बाद पूर्वी पाकिस्तान से असम में आया था, लेकिन संविधान लागू होने से पहले नागरिक के रूप में पंजीकरण के लिए आवेदन नहीं किया था. वहीं धारा 6ए ऐसे व्यक्तियों को नागरिकता प्रदान करती है. इसलिए धारा 6ए एक अलग समय सीमा से संबंधित है और संविधान लागू होने के समय मौजूद प्रावधानों को नहीं बदलती है."

अंत में, उन्होंने धारा 6ए(2) के तहत नागरिकता के लिए पंजीकरण प्रक्रिया की कमी के बारे में चिंताओं को संबोधित किया, जो 1 जनवरी 1966 से पहले प्रवेश करने वाले प्रवासियों से संबंधित है. उन्होंने स्पष्ट किया कि पंजीकरण भारत में नागरिकता प्राप्त करने का 'एकमात्र कानूनी' तरीका नहीं है. उन्होंने इसकी तुलना नागरिकता अधिनियम की धारा 3 और 4 से की, जो पंजीकरण की आवश्यकता के बिना जन्म या वंश के आधार पर नागरिकता प्रदान करती है. इसलिए, धारा 6ए(2) को केवल इसलिए रद्द नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें पंजीकरण प्रक्रिया अनिवार्य नहीं थी.

जस्टिस पारडिवाला ने क्यों जताई बहुमत के फैसले से असहमति?

जस्टिस पारडिवाला ने स्पष्ट किया कि उनकी असहमति एक अलग दृष्टिकोण से थी. उन्होंने कहा, "मेरे तर्क की दिशा इस आधार पर है कि कानून का एक हिस्सा अधिनियमित होने के समय वैध हो सकता है, लेकिन ऐसा प्रावधान हो सकता है जो समय बीतने के साथ अतार्किक हो सकता है."

जस्टिस पारडिवाला की असहमति मुख्य रूप से धारा 6ए(3) से थी, जो 1 जनवरी 1966 और 24 मार्च 1971 के बीच प्रवेश करने वालों के लिए नागरिकता से संबंधित है. उन्होंने चिंता व्यक्त की कि इस प्रावधान के तहत पहचाने गए 'विदेशियों' की संख्या इस अवधि के दौरान आने वाले अप्रवासियों की वास्तविक संख्या से बहुत कम थी.

उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यह प्रावधान समय बीतने के कारण अपने 'उद्देश्य के विरुद्ध' है क्योंकि प्रावधान के लिए कोई अस्थायी या समय सीमा नहीं है. नतीजन, जस्टिस पारडिवाला ने धारा 6ए(3) को असंवैधानिक घोषित कर दिया. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह निर्णय न तो 1 जनवरी 1966 से पहले आए अप्रवासियों को प्रभावित करेगा और न ही उन लोगों को जो 1966 और 1971 के बीच विदेशी पाए गए और बाद में नागरिकता प्रदान की गई.

इसी तरह, जिन अप्रवासियों को विदेशी के रूप में पहचाना गया है और नागरिकता के लिए पंजीकृत किया गया है, या जिनकी अपील लंबित है, उन पर उनके फैसले का कोई असर नहीं होगा. हालांकि, 1966-71 की अवधि के अप्रवासी जिन्हें अभी तक विदेशी के रूप में पहचाना नहीं गया है, उन्हें अब अवैध अप्रवासी माना जाएगा. जस्टिस पारडिवाला का फैसला भविष्य में लागू होगा, जिसका मतलब है कि प्रावधान को फैसले की तारीख से असंवैधानिक माना जाएगा.

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