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रेत खनन होता रहे और नदियां भी बची रहें! सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से बनेगी बात?

सुप्रीम कोर्ट ने अवैध रेत खनन को लेकर राज्य सरकारों को कठोर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं

राजस्थान के टोंक में हो रहे अवैध रेत खनन की तस्वीर
राजस्थान के टोंक में हो रहे अवैध रेत खनन की तस्वीर
अपडेटेड 8 मई , 2026

पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला अवैध रेत खनन के खिलाफ अब तक का सबसे सख्त दखल साबित हुआ है. कोर्ट ने राज्यों को इस समस्या पर कड़ी चेतावनी दी है.

राजस्थान और मध्य प्रदेश में वनकर्मियों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने 17 अप्रैल को राज्य सरकारों को रेत माफिया के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए.

कोर्ट ने सख्त अल्टीमेटम देते हुए कहा कि अगर समस्या पर काबू नहीं पाया गया तो उसे अर्धसैनिक बलों की तैनाती की सिफारिश करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश बहुत कड़े और सख्त हैं. राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश को अब अवैध रेत खनन रोकने के लिए किए गए कामों की विस्तृत रिपोर्ट कोर्ट में जमा करनी होगी.

कोर्ट ने कहा है कि CCTV कैमरे और GPS से वाहनों की लगातार निगरानी की जाए. अवैध रेत खनन वाली मशीनें और उपकरण जब्त कर लिए जाएं. कोर्ट ने साफ चेतावनी दी है कि अगर अधिकारी चुपचाप बैठे रहे तो डीएम, पुलिस वाले समेत सभी सरकारी अधिकारी व्यक्तिगत जवाबदेह होंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार के जरिए दिसंबर 2025 में जारी की गई अधिसूचना पर रोक लगा दी है. इस अधिसूचना में चंबल वन्यजीव अभयारण्य के 732 हेक्टेयर जमीन का संरक्षण हटाने की कोशिश की गई थी. कोर्ट ने इसे साफ-साफ अवैध बताया है.

कोर्ट ने कहा कि संरक्षित वन क्षेत्रों को, खासकर जहां दुर्लभ वन्यजीव रहते हैं, किसी भी प्रशासनिक बहाने से नहीं छेड़ा जा सकता और न ही उनका दर्जा कम किया जा सकता है. कोर्ट के इस सख्त फैसले की वजह बहुत हैरान करने वाली है. इस साल धौलपुर में वनरक्षक जितेंद्र सिंह शेखावत और मुरैना में हरिकेश गुर्जर की हत्या ने यह जाहिर कर दिया कि चंबल इलाके में रेत माफिया कितना मजबूत हो गया है.

कोर्ट ने कहा कि ये लोग डाकुओं की तरह काम कर रहे हैं. पहले भी सरकारी अधिकारी इनके शिकार बने हैं. अब यह केवल नियम-कानून की नाकामी नहीं रह गई है बल्कि पूरा कानून-व्यवस्था का सिस्टम ध्वस्त हो चुका है. यही कारण है कि  पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ रहा है.

हमें यह समझना होगा कि रेत सिर्फ घर-बिल्डिंग बनाने की चीज नहीं है. यह नदी के पूरे इकोसिस्टम की बुनियाद है. जब रेत को अंधाधुंध निकाला जाता है तो नदी का तल खराब होने लगता है, पानी का रुख बदल जाता है. नदियों के किनारे टूटने लगते हैं और भूजल कम हो जाता है. इन सब वजहों से जल संकट पैदा होता है.

सुप्रीम कोर्ट का साफ आदेश है कि नदी में रेत खनन सिर्फ तभी करना चाहिए जब कोई और विकल्प न बचा हो. एक जगह खनन करने के बाद वहां अगले 5 साल तक फिर से खनन नहीं होना चाहिए, ताकि रेत दोबारा भर जाए.

जब मैन्युफैक्चर्ड सैंड (M-sand) उपलब्ध हो तो नदी की रेत जितना हो सके कम निकालनी चाहिए. हालांकि, राजस्थान सरकार ने इन आदेशों का ज्यादातर समय पालन नहीं किया है. इस साल जनवरी में राजस्थान हाईकोर्ट ने भीलवाड़ा, बाड़मेर, टोंक और सिरोही जिलों में 93 बजरी खनन लाइसेंस रद्द कर दिए. कोर्ट ने पाया कि इनकी ई-नीलामी पर्यावरण के नियमों और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के खिलाफ थी.

चंबल जैसी नदियों में यह नुकसान और भी भयानक है. रेत की पट्टियां घड़ियाल (एक लुप्तप्राय मगरमच्छ) के बच्चे पैदा करने की जगह हैं और कछुओं के अंडे देने की जगह हैं. इन्हें हटा देने से इन जानवरों के घर-आवास पूरी तरह खत्म हो सकते हैं. घड़ियाल और गंगा डॉल्फिन पहले ही विलुप्त होने के कगार पर हैं. अवैध रेत खनन उनकी गति को और तेज कर रहा है. साथ ही, पुल-मकानों को भी बड़ा खतरा है.

मुरैना-धौलपुर के बीच NH-44 पर पुल को हुए नुकसान को मामूली घटना मत समझिए. ज्यादा रेत निकालने से नदी का तल कमजोर हो जाता है, जिस पर पुल के खंभे टिके रहते हैं. इससे पुल गिरने का खतरा बढ़ जाता है.

पहले भी सुप्रीम कोर्ट राजस्थान में रेत खनन बंद कर चुका था, जब तक रेत दोबारा भरने का अध्ययन न हो जाए. कागज पर तो यह अच्छा कदम था, लेकिन असलियत में बंदी लगते ही अवैध रेत खनन और ज्यादा बढ़ गया. वजह साफ है- देश में निर्माण की तेज रफ्तार.

रेत भवनों के साथ-साथ दूसरी तरह के निर्माण के लिए बहुत जरूरी है इसलिए इसकी मांग कभी कम नहीं हुई. कानूनी रेत बंद हुई तो अवैध काला बाजार फलने-फूलने लगा. दुर्भाग्य से, अवैध रेत खनन कानूनी खनन से भी कहीं ज्यादा खतरनाक और पर्यावरण के लिए हानिकारक साबित होता है.

रेत खनन के नियमों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रिप्लेनिशमेंट स्टडी है. यह वैज्ञानिक अध्ययन बताता है कि नदी खुद कितनी रेत समय के साथ दोबारा भर लेती है. नदियां ऊपर से मिट्टी और रेत लेकर आती हैं और बरसात के बाद रेत जमा करती हैं.

इसी प्राकृतिक भराव के आधार पर तय होता है कि नदी से कितनी रेत निकाली जा सकती है, बिना नदी को नुकसान पहुंचाए. यह अध्ययन नदी के बहाव, मौसम के हिसाब से रेत जमा होने, नदी के आकार, कटाव और भूजल-वन्यजीवों पर असर को जांचता है. उद्देश्य सिर्फ एक है- जितनी रेत निकालना सुरक्षित और टिकाऊ हो, उतनी ही निकालो.

पर ये अध्ययन या तो ठीक से नहीं होते या फिर उन्हें दबा दिया जाता है. ज्यादातर मामलों में खनन की अनुमति गलत रिपोर्ट या अफसरों की सुविधा के आधार पर दे दी जाती है. निगरानी करने वाले विभागों के पास न तो पर्याप्त स्टाफ है और न ही उपकरण.

नतीजा- कागजों पर सब कुछ नियम के अनुसार, लेकिन असल में रेत लूट मची रहती है. एक अच्छा समाधान है जो पर्यावरण बचाए और अर्थव्यवस्था को भी नुकसान न पहुंचाए, लेकिन इसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है. बनास नदी पर बिसलपुर बांध से जुड़ा डिसिल्टेशन प्रोजेक्ट बताता है कि सही तरीके से रेत निकासी कैसे की जा सकती है. बांध में जमा गाद हटाकर उसमें से रेत अलग की जाती है और GPS-सैटेलाइट से उसकी पूरी निगरानी की जाती है. इससे कई फायदे एक साथ हो जाते हैं.

यह परियोजना बांध की क्षमता बढ़ाती है, सरकार को राजस्व देती है, नियंत्रित तरीके से रेत की सप्लाई सुनिश्चित करती है. साथ ही नाजुक नदी पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव कम करती है. यह पर्यावरण विज्ञान और आर्थिक तर्क दोनों पर आधारित नीति नवाचार का एक दुर्लभ उदाहरण है. फिर भी, यह अभी सिर्फ एक पायलट प्रोजेक्ट बना हुआ है, पूरे राज्य में इसे बड़े पैमाने पर लागू नहीं किया गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर CCTV, GPS ट्रैकिंग और मशीनरी जब्त करने का निर्देश दिया है. ट्रकों पर GPS, खनन क्षेत्रों की सैटेलाइट निगरानी, रेत निकासी की मात्रा का रियल-टाइम डेटा- यह सब पूरी तरह संभव है. जो कमी है, वह है इन सबको एक साथ जोड़ना और जवाबदेही सुनिश्चित करना.

राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना तकनीक सिर्फ दिखावा बनकर रह जाती है. अवैध रेत खनन निर्माण क्षेत्र को चालू रखता है, जो आर्थिक विकास के लिए बहुत जरूरी है, लेकिन उसी विकास की इकोलॉजिकल नींव को भी धीरे-धीरे नष्ट कर रहा है. यह समस्या केवल न्यायपालिका के जरिए नहीं सुलझाई जा सकती. शासन-प्रशासन को अब आगे आना होगा.

ऐसे में अब सवाल उठता कि आखिर क्या बदलना चाहिए? पहला, रिप्लेनिशमेंट स्टडी  (प्राकृतिक भराव अध्ययन) को विश्वसनीय और नियमित रूप से अपडेट किया जाना चाहिए. बिना ठोस वैज्ञानिक आधार के कोई भी नियम बेकार है. दूसरा, कानूनी रेत की सप्लाई को मजबूत किया जाए. अगर मांग जायज है, तो सप्लाई को रोकना ठीक नहीं है, इससे समस्या और बढ़ती है.

तीसरा, जवाबदेही सिर्फ बातों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. लापरवाही या माफिया से सांठगांठ करने वाले अधिकारियों को सख्ती से जवाबदेह ठहराया जाए. सलाह-मशविरे देने से कहीं ज्यादा असर यह कदम करेगा और आखिर में, डिसिल्टेशन (नदी की गाद हटाकर रेत निकालने) जैसे विकल्पों को बड़े पैमाने पर और तेजी से लागू किया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने अपनी लकीर खींच दी है. अब सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार अपनी प्राथमिकताएं बदलने को तैयार है?

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