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वे दो मामले जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को कटघरे में खड़ा कर दिया

इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय की निष्पक्षता और कार्य प्रणाली पर सवाल उठाए हैं

ईडी की कार्रवाई पर विपक्षी दल पक्षपात का लगाते रहे हैं आरोप
ईडी की कार्रवाई पर विपक्षी दल पक्षपात का लगाते रहे हैं आरोप
अपडेटेड 17 अक्टूबर , 2023

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार, 10 अक्टूबर को दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई. दिल्ली की आबकारी नीति में कथित भ्रष्टाचार के मामले में सिसोदिया अभी जेल में बंद हैं और सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल उनको जमानत देने का फैसला सुरक्षित रख लिया है. हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत ने  प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि एजेंसी इस मामले में मनीष सिसोदिया को 'अनिश्चित काल' के लिए जेल में नहीं रख सकती.

अदालत ने एजेंसी से यह भी कहा कि सिसोदिया से जुड़े मामलों पर एक बार आरोप पत्र दाखिल होने के बाद जिरह तुरंत शुरू होनी चाहिए. इससे पहले हुई सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की कार्रवाई पर सवाल उठाए थे. दिलचस्प बात है कि बीते पखवाड़े में इसके साथ-साथ एक और मामले में भी कोर्ट ने ईडी पर कुछ ऐसी टिप्पणियां की हैं जो खुद इस जांच एजेंसी को कटघरे में खड़ा करती हैं.

इनमें पहला मामला गुरुग्राम (गुड़गांव) की रियल एस्टेट कंपनी एम3एम के मालिक पंकज बंसल और बसंत बंसल की गिरफ्तारी से जुड़ा हुआ है. तीन अक्टूबर को गिरफ्तारी से पहले 1 जून को उनके कई ठिकानों पर ईडी ने छापेमारी की थी. इसके बाद पंकज बंसल और बसंत बंसल को अदालत ने उस मामले में 5 जुलाई, 2023तक गिरफ्तारी से राहत दे दी थी. लेकिन अप्रैल, 2023 में हरियाणा के पंचकूला में दर्ज एक दूसरे मामले में 15 जून, 2023 को ईडी ने पंकज बंसल और बसंत बंसल को मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. पंकज बंसल और बसंत बंसल के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में कई उदाहरणों के माध्यम से ईडी की न सिर्फ खिंचाई की, बल्कि उसे अपने कामकाज में सुधार के लिए भी कहा है. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की तीन ऐसी टिप्पणियां की हैं जो ईडी को कटघरे में खड़ा करती हैं. 

पंकज बंसल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में रियल एस्टेट कंपनी एम3एम के मालिकों के खिलाफ ईडी की कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए.एस. बोपन्ना और जस्टिस संजय कुमार ने ईडी की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता के अभाव का भी जिक्र किया और कहा कि इस एजेंसी को बगैर किसी भेदभाव के काम करना चाहिए. इस खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा, "इस मामले के घटनाक्रम से ईडी की कार्यप्रणाली नकारात्मक नहीं तो बुरी जरूर दिखती है. ईडी से अपेक्षा की जाती है कि उसका हर कदम पारदर्शी हो, इसमें कोई भेदभाव न हो और ईमानदारी से कार्य करने के स्थापित मानकों का पालन किया जाए."

इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ईडी पर यह टिप्पणी की कि उसे बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए और यह एजेंसी तय मानकों के हिसाब से काम करने में विफल रही है. जस्टिस ए.एस. बोपन्ना और जस्टिस संजय कुमार ने ईडी को फटकार लगाते हुए कहा, "ईडी को 2002 के कठोर कानून के तहत असीमित शक्तियां मिली हुई हैं लेकिन इससे बदले की भावना से काम करने की उम्मीद नहीं की जाती. ईडी से अपेक्षा की जाती है कि वह बिना किसी भेदभाव के निष्पक्षता से काम करे. जिस मामले की हम सुनवाई कर रहे हैं, उसमें तथ्य यह बताते हैं कि ईडी इन मानकों के हिसाब से अपने दायित्वों के निर्वहन और अपने शक्तियों के इस्तेमाल में विफल रही है." 

तथ्यों के साथ पंकज बंसल के मामले में ईडी के कामकाज पर सवाल उठाते हुए उच्चतम न्यायालय की इस पीठ ने कहा कि ईडी ने आरोपियों को किसी और मामले में पूछताछ के लिए बुलाया और गिरफ्तारी किसी और मामले में कर ली. साथ ही अपनी टिप्पणी में खंडपीठ ने ये भी संकेत किया कि एजेंसी ने अदालत से तथ्यों को छिपाने का काम किया है. दरअसल, आरोपियों को एक मामले में अग्रिम जमानत मिलने के बाद ईडी ने तुरंत दूसरा मामला दर्ज करके आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था. जस्टिस ए.एस. बोपन्ना और जस्टिस संजय कुमार की खंडपीठ ने इस हवाले से कहा, "जिस तरह से आरोपियों को 24 घंटे के अंदर एक मामले में बुलाकर दूसरे मामले में गिरफ्तार किया गया, उसमें प्रामाणिकता का घोर अभाव दिखता है."

इसके दो दिन बाद 5 अक्टूबर को सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली की आबकारी नीति मामले में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री रहे मनीष सिसोदिया के खिलाफ कोई सबूत पेश नहीं करने पर फिर से ईडी को फटकार लगाई. नवंबर, 2021 में लागू दिल्ली आबकारी नीति 2021-22 को जुलाई, 2022 में वापस ले लिया गया था. इस मामले में दिल्ली के उपमुख्यमंत्री रहे मनीष सिसोदिया और हाल ही में गिरफ्तार आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह पर यह आरोप है कि इन लोगों ने कुछ शराब कारोबारियों को लाभ पहुंचाने के लिए उनके हिसाब से दिल्ली की आबकारी नीति बनाई और इस प्रक्रिया में काफी पैसे का लेन-देन हुआ.

इस पूरे मामले में तकरीबन 292 करोड़ रुपए के रिश्वत का आरोप ईडी ने लगाया है. इस मामले में सिसोदिया को ईडी ने 26 फरवरी, 2023 को गिरफ्तार किया था. सिसोदिया की गिरफ्तारी के तकरीबन सात महीने बाद सुप्रीम कोर्ट की दो प्रमुख टिप्पणियां, इस एजेंसी के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाती हैं.

दिल्ली शराब घोटाले के मामले में ईडी की तरफ से रखे गए मनी ट्रेल का अध्ययन करने के बाद जस्टिस संजीव खन्ना और एस.वी. भट्टी की पीठ ने कहा कि ऐसा कुछ भी अब तक अदालत के सामने नहीं रखा गया है जिससे यह सिद्ध हो सके कि पैसा मनीष सिसोदिया तक पहुंचा है. अदालत ने कहा, "मनीष सिसोदिया इस सब में कहां शामिल हैं. आप उन्हें पीएमएलए (धन शोधन निवारण अधिनियम) से कैसे जोड़ सकते हैं? पैसा उनकी जेब में नहीं आया बल्कि किसी और की जेब में आया." अदालत ने आगे पूछा, "सबूत कहां है? दिनेश अरोड़ा को खुद लाभ मिला है. दिनेश अरोड़ा के बयान के अलावा और कोई सबूत है?"

दरअसल इस मामले के एक और आरोपी दिनेश अरोड़ा अब सरकारी गवाह बन चुके हैं. ईडी के वकील द्वारा अरोड़ा के बयान को सिसोदिया के खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल करने की दलील पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया. सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि सबूतों के अभाव में यह मामला तुरंत रफा-दफा हो जाएगा. इस हवाले से सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी, "ये किसका बयान है? ये तो उनका एक विचार है. जिरह में, यह दो मिनट में ध्वस्त हो जाएगा. यह उनका विचार है और वे विशेषज्ञ नहीं हैं. विशेषज्ञ की राय का अलग महत्व होता है. यह तो एक अनुमान है. उनकी राय का कोई मतलब नहीं है. अदालत की राय का मतलब है."

दिल्ली आबकारी नीति में रिश्वत और एम3एम के मामले में आगे और भी सुनवाई होनी हैं. जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों के बाद ईडी पर लोगों की और सख्त नजर रहेगी.

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