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परमाणु युद्ध के और करीब पहुंची दुनिया!

SIPRI की हालिया रिपोर्ट दुनिया के कई हिस्सों में जारी भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच परमाणु हथियारों की होड़ के फिर से शुरू होने की चेतावनी देती है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 11 जून , 2026

एक समय में दुनिया के अलग-अलग देशों के राजनयिक परमाणु हथियार कम करने और संयम बरतने की बात करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. पूर्वी यूरोप और एशिया में जारी भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच अब परमाणु बम को लेकर तमाम देशों की सोच बदलने लगी है.

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की ताजा रिपोर्ट इस डरावनी सच्चाई की ओर इशारा करती है. पूरी दुनिया में परमाणु हथियारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. इतना ही नहीं इन हथियारों के आधुनिकीकरण की रफ्तार भी तेज हो गई है.

शीत युद्ध खत्म होने के बाद पूरी दुनिया में जो शांति की स्थिति बहाल हुई थी, वह अब बड़े देशों की आपसी दुश्मनी और विभिन्न इलाकों में तनाव के कारण खत्म हो रही है.

SIPRI रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि दुनिया भर में परमाणु हथियारों की संख्या को धीरे-धीरे कम करने की जो प्रक्रिया दशकों से चल रही थी, वह जल्द ही खत्म हो सकती है. दुनिया के तमाम देशों के बीच हथियारों की नई दौड़ शुरू हो सकती है. 

यह सबकुछ ऐसे वक्त में हो रहा है, जब खाड़ी, पूर्वी यूरोप और एशिया में चल रहे संघर्ष अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीतियों को पूरी तरह बदल रहे हैं. भारत की रणनीतिक अब बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच कसौटी पर हैं. मई 2025 में पाकिस्तान के साथ चले 88 घंटे की सैन्य टकराव ने सीमा पर लगातार बन रहे खतरे को फिर से उजागर कर दिया है.

चीन और तुर्की की ओर से पाकिस्तान को मिल रहे समर्थन से स्थिति और ज्यादा नाजुक हो गई है. यही वजह है कि भारत पर अपने रक्षा क्षमता को और मजबूत करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है. SIPRI की ताजा रिपोर्ट ने इन चिंताओं को और ज्यादा बढ़ा दिया है. रिपोर्ट में पहली बार साफ-साफ कहा गया है कि भारत ने अपने 12 परमाणु वॉरहेड (Warheads) को मिसाइलों पर या ऑपरेशनल बेस पर तैनात किया है.

हालांकि, भारत का कुल परमाणु हथियारों का भंडार अमेरिका, रूस और चीन की तुलना में अभी भी बहुत कम है लेकिन परमाणु वॉरहेड की तैनाती से यह साफ होता है कि जटिल और अनिश्चित सुरक्षा माहौल में भारत की परमाणु निरोधक नीति धीरे-धीरे बदल रही है.

SIPRI का अनुमान है कि दुनिया के नौ देशों के पास कुल मिलाकर लगभग 12,187 परमाणु बम हैं. इनमें से लगभग 9,745 संभावित उपयोग के लिए सैन्य भंडारों में रखे गए हैं, जबकि अनुमानित 4,012 हथियार परिचालन मिसाइल और विमानों पर तैनात हैं.
 
इनमें से 2,100 से 2,200 वॉरहेड बहुत उच्च अलर्ट पर हैं यानी ये तुरंत इस्तेमाल के लिए तैयार हैं. ये वॉरहेड मुख्य रूप से अमेरिका और रूस के पास हैं. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन के पास इस वक्त 620 परमाणु वॉरहेड हैं और वह अपनी रणनीतिक सेना को अभूतपूर्व गति से बढ़ा रहा है. जनवरी 2026 तक चीन ने उत्तरी इलाकों में बने नए साइलो (मिसाइल भंडार) में सैकड़ों मिसाइलें लोड कर दी हैं.

साथ ही पूर्वी पहाड़ी इलाकों में और नए साइलो बनाए जा रहे हैं. दरअसल, साइलो एक भूमिगत (जमीन के अंदर) बेलनाकार बंकर होता है. इसका मुख्य उपयोग खतरनाक अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBMs) और परमाणु हथियारों को सुरक्षित रूप से छिपाकर रखने और सीधे वहीं से लॉन्च (प्रक्षेपित) करने के लिए किया जाता है.

SIPRI का कहना है कि इस दशक के अंत तक चीन के पास रूस या अमेरिका जितनी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) हो सकती हैं. हालांकि, उसका कुल परमाणु भंडार तब भी उन दोनों देशों से काफी कम है रहेगा.

भारत के लिए, चीन का तेजी से परमाणु हथियारों का आधुनिकीकरण एक गंभीर रणनीतिक चिंता का विषय बना हुआ है. भारतीय सुरक्षा योजनाकारों ने लंबे समय से चीन की बढ़ती सैन्य क्षमताओं और पाकिस्तान के साथ उसके घनिष्ठ रणनीतिक संबंधों को भारत के लिए खतरा के तौर पर देखा है. साथ ही इन कारणों से भारतीय रक्षा योजनाकार अपनी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने के प्रयासों पर जोर देते हैं.

SIPRI का यह कहना है कि भारत के जरिए शांति काल में मिसाइलों पर सीमित संख्या में परमाणु वॉरहेड तैनात करना, उसके परमाणु रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करता है. यह रिपोर्ट वैश्विक परिदृश्य में एक बेहद अस्थिर समय में आई है. पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, जिसमें प्रत्यक्ष सैन्य टकराव और व्यापक क्षेत्रीय तनाव बढ़ने का खतरा शामिल है.

इस वक्त परमाणु हथियारों को लेकर इस खबर ने जंग के दौरान परमाणु हथियारों की संभावित भूमिका को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं. हालांकि, मौजूदा संघर्ष में शामिल किसी भी पक्ष ने खुले तौर पर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी नहीं दी है लेकिन विश्लेषकों का मानना ​​है कि क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता रहने से परमाणु क्षमता वाले प्रमुख देश इसमें शामिल हो सकते हैं.

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा का माहौल लगातार नाजुक होता जा रहा है. यूक्रेन और रूस के बीच जंग यूरोप में परमाणु हथियारों को लेकर बयानबाजी को लगातार बढ़ा रहा है. जबकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्षेत्रीय विवादों और सैन्य प्रतिस्पर्धा को लेकर तनाव बना हुआ है. इस पृष्ठभूमि में शीत युद्ध के बाद परमाणु हथियारों को नियंत्रित करने वाली पारंपरिक मान्यताएं अब चुनौती का सामना कर रही हैं.

SIPRI के निदेशक करीम हग्गाग ने चेतावनी दी है कि कई देशों में प्रभावशाली राजनीतिक आवाजें परमाणु हथियारों को राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्य गारंटी के रूप में पेश कर रही है. उन्होंने तर्क दिया कि इस तरह की सोच से रक्षा रणनीतियां परमाणु हथियारों पर अधिक निर्भर हो सकती हैं और भविष्य में पारंपरिक युद्ध से परे संकटों के बढ़ने की संभावना काफी बढ़ सकती है.

हैग्गाग ने कहा, “हथियार टेक्नोलॉजी में प्रगति और परमाणु हथियारों के नियंत्रण समझौतों के टूटने से इन खतरनाक हथियारों से जुड़े खतरे बढ़ रहे हैं.” उन्होंने मई 2025 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य टकराव का उदाहरण देते हुए बताया कि किस प्रकार परमाणु हथियारों से लैस दोनों देशों से जुड़े क्षेत्रीय संघर्ष में बात परमाणु हथियारों के इस्तेमाल तक पहुंच गई थी.

सभी नौ परमाणु हथियारों से लैस देशों के जरिए निरंतर आधुनिकीकरण प्रयासों के बावजूद, रूस और अमेरिका प्रमुख परमाणु शक्तियां बने हुए हैं. विश्व में इस्तेमाल योग्य परमाणु हथियारों का लगभग 83 फीसद हिस्सा इन्हीं दोनों देशों के पास है. हालांकि, 2025 के दौरान उनके भंडार अपेक्षाकृत स्थिर रहे, फिर भी दोनों देश अगली पीढ़ी की मिसाइल प्रणालियों, पनडुब्बियों, बमवर्षकों और कमान एवं नियंत्रण इंफ्रास्ट्र्क्चर में भारी निवेश करना जारी रखे हुए हैं.

भारत आधिकारिक तौर पर अपनी 'पहले प्रयोग न करने' की नीति का पालन करती है, हालांकि रणनीतिक हलकों में इस नीति के भविष्य को लेकर समय-समय पर बहसें होती रहती हैं. हाइपरसोनिक हथियार, मिसाइल रक्षा प्रणाली और उन्नत निगरानी क्षमताओं सहित नई टेक्नोलॉजी के आने से दुनिया भर के नीति निर्माताओं को पारंपरिक प्रतिरोधक मॉडल पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है.

SIPRI की रिपोर्ट वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों के विस्तार को रोकने वाले ढांचे के कमजोर होने को लेकर बढ़ती चिंताओं पर प्रकाश डालती है. परमाणु अप्रसार संधि यानी NPT 2026 का समीक्षा सम्मेलन अंतिम सहमति दस्तावेज के बिना समाप्त हो गया, जो सदस्य देशों के बीच समझौते तक पहुंचने में लगातार तीसरी विफलता को दर्शाता है.

विशेषज्ञों का मानना ​​है कि परमाणु हथियारों की संख्या दुनिया में तेजी से बढ़ने और परमाणु आधुनिकीकरण कार्यक्रमों के जारी रहने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर परमाणु हथियारों पर रोक लगाने वाली व्यवस्था पर भरोसा कम हो सकता है. पश्चिम एशिया से लेकर पूर्वी यूरोप और हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक कई क्षेत्रों में संघर्ष जारी है, ऐसे में SIPRI के नवीनतम निष्कर्ष इस बात की याद दिलाते हैं कि वैश्विक परमाणु परिदृश्य अधिक जटिल और संभावित रूप से अधिक खतरनाक होता जा रहा है.

दो परमाणु हथियारों वाले पड़ोसियों के बीच स्थिति तेजी से खतरनाक टकराव की तरफ बढ़ने का डर बना रहता है. जैसे जैसे समय तेजी से बीत रहा है, परमाणु ऊर्जा भंडारों की संख्या बढ़ रही है. परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बियां और भी गहरे क्षेत्रों में गश्त लगा रही हैं और राजनीतिक बयानबाजी अकल्पनीय खतरों के प्रति और भी लापरवाह होती जा रही है.

ऐसे में SIPRI की चेतावनी मानवता के लिए एक बड़ी और गंभीर चेतावनी है. परमाणु हथियारों को लेकर संयम का युग समाप्त हो रहा है और इसके साथ ही वे सुरक्षा उपाय भी ध्वस्त हो रहे हैं जिन्होंने आठ दशकों तक तबाही को रोका था. भारत के लिए यह चुनौती और ज्यादा है क्योंकि यह देश दो परमाणु प्रतिद्वंद्वियों के बीच फंसा है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महाशक्ति प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है. ऐसे में आगे का रास्ता सतर्कता, तकनीकी बढ़त और अनियंत्रित हथियारों की होड़ में शामिल हुए बिना विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध के प्रति अटूट प्रतिबद्धता की मांग करता है.

जब तक विश्व के बड़े नेता खतरनाक हथियारों के नियंत्रण और संवाद के रास्ते को नहीं अपनाते, तब तक संकट के समय में परमाणु हथियारों के अंतिम उपाय बनने का खतरा मंडराता रहेगा. यह कोई डर फैलाने वाली बात नहीं है, बल्कि यह भयावह वास्तविकता है. सवाल अब यह नहीं है कि जोखिम कितना बढ़ रहे हैं, बल्कि असल सवाल यह है कि क्या हममें परमाणु हथियारों की दौड़ में यहां तक आकर पीछे हटने की सामूहिक इच्छाशक्ति है?

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