भारत ने 2022 में ही सिंगल-यूज प्लास्टिक (SUP) आइटम्स पर बैन लगा दिया था. फिर भी, पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था 'टॉक्सिक्स लिंक (Toxics Link )' की ओर से चार शहरों की 560 जगहों पर किए गए सर्वे में सामने आया कि 84 प्रतिशत जगहों पर यह अभी भी आसानी से उपलब्ध है और इसका इस्तेमाल हो रहा है.
प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने के लिए, सरकार ने 19 सिंगल-यूज प्लास्टिक आइटम, यानी ऐसे प्लास्टिक प्रोडक्ट जो एक बार इस्तेमाल करके फेंक दिए जाते हैं, पर पाबंदी लगाई थी. इनमें प्लास्टिक कटलरी, स्ट्रॉ, ट्रे और सजावट वाला थर्माकोल शामिल थे.
इसके अलावा, कैरी बैग और बैनर जैसे SUP आइटम पर 'मोटाई' का नियम लागू किया गया था, क्योंकि पतले प्लास्टिक को रीसायकल करना बहुत मुश्किल होता है. इसी के तहत, 120 माइक्रोन से कम के कैरी बैग और 100 माइक्रोन से कम के बैनर बैन कर दिए गए थे.
टॉक्सिक्स लिंक की स्टडी, 'रिविजिटिंग सिंगल यूज प्लास्टिक बैन' में पाया गया कि बैन किए गए SUP की सबसे ज्यादा उपलब्धता भुवनेश्वर में दर्ज की गई, जहां सर्वे की 89 प्रतिशत जगहों पर यह मिला. इसके बाद दिल्ली में 86 प्रतिशत, मुंबई में 85 प्रतिशत और गुवाहाटी में 76 प्रतिशत जगहों पर यह पाया गया. अप्रैल और अगस्त 2025 के बीच की गई यह फील्ड स्टडी दिल्ली, मुंबई, गुवाहाटी और भुवनेश्वर में स्ट्रीट वेंडर्स, जूस स्टॉल, मार्केट, छोटे रेस्टोरेंट, किराना दुकानों, धार्मिक स्थलों, रेलवे प्लेटफॉर्म और बड़े रिटेल स्पेसेस जैसी कई जगहों पर की गई.
रिपोर्ट में पाया गया कि इसका इस्तेमाल काफी हद तक असंगठित बाजार और छोटे दुकानदारों की और से किया जा रहा है. जबकि बड़े रिटेलर्स और मॉल ज्यादातर नियमों का पालन कर रहे हैं. इन लोकल और इनफॉर्मल वेंडर्स (जिनमें स्ट्रीट फूड बेचने वाले, जूस की दुकानें, नारियल पानी वाले, सब्जी वाले, आइसक्रीम पार्लर और साप्ताहिक बाजार शामिल हैं) ने इस बैन की जमकर धज्जियां उड़ाई हैं.
करीब 91 प्रतिशत छोटे दुकानदारों ने इसके लगातार इस्तेमाल की सबसे बड़ी वजह ग्राहकों की डिमांड को बताया. उनका कहना है कि ग्राहक अभी भी कैरी बैग मांगते हैं और उम्मीद करते हैं कि यह उन्हें मुफ्त में मिले. इसके अलावा, 91 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे अभी भी प्लास्टिक बैग का इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि कागज या कपड़े के बैग जैसे विकल्प बहुत महंगे हैं. उन्होंने यह भी जोड़ा कि खरीदारी करते समय सिर्फ 55 प्रतिशत ग्राहक ही अपना बैग साथ लाते हैं.
रिपोर्ट ने साफ किया कि सिंगल-यूज प्लास्टिक के विकल्पों की कोई कमी नहीं है. कई जगहों पर पेपर कप और प्लेट, अखबार के रैपर, लकड़ी की कटलरी, स्टील के बर्तन, एल्युमिनियम फॉयल कंटेनर, गन्ने की खोई से बनी प्लेटें, कपड़े के बैग और मोटे 'रीयूजेबल' प्लास्टिक बैग उपलब्ध थे.
हालांकि, ग्राहकों की पसंद की वजह से दुकानदारों में सिंगल-यूज प्लास्टिक से दूर जाने को लेकर एक हिचकिचाहट है. टॉक्सिक्स लिंक के एसोसिएट डायरेक्टर सतीश सिन्हा बताते हैं, "ग्राहक रीयूजेबल चीजों के मुकाबले डिस्पोजेबल प्लेट और कटलरी को ज्यादा हाइजीनिक मानते हैं. हमारे सर्वे में पाया गया कि यही सोच और SUP के सस्ते होने का फायदा, छोटे और लोकल दुकानदारों के बीच इसके इस्तेमाल को लगातार बढ़ावा दे रहा है."
सिन्हा ने आगे कहा कि बैन किए गए SUP के प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन को कंट्रोल करने और सख्ती से मॉनिटर करने की जरूरत है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वे आसानी से न मिलें. इस लिहाज से, बेहतर निगरानी और जनता को जागरूक करके इस बैन को सख्ती से लागू करना इसकी कामयाबी के लिए बहुत अहम है.
टॉक्सिक्स लिंक के डायरेक्टर रवि अग्रवाल ने जोर देते हुए कहा, "जब तक इस बैन को लागू करने का तरीका नहीं सुधरता और इन प्रोडक्ट्स की सप्लाई कंट्रोल नहीं होती, तब तक यह बैन प्लास्टिक के कचरे और प्रदूषण के मसले को सही तरीके से हल नहीं कर पाएगा."
रिपोर्ट इसे असरदार तरीके से लागू करने के लिए कुछ उपाय भी सुझाती है. इनमें से एक है मॉनिटरिंग निगरानी. जूस की दुकानों, नारियल पानी वालों, सब्जी के स्टॉल, साप्ताहिक बाजारों, सिगरेट रिटेलर और पार्टी/डेकोरेशन की दुकानों जैसी 'लो-कंप्लायंस' (जहां नियमों का कम पालन होता है) जगहों पर ज्यादा सख्त और नियमित निगरानी जरूरी है. इसके साथ ही, यह भी चेक होना चाहिए कि मॉल जैसी 'हाई-कंप्लायंस' जगहें अपना स्टैंडर्ड बनाए रखें. बैन किए गए प्लास्टिक प्रोडक्ट्स के प्रोडक्शन और सप्लाई को भी कसने की जरूरत है. मैन्युफैक्चरिंग यूनिट और इनफॉर्मल सप्लाई चेन की मॉनिटरिंग मजबूत होनी चाहिए ताकि ये प्रोडक्ट्स मार्केट में घुस ही न पाएं.
सस्ते और टिकाऊ विकल्पों का होना भी एक अहम कदम है. लोकल प्रोडक्शन को सपोर्ट करके, सप्लाई चेन को मजबूत बनाकर और मार्केट तक पहुंच को आसान करके इन विकल्पों की उपलब्धता और अफोर्डेबिलिटी बढ़ाने की जरूरत है. इसके अलावा, बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाने होंगे ताकि ग्राहक रीयूजेबल प्रोडक्ट्स की तरफ मुड़ें और SUP की डिमांड कम हो. इस बैन के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मास मीडिया और पब्लिक प्लैटफॉर्म का जमकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए.
रिपोर्ट ने छोटे दुकानदारों को पेपर या कपड़े जैसे 'अल्टरनेटिव' मटीरियल की तरफ जाने में मदद करने के लिए 'टारगेटेड सपोर्ट' और इंसेंटिव देने का भी सुझाव दिया. इसमें आर्थिक मदद, क्षमता बढ़ाने की पहल और सस्ते विकल्पों तक आसान पहुंच शामिल है.

