पिछले दो दशकों के ज्यादातर समय में, बांग्लादेश की राजनीति में तारिक रहमान एक व्यक्ति से ज्यादा एक 'विचार' के रूप में मौजूद रहे. उनके बारे में बातें की गईं, उन पर बहस हुई, उनके नाम पर चेतावनियां दी गईं और उनका इंतज़ार किया गया. कभी-कभी वे देश में मौजूद अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ ऑनलाइन बैठकों में नज़र आ जाया करते थे.
बीती 12 फरवरी को उनके गायब रहने का वह लंबा दौर आखिरकार खत्म हो गया. रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने आम चुनाव में शानदार जीत हासिल की. करीब 17 साल का निर्वासन खत्म करने के मात्र एक महीने बाद, उन्होंने खुद को बांग्लादेश के अगले प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित कर लिया है.
रहमान 17 फरवरी को शपथ ले रहे हैं. उनकी यह राजनीतिक वापसी सिर्फ निजी जीत नहीं है; यह बांग्लादेश में 'विकल्पहीन राजनीति' के दौर का अंत और 'प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र' की फिर से शुरुआत है. यह हमें उस नेता का नए सिरे से आकलन करने पर भी मजबूर करता है, जिसकी छवि अब उतनी ही बदल चुकी है जितना वह देश, जिसे अब वे चलाने जा रहे हैं.
विरासत में मिली राजनीति और शुरुआती झटके
ढाका में 1965 में जन्मे 60 वर्षीय रहमान की शुरुआत ही राजनीति के बीच हुई. वे पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान के बड़े बेटे हैं, जो 1971 में देश की आज़ादी के मुख्य नायकों में से एक थे. उनकी मां बेगम खालिदा जिया दो बार प्रधानमंत्री रहीं. सत्ता और राजनीति उनकी कोई चुनी हुई महत्वाकांक्षा नहीं थी, बल्कि उनकी विरासत थी.
लेकिन यह विरासत अपने साथ हिंसा और नुकसान भी लेकर आई. जियाउर रहमान की 1981 में हत्या कर दी गई थी, तब तारिक टीनएजर थे. उस हत्याकांड ने उनके जीवन और BNP की राजनीतिक यादों पर एक स्थायी छाप छोड़ दी. उस दौर के बाद, बांग्लादेश की राजनीति तेजी से व्यक्तिगत और एक-दूसरे को न बख्शने वाली होती गई. तारिक इसी तूफ़ान के बीच बड़े हुए.
1990 के दशक के आखिर और 2000 की शुरुआत तक, वे BNP के भीतर एक मुख्य संगठनकर्ता के रूप में उभरे. वे ऊर्जावान थे और अपनी पार्टी के प्रति बेहद मुखर थे. समर्थकों ने उन्हें पार्टी का भविष्य माना, जबकि आलोचकों ने उन पर सरकारी संस्थाओं से बाहर 'पावर सेंटर' चलाने का आरोप लगाया. यह छवि सालों तक उनके साथ रही.
निर्वासन के साल
साल 2006 में उनकी मां का दूसरा कार्यकाल खत्म होने के बाद 2008 में सब कुछ बदल गया. सेना समर्थित कार्यवाहक सरकार ने जब भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी मुहिम शुरू की, तो रहमान इलाज के बहाने लंदन चले गए. इससे पहले 2007 में उन्हें गिरफ्तार किया गया था और इतनी बुरी तरह पीटा गया था कि उन्होंने शिकायत की थी कि उनके अंग काम नहीं कर रहे हैं. कुछ समय के लिए बांग्लादेश से बाहर गए रहमान 17 साल लंबे निर्वासन के बाद ही लौट सके.
इन सालों में, शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग सरकार के दौरान बांग्लादेश में राजनीतिक जगह कम होती गई. BNP को हाशिए पर धकेल दिया गया, बड़े नेताओं को जेल हुई और चुनावों ने अपनी साख खो दी. रहमान ने दूर से देखा कि कैसे उनकी मां खालिदा जिया को जेल हुई और बाद में पाबंदियों के बीच रिहा किया गया और कैसे BNP धीरे-धीरे खोखली होती गई.
निर्वासन ने उन्हें बदल दिया. ब्रिटेन में रहने के दौरान जो लोग उनके संपर्क में आए, वे बताते हैं कि रहमान धीरे-धीरे कम बोलने और ज्यादा सुनने लगे थे. वे रोज़ाना की राजनीतिक बयानबाजी से दूर रहे, इंटरव्यू कम दिए और कड़वी भाषा से बचते रहे. दूरी ने सीधे टकराव को खत्म कर दिया और उन्हें गहराई से सोचने पर मजबूर किया. 2000 के दशक का वह 'आक्रामक' नेता अब काफी शांत और संयमित हो चुका था.
ऐसी रही वापसी
शेख हसीना को सत्ता से बेदखल करने वाले जन-आंदोलन के 17 महीने बाद, रहमान दिसंबर 2025 के आखिर में बांग्लादेश लौटे. उनकी वापसी का समय बहुत प्रतीकात्मक था. लौटने के कुछ ही दिनों बाद बीमार खालिदा जिया का निधन हो गया, जिसने BNP के इतिहास का एक बुनियादी अध्याय खत्म कर दिया और पार्टी की पूरी नैतिक व राजनीतिक विरासत उनके बेटे को सौंप दी.
इसके बाद हुए चुनाव पिछले कई सालों में सबसे ज्यादा निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी रहे. एक ही पार्टी के लंबे दबदबे और आर्थिक तंगी से थके हुए लोग बड़ी संख्या में वोट डालने निकले. नतीजा बिल्कुल साफ़ था - BNP और उसके सहयोगियों ने संसद में भारी बहुमत हासिल किया.
रहमान खुद कई सीटों से बड़े अंतर से जीते. 2008 के बाद पहली बार, वे कोई 'दूर का चेहरा' नहीं थे, बल्कि अब वे बांग्लादेशी राजनीति के केंद्र बन चुके थे.
एक बदली हुई आवाज़
चुनाव जीतने के बाद 14 फरवरी को रहमान ने पहली बार मीडिया से बात की. इसका साफ़ संकेत था कि वे दुनिया के सामने अपनी कैसी छवि रखना चाहते हैं. उनका भाषण बेहद शांत था. इसमें न तो जीत का अहंकार था और न ही बदले की भावना. उन्होंने साफ़ कहा, "हम किसी भी तरह की अराजकता बर्दाश्त नहीं करेंगे. शांति और कानून व्यवस्था हर हाल में बनी रहनी चाहिए."
रहमान ने स्पष्ट रूप से 'बदले की राजनीति' को खारिज किया और कहा कि सत्ता के दुरुपयोग की कोई जगह नहीं होगी. उन्होंने कानून के राज को अपनी प्राथमिकता बताते हुए कहा, "ताकतवर का कमजोर पर हमला बर्दाश्त नहीं किया जाएगा."
इन शब्दों के बड़े मायने थे. जिस देश में सत्ता परिवर्तन अक्सर डर, बदले और अस्थिरता के साथ होता रहा है, वहां रहमान अपना दबदबा दिखाने के बजाय लोगों को 'भरोसा' दे रहे थे. उन्होंने अपनी जीत को विरोधियों की हार नहीं, बल्कि निष्पक्ष शासन की जिम्मेदारी के रूप में पेश किया.
उन्होंने एकता पर जोर देते हुए कहा कि बांग्लादेश को एकजुट रहना चाहिए ताकि कोई भी बाहरी या भीतरी ताकत उसे कमजोर न कर सके. उनका भाषण छोटा, नपा-तुला और बहुत सोच-समझकर तैयार किया गया था. यह एक ऐसे व्यक्ति की झलक थी जिसे अपनी उम्मीदों के बोझ और वक्त की नजाकत का पूरा अहसास है.
'बांग्लादेश फर्स्ट'
विदेशी नीति पर रहमान की शुरुआती बातें भी काफी संतुलित रहीं. भारत के साथ संबंधों के बारे में पूछे जाने पर, उन्होंने न तो टकराव दिखाया और न ही झुकने की बात की. उनका रुख साफ़ था - बांग्लादेश के हित सबसे पहले होंगे, और सभी देशों के साथ संबंध आपसी सम्मान और संप्रभुता के आधार पर होंगे.
यह रवैया किसी वैचारिक दुश्मनी के बजाय व्यावहारिकता की ओर इशारा करता है. यह इस बात का भी संकेत है कि भारत, चीन और पश्चिमी देशों के बीच संतुलन बनाने की बांग्लादेश की पुरानी परंपरा जारी रहेगी, लेकिन बिना किसी फालतू बयानबाजी के.
PM के रूप में रहमान
रहमान भारी राजनीतिक समर्थन और उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी के साथ दफ्तर में कदम रख रहे हैं. निर्वासन से सत्ता तक के उनके इस सफर ने उन्हें बांग्लादेशी राजनीति में कुछ ऐसा दिया है जो दुर्लभ है- चीजों को गौर से देखने, आकलन करने और खुद को बदलने का समय. वे अब अपने शुरुआती सालों वाले जल्दबाज नेता नहीं हैं, और न ही निर्वासन में खामोश रहने वाले राजनेता. वे खुद को एक सतर्क और अनुशासित नेता के रूप में पेश कर रहे हैं, जिसका पूरा ध्यान स्थिरता और सरकारी संस्थाओं को सुधारने पर है.
वे कितने सफल होंगे, यह आने वाला वक्त बताएगा. सरकारी संस्थानों में जनता का भरोसा जगाना, शासन की साख लौटाना, आर्थिक तनाव को संभालना और यह सुनिश्चित करना कि लोकतंत्र की यह वापसी सिर्फ थोड़े समय के लिए न हो - ये ऐसी चुनौतियां हैं जो तुरंत उनकी परीक्षा लेंगी.
लेकिन यह साफ़ है कि तारिक रहमान इस मौके की अहमियत समझते हैं. उनका संयम राजनीतिक है, सीखा हुआ है और जानबूझकर अपनाया गया है. बांग्लादेश ने टकराव के दम पर कई नेताओं को उभरते देखा है. रहमान संघर्षों से थके हुए देश में 'संयम' के साथ शासन करने की कोशिश कर रहे हैं. उनका यह कार्यकाल ही यह तय करेगा कि अंततः उनकी पहचान क्या बनती है.

