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युनुस सरकार पर शेख हसीना के पहले 'हमले' ने कैसे बांग्लादेश के चुनावी माहौल का पारा चढ़ा दिया

शेख हसीना की निर्वासन से सार्वजनिक जीवन में वापसी के बाद बांग्लादेश के लिए जवाबदेही, शासन और राष्ट्र के भविष्य से जुड़े अनसुलझे सवाल फिर चर्चा में आ गए हैं

शेख हसीना (फाइल फोटो)
शेख हसीना (फाइल फोटो)
अपडेटेड 29 जनवरी , 2026

शेख हसीना की निर्वासन से सार्वजनिक जीवन में वापसी ने बांग्लादेश के लिए जवाबदेही, शासन और राष्ट्र के भविष्य से जुड़े अनसुलझे सवालों को फिर से प्रासंगिक बना दिया है.

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना 22 जनवरी को सार्वजनिक तौर पर सामने आईं और नई दिल्ली से एक बेहद आक्रामक ऑडियो संबोधन दिया. इसमें उन्होंने बांग्लादेश की अंतरिम सरकार और उसके मुख्य सलाहकार मुहम्मद युनुस पर आतंक, दमन और अवैध शासन का अभियान चलाने का आरोप लगाया.

साथ ही, बांग्लादेश के लोगों से उस सरकार का पुरजोर विरोध करने का आह्वान किया, जिसे उन्होंने एक गैर-निर्वाचित और हिंसक सरकार करार दिया.

पिछले साल अगस्त में राजनीतिक उथल-पुथल के बीच बांग्लादेश छोड़ने के बाद अपने पहले संबोधन में हसीना ने अपनी सरकार की जगह लेने वाली राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ बेहद कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया. उन्होंने युनुस को “हत्यारा फासीवादी” बताया और आरोप लगाया कि बांग्लादेश की सत्ता अब सहमति के बजाय दहशतगर्दी से चलाई जा रही है.

शेख हसीना ने कहा, “आज लोकतंत्र निर्वासन में है.” साथ ही दावा किया कि देश को ऐसे समूह के हाथों में सौंप दिया गया है जिसके पास न तो संवैधानिक अधिकार है और न नैतिक आधार. उन्होंने आगे कहा, “वे जनता के वोटों से नहीं, बल्कि साजिश रचकर सत्ता में आए हैं.” पूर्व पीएम ने दावा किया कि अंतरिम प्रशासन ने बांग्लादेश को एक ऐसी जगह बना दिया है जहां “हत्याएं, यातनाएं, दुष्कर्म और दमन” ही शासन के साधन बन गए हैं.

हसीना ने मौजूदा अधिकारियों पर बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघन में शामिल होने का आरोप लगाया, और कहा कि पत्रकारों को चुप कराया जा रहा है, अल्पसंख्यकों को डराया जा रहा है और महिलाओं को यौन हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है. हसीना ने कहा, “आज कानून का कोई शासन नहीं रह गया है.” उन्होंने दावा किया कि सरकारी संस्थाओं को खोखला कर दिया गया है और सत्ता में बैठे लोगों की रक्षा के लिए उनका दुरुपयोग किया जा रहा है.

सीधे तौर पर बांग्लादेशियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “मेरे प्रिय देशवासियों, य वो बांग्लादेश नहीं है जिसके लिए हमने जंग लड़ी थी.” उन्होंने देश के मुक्ति संग्राम का इतिहास याद दिलाते हुए आगाह किया कि यदि ऐसी ही स्थिति जारी रही तो राष्ट्र “विनाश के कगार पर” पहुंच जाएगा.

पूर्व प्रधानमंत्री ने अंतरिम सरकार की वैधता पर सवाल खड़े करते हुए इस बात पर जोर दिया कि यूनुस के नेतृत्व में कोई भी चुनाव विश्वसनीय ढंग से सम्पन्न नहीं हो सकता. हसीना ने कहा, “जब तक यह अवैध शासन कायम रहेगा, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव असंभव हैं.” उन्होंने किसी भी राष्ट्रीय चुनाव से पहले इसे सत्ता से हटाने की मांग उठाई.

उन्होंने बांग्लादेशियों से इस सरकार के खिलाफ आवाज उठाने का आह्वान किया. उन्होंने इसे “कठपुतली सरकार” करार दिया, और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप की अपील की. हसीना ने अपने निष्कासन के बाद की घटनाओं की जांच संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में कराने की मांग भी रखी. हसीना के मुताबिक, अब केवल बाहरी जांच ही न्याय सुनिश्चित कर सकती है क्योंकि घरेलू व्यवस्थाएं पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी हैं.

हसीना के इस भाषण में उस गहरे राजनीतिक संकट की झलक भी दिखी, जिसका सामना बांग्लादेश फरवरी में अंतरिम प्रशासन के तहत होने वाले राष्ट्रीय चुनावों से पहले कर रहा है. हसीना के पद छोड़ने और देश छोड़ने के बाद सत्ता संभालने वाले यूनुस का तर्क है कि उनकी भूमिका व्यवस्था में बदलाव लाने वाले समय तक सीमित है और इसका उद्देश्य महीनों की अशांति के बाद संस्थागत विश्वसनीयता को बहाल करना है.

उनके समर्थकों का कहना है कि अंतरिम सरकार को एक गहरे ध्रुवीकृत राजनीतिक परिदृश्य और वर्षों से निर्मित विश्वास के संकट की विरासत मिली है, और राजनीतिक बयानबाजी के बजाय स्थिरता लाना उसकी तात्कालिक प्राथमिकता है.

हसीना के भाषण में पिछले साल उनकी सरकार के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान उभरी शिकायतों का कोई जिक्र नहीं था, बल्कि उनका पूरा ध्यान सत्ता से हटाए जाने के बाद नैतिक पतन पर केंद्रित था. उन्होंने अपने भाषण को खुद को लोकतंत्र की रक्षक के तौर पर पेश किया लेकिन उनका लहजा बेहद आक्रामक बना रहा. इससे उनका अपना सत्ता से हटना विवादास्पद होना या उससे पहले की राजनीतिक सुधारों की व्यापक मांग को स्वीकारने की गुंजाइश बहुत कम रह गई.

पर्यवेक्षकों का कहना है कि निर्वासन में रहते हुए जन आंदोलन का उनका आह्वान, उनके स्थायी प्रभाव और अभी उनके समक्ष मौजूद बाधाओं दोनों को रेखांकित करता है, क्योंकि उनकी पार्टी अवामी लीग मौजूदा राजनीतिक प्रक्रिया से प्रभावी रूप से बाहर हो गई है.

शेख हसीना के भाषण ने भारत को भी एक नाजुक स्थिति में डाल दिया है, क्योंकि वह अभी देश में हैं और नई दिल्ली संक्रमणकालीन दौर में बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप से बचना चाहेगी. बांग्लादेश के लिए हसीना की सार्वजनिक जीवन में वापसी एक ऐसी जानी-पहचानी आवाज की वापसी है जो अधिकार और दृढ़ता से भरी है. यही नहीं, इसने जवाबदेही, शासन और राष्ट्र के भविष्य से जुड़े अनसुलझे सवालों को भी फिर प्रासंगिक बना दिया है. अब जबकि देश में चुनाव करीब आ रहे हैं, उनके भाषण ने पहले से ही तनावपूर्ण माहौल के बीच पारा और चढ़ा दिया है. इससे राजनीतिक असंतोष की भावना और लोकतंत्र बहाली के अंतिम स्वरूप पर आम सहमति बनाने में जटिलता और बढ़ने के आसार नजर आते हैं.

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